कोलेस्ट्राल


कोलेस्ट्राल


पेट से संबंधित अन्य रोगों का उपचार :

भूख न लगना

डकार आना

दस्त आना

हैजा

जलोदर

जिगर का बढ़ना

जिगर का कैंसर

जिगर का कड़ा पड़ जाना

जिगर के पीले दाग

जिगर के रोग

कब्ज

मोटापा

नाभि के रोग

पेट का कैंसर

पेट फूलना

पेट में दर्द होना

पेट का फोड़ा

पेट में कीड़ें होना

पेट के रोग

खाद्य-विषाक्ता

अफारा

आमाशय में जख्म

अजीर्ण (अग्निमांद्य)

अम्ल रोग

भोजन नली में जलन

अपच (भोजन के दस्त होना)

प्लीहा वृद्धि

बवासीर

भगंदर

जिगर में दर्द

जिगर में कमजोरी होना

जिगर में खून जमा होना

जिगर की सूजन

पाकस्थली का निर्गमन-द्वार

पाकाशय का दर्द

पाकाशय में कैंसर

पाकाशय का घाव

पेट में धंसने की अनुभूति

पेट में वायु जमा होना

पित्त-कोष की सूजन

उड़ने वाले कीड़े

अंगों में जल जमा होने से सूजन होना

सिर में जल भरने से सूजन होना

जहर खा लेना

जरायु-भ्रंश

जठरांत्र शोथ (पाचनतंत्र में सूजन)

जी मिचलाना 

पाकाशय का पुराना घाव

पाकाशय का कमजोर पड़ जाना

पाकाशय में जलन

पाकाशय की फलाव

पेचिश

प्लेग

सामुद्रिक रोग

तिल्ली के कष्ट

उदर कला शोथ

उल्टी करने की इच्छा

परिचय-

          शरीर में पाई जाने वाली कोलेस्ट्राल एक प्रकार की चर्बी होती है जो शरीर में कई प्रकार की क्रियाकलापों को कराने जैसे नई कोशिकाओं के निर्माण, इंसुलिन तथा हारमोंस उत्पादन करने में आवश्यक है। शरीर को जितनी मात्रा में कोलेस्ट्राल की जरूरत होती है, यकृत उतनी ही कोलेस्ट्राल का निर्माण होता है।

कोलेस्ट्राल दो तरह के होते हैं-

1. एलठीएल (खराब कोलेस्ट्राल)- खराब कोलेस्ट्राल से हृदय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

2. एचडीएल (अच्छा कोलेस्ट्राल)- अच्छे कोलेस्ट्राल से खतरा बहुत कम अर्थात शून्य के बराबर होता है।

        कोलेस्ट्राल से धमनी की दीवारों में जलन युक्त रोग पैदा हो जाते हैं जिसे अर्थरोस्क्लोरोसिस कहते हैं। इस रोग के कारण से धमनी की दीवारों में चर्बी जाम हो जाती है और रक्त संचारण में रुकावट पैदा हो जाती है और इसके कारण से दिल का दौरा भी पड़ने लगता है। शरीर में कोलेस्ट्राल का सामान्य स्तर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग होना चाहिए।

कारण :-

          यह रोग अनुवांशिकता के कारण से भी हो सकता है अर्थात यदि किसी व्यक्ति के परिवार में अनुवांशिक रोग मोटापा किसी को है तो उस परिवार में किसी भी व्यक्ति को यह रोग अधिक होने का खतरा रहता है। गतिहीन जीवन बिताने से भी यह रोग अधिक होता है जैसे- चलने-फिरने का कार्य न करना, व्यायाम न करना। मधुमेह रोग या मांसिक दबाव के कारण से भी यह रोग हो सकता है। स्टराइड का दुष्प्रयोग के कारण से कोलेस्ट्राल रोग हो सकता है। यकृत रोग तथा थायराइड से सम्बंधित रोग होने के कारण से यह रोग हो सकता है।

लक्षण :-

          इस रोग से पीड़ित रोगी के छाती में दर्द होता है, मोटापा बढ़ जाता है, मधुमेह का रोग भी हो जाता है, रोगी के रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है व यदि इस रोग से धमनियां प्रभावित हो गई हो तो नपुंसकता रोग हो जाता है। रोगी के मांसपेशियों में दर्द होता है। वैसे रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ जाने के कारण से कोई विशेष प्रकार के लक्षण नहीं दिखाई पड़ते। इस रोग के कारण से कुछ गम्भीर अवस्थाए भी पैदा हो सकती हैं जैसे- हृत्शूल, उच्चरक्तचाप, हृदय रोग या आघात होना आदि।

कोलेस्ट्राल रोग होने पर क्या करें या क्या न करें :-

  1. सबसे पहले इस रोग से पीड़ित रोगी को वह भोजन बिल्कुल भी सेवन नहीं करना चाहिए जिसमें कोलेस्ट्राल की मात्रा अधिक हो।
  2. रोगी को हाइड्रोजनकृत चर्बी जैसे- घी, मक्खन, वनस्पति, नारियल का तेज, नकली मक्खन या ताड़ का तेल आदि का उपयोग भोजन में नहीं करना चाहिए। इन तेलों की जगह रोगी को सोयाबीन तेल, सूर्यमुखी तेल या कुसुम कराड़ी तेल का उपयोग करना चाहिए। पापकार्न, मजोला या सफोला तेल का भी उपयोग भोजन बनाने में कर सकते हैं।
  3. अधिक चर्बी उत्पन्न करने वाले भोजन जैसे-कचौड़ी, समोसे या केक आदि का सेवन न करें।
  4. क्रीम, पनीर या दूध से बने दही या अन्य मिठाईयां जो गाढ़े दूध से बनी हो जैसे- गुलाब जामुन, मावा, चाकलेट तथा रसगुल्ले आदि चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
  5. यदि दूध का उपयोग करना भी हो तो मलाई हटे दूध का प्रयोग करें। मलाई हटे दूध से बनी पनीर का उपयोग भी कर सकते हैं।
  6. इस रोग से पीड़ित रोगी को किसी भी प्रकार के मांस का सेवन नहीं करना चाहिए।
  7. यदि मुर्गे के मांस को खाना हो तो सबसे पहले उसे अच्छी तरह से साफ करके ही उपयोग में लायें।
  8. रोगी को कड़े छिलके वाले फलों का सेवन करना चाहिए।
  9. मूंगफली काजू का सेवन न करें।
  10. पौष्टिक भोजन का सेवन करें जैसे- मक्के का आटा, मैदा आदि।  भोजन में रेशेदार पदार्थों का भी उपयोग कर सकते हैं जैसे- हरी सब्जियां, सलाद, आटे से बनी रोटी या पत्तेदार सब्जियां आदि।
  11. भुने या उबले भोजन का प्रयोग करने से शरीर की चर्बी कम हो सकती है। ऐसे बर्तनों में भोजन पकाएं जिनमें भोजन चिपके नहीं इससे उन्हें पकाते समय तेल व चर्बी की खपत भी कम होती है।
  12. रोगी को भोजन संबंधि नियमों को ठीक प्रकार से पालन करना चाहिए।
  13. संतुलित चर्बी निम्न कोलेस्ट्राल कार्बोहाइड्रेट या नियंत्रित कार्बोहाइड्रेट उत्पाद जैसे- शर्करा मांड सीमित व नियंत्रित मात्रा में ही लें अर्थात शर्करा, गुड़, शहद आदि बहुत कम मात्रा में सेवन करें।
  14. सूप जिसमें कुछ न डाला गया हो जैसे- सोड़ा, मसाले, कॉफी, सिरका, सरसों, जड़ी बूटियां या सुगंधित द्रव्य आदि का सेवन भोजन में न करें।
  15. यदि आप घर से बाहर जा रहे हो तो अच्छा यह होगा कि आप जो भोजन कर रहे हो उसकी पहले जांच कर ले ओर फिर भोजन करें।
  16. मांस का उपयोग करने से पहले उस पर से पूरी चर्बी उतार दें।
  17. इस रोग से पीड़ित रोगी के लिए सब्जियों पर कोई पांबदी नहीं है फिर भी ऐसे पदार्थों का उपयोग करे जिसमें अधिक मलाई न हो।
  18. हमेशा ऐसे भोजन करें जो चर्बी युक्त न हों।
  19. पेय पदार्थ में परिष्कृत दूध, पतली लस्सी जो मीठी न हो, फलों का रस जो अधिक मीठा न हो, नींबू रस, नारियल पानी आदि का उपयोग कर सकते हैं।
  20. ताजे फल जैसे- पपीता, तरबूज, बेर या संतरा का सेवन करना लाभकारी होता है।
  21. शरीर की त्वचा पर मुलायम पीले चकत्ते नज़र आने लगें या कोलेस्ट्राल बढ़ जाने के कारण से यदि निम्न लक्षण दिखाई दें जैसे-चक्कर आना, सिर में दर्द, छाती में दर्द, टांगों में दर्द, आवाज भारी हो जाना या अनियंत्रित चाल आदि तो तुरंत ही चिकित्सक से सलाह लेकर उपचार कराएं।

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