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जन्मजात या आनुवांशिक रोग


जन्मजात या आनुवांशिक रोग

Hereditary disease


मसाज से रोगों का उपचार :

परिचय-

          कभी-कभी गर्भावस्था में मां के गर्भ में बच्चे का हृदय का निर्माण पूरी तरह नहीं हो पाता जिसका कारण या तो अनुवांशिक होता है या यह किन्ही दवाओं के प्रभाव के कारण हो जाता है। अत: कुछ एक कमियों का वर्णन इस प्रकार से किया गया है-

          हृदय से जुड़ी रक्त की नाड़ियों में सिकुड़न या उनका गलत ढंग से जुड़े होना या आपस में मिले होना। वाल्वों का पूरा विकास नहीं होना, उनमें ढीलापन होना या सिकुड़े हुए होना।

          उदाहरण के रूप में मान लीजिए कि बाएं ऐट्रियम व बाएं वेनट्रिकल के बीच वाल्व, जिसे मिट्रल वाल्व कहते हैं, में कोई खराबी है तो उसका नतीजा यह होगा कि बाएं वेनट्रिकल के सिकुड़ने से जहां सारा रक्त ऐओर्टा धमनी से शरीर में जाना चाहिए, वहां कुछ रक्त वापस ऊपर बाएं ऐट्रियम में चला जाता है जिसके कारण हृदय की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। अन्य वाल्वों में खराबी होने से भी कोई-न-कोई हानिकारक प्रभाव हृदय की कार्यक्षमता पर पड़ता है।

          किसी एक ऐट्रियम के बीच की दीवार में छेद होना या फिर दोनों वेनट्रिकल के बीच की दीवार में छेद होना- इसका नतीजा यह होगा कि शुद्ध और अशुद्ध रक्त आपस में मिलते रहेंगे।

        इस प्रकार की खराबियों में सबसे सामान्य खराबी यह है कि शरीर में शुद्ध रक्त ले जाने वाली ऐओर्टा धमनी और हृदय से फेफड़ों में अशुद्ध रक्त ले जाने वाली पल्मोनरी धमनी आपस में जुड़ी रह जाती है।

          शुद्ध रक्त की नाड़ी को धमनी और अशुद्ध रक्त की नाड़ी को शिरा के नाम से जाना जाता है, लेकिन तकनीकी आधार पर जो नाड़ी हृदय से रक्त लेकर जाए, वह धमनी होती है और जो हृदय से रक्त लेकर आए वह शिरा कहलाती है। वैसे तो साधारण मान्यता भी सही है कि धमनी में शुद्ध रक्त होगा व शिरा में अशुद्ध, केवल दो अपवादों को छोड़कर। सबसे पहला कि हृदय से फेफड़ों में खून ले जाने वाली पल्मोनरी धमनियों में शुद्ध नहीं, बल्कि अशुद्ध खून होता है और दूसरा यह कि फेफड़ों से हृदय में रक्त लाने वाली एल्मोनरी शिराओं में शुद्ध रक्त होता है।

          ऐओर्टा और पल्मोनरी धमनी के आपस में जुड़े होने का प्रभाव यह होता है कि शुद्ध रक्त में अशुद्ध मिलावट होती रहेगी।

          लगभग 1 प्रतिशत नवजात शिशुओं में हृदय सम्बंधी कोई-न-कोई बीमारी पाई जाती है। इनमें अनुवांशिक कारणों से हुई बीमारियों को तो नहीं रोका जा सकता है, परन्तु गर्भवती माताओं को सावधान करने के लिए चेतावनी देना काफी जरूरी होगा कि शराब पीने और धूम्रपान करने वाली माताओं के बच्चों में ये रोग अक्सर पाए जाते हैं। यदि आने वाले शिशु के स्वास्थ्य की कामना है, तो कम-से-कम गर्भावस्था में इन व्यसनों से बचना ही बहुत अच्छा होगा। गर्भकाल के तीसरे महीने में कुछ दवाओं के सेवन से भी ये उभर सकते हैं। अत: इस अवधि में दवाओं का सेवन सुयोग्य डॉक्टर के परामर्श से ही करना चाहिए। गर्भकाल में माता को जर्मन खसरा होने से भी बच्चे को दिल के रोग हो जाने का खतरा बढ़ जाता है। गर्भकाल में माता को एक्स-रे करवाने से भी बचना चाहिए। कई बार तो हृदय के छेदों को प्रकृति खुद ही करके बंद कर देती है। वैसे जन्म से पाई जाने वाली बीमारियों का इलाज ऑप्रेशन द्वारा ही सम्भव है।

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