नीम


नीम

MARGOSA TREE-NEEM TREE


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[ N ] से संबंधित आयुर्वेदिक औषधियां

नीम का पेड़ बहुत बड़ा होता है। नीम का पेड़ वातावरण को शुद्ध बनाने में विशेष भूमिका निभाता है, क्योंकि नीम की पत्तियों में गुणकारी तत्व पाये जाते हैं जो जीवाणुओं को नष्ट करते रहते हैं। परिचय :

          नीम का पेड़ बहुत बड़ा होता है। नीम का पेड़ वातावरण को शुद्ध बनाने में विशेष भूमिका निभाता है, क्योंकि नीम की पत्तियों में गुणकारी तत्व पाये जाते हैं जो जीवाणुओं को नष्ट करते रहते हैं। नीम की इन रोग प्रतिरोधक शक्तियों के कारण इससे `एंटीसेप्टिक´ औषधियां बनाई जाती हैं। प्राचीन आर्य ऋषियों ने नीम को अलौकिक गुणों से युक्त बताया है कि नीम अनेक प्रकार की बीमारियों को मानव शरीर से दूर करता है। नीम के पत्ते खाकर कई लोग कई दिनों तक जीवित रहे हैं, साथ ही साथ शक्तिशाली भी रहकर अपना सामान्य जीवन व्यतीत किया है। गर्मी के दिनों में नीम के वृक्ष की छाया काफी आनन्दायक होती है। नीम के वृक्ष से गोंद प्राप्त की जाती है, जिससे औषधियां बनाई जाती है। इसका पेड़ देवालयों, धर्मशालाओं, सड़क आदि पर ठण्डी और ताजी हवाओं के लिए लगाया जाता है। गांव में जिस घर के आंगन में नीम का पेड़ होता हैं उस घर के लोग बीमार नहीं रहते हैं क्योंकि वे नीम का प्रयोग करते रहते हैं। जब नीम का पेड़ बहुत पुराना हो जाता है तो इसकी लकड़ी से शुद्ध चंदन की सी सुगन्ध आने लगती हैं। नीम की लकड़ी इमारत आदि बनाने के काम में लाई जाती है। कड़वा होने के कारण इसमें कीड़े नहीं लगते हैं। नीम का पेड़ कई सालों तक जीवित रहता है। नीम के बारे में एक अच्छी कहावत है कि नीम खाने में कड़वा होता है परन्तु काफी गुणकारी होता है। इसलिए इसका प्रयोग करना चाहिए। नीम का वृक्ष बबूल के वृक्ष से काफी अच्छा होता है, क्योंकि खेत के किनारे बबूल का वृक्ष सभी जरूरी पौष्टिक खनिज लवणों को चूस लेते हैं। लेकिन नीम का वृक्ष फसलों के लिए लाभकारी होता है। इसलिए किसानों को इसे अपने खेतों के किनारे अवश्य लगाना चाहिए।

विभिन्न भाषाओं में नाम :

भाषा   नाम
हिन्दी  नीम
संस्कृत  निम्ब, अरिष्ट, पिचुमर्द, प्रभद्र
गुजराती लीमड़ो
बंगाली    निममाछ, नीम
मराठी    कडूनिंब या बालन्तलिम्ब
कर्नाटकी बेंबुं
तैलिंगी  वेप्या
मलयलम वेत्पु
पंजाबी   नीम
फारसी आज़ाद -दरख्ते -हिन्दी, नेनबनीम या दरख्तहक
अरबी   आज़ाद -दरख्तुल -हिन्द
कुलनाम मिलएसीज
अंग्रेजी मरगोवज ट्री, नीम ट्री
वैज्ञानिक नाम    अजादिरचता इडिका
लैटिन  एजोडिरेक्टा इण्डिको

रंग : नीम का रंग हरा होता है।

स्वाद : इसका पेड़ कड़वा, कषैला और हल्का होता है।

स्वरूप : नीम के पेड़ बड़े और ऊंचे होते हैं। नीम के पत्ते नुकीले होते हैं। नीम के फूल मार्च से मई तक आते हैं। फूल सफेद छोटे व विशेष गंधयुक्त के होते हैं। फल खिन्नी के बराबर छोटे-छोटे होते हैं जो कच्चे हरे और पकने पर पीले तथा सूखने पर लाली लिए हुए काले रंग के हो जाते हैं। नीम का पेड़ भारी मोटा और लम्बा होता है। पत्ते आधे से डेढ़ इंच लम्बे दो नोकदार और किनारे पर आरे के समान दांत वाले होते हैं। नीम का वृक्ष 12 से 15 मीटर तक ऊंचा होता है। इसके तने की त्वक (छाल) खुरदरी भूरे रंग की होती है। इसके पेड़ में बसन्त ऋतु में तांबे के समान नए पत्ते आते हैं, जबकि गर्मी ऋतु में पत्तियां झड़ जाती हैं। वृक्ष के तने से गोंद भी प्राप्त की जाती है, जो पानी में घुलनशील होती है।

स्वभाव : यह खाने में शीतल (ठंड़ा) होता है।

हानिकारक : नीम उन व्यक्तियों के लिए हानिकारक होता है जिनकी प्रवृति सूखी (रूक्ष) होती है। जिनकी कामशक्ति कमजोर हो उन्हें भी नीम अधिक उपयोग करने से बचना चाहिए।

दोषों को दूर करने वाला : सेंधानमक, घी और गाय का दूध नीम के दोषों को दूर करने में मदद करता है।

तुलना : नीम की तुलना बकायन से की जा सकती है।

मात्रा : नीम के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, छाल का चूर्ण 2 से 4 ग्राम, तेल 5 से 10 बूंदों तक सेवन कर सकते हैं।

गुण : आयुर्वेदिक मतानुसार नीम कडुवी होती है। यह वात, पित्त, कफ, रक्तविकार (खून को साफ करने वाला), त्वचा के रोग और कीटाणुनाशक होती है। नीम मलेरिया, दांतों के रोग, कब्ज, पीलिया, बालों के रोग, कुष्ठ, दाह (जलन), रक्तपित्त (खूनी पित्त), सिर में दर्द, वमन (उल्टी), प्रमेह (वीर्य विकार), हृदयदाह (दिल की जलन), वायु (गैस), श्रम (थकावट), अरुचि (भूख को बढ़ाने वाला), बुखार, पेट के कीड़ें, विष (जहर), नेत्र (आंखों) के रोग, प्रदर आदि रोगों को नष्ट करती है।

          यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार नीम गर्म और खुश्क होती है। नीम का गोंद खून की गति को बढ़ाने वाला और रक्तशोधक (खून को साफ करने वाला) होता है। उपदंश (गर्मी) और चर्म (त्वचा) रोग के लिए यह एक अच्छी औषधि है।

          होम्योपैथिक चिकित्सा प्रणाली के अनुसार नीम पुराने से पुराने रोगों की दवा रखता है जैसे-त्वचा रोग, कुष्ठ, कुनैन आदि।

          वैज्ञानिक विश्लेषणों के अनुसार नीम में विभिन्न प्रकार के तत्व पाये जाते हैं जैसे-मार्गोसीन, सोडियम मार्गोसेट, निम्बिडिन, निम्बोस्टेरोल, निम्बिनिन, स्टियरिक एसिड, ओलिव एसिड, पामिटिक एसिड, उड़नशील तेल और टैनिन आदि। बीजों से प्राप्त स्थिर तेल 45 प्रतिशत निकलता है, जिसमें गंधक, राल, एल्केलाइड, ग्लूकोसाइड और वसा अम्ल पाए जाते हैं। इसके साथ ही थोड़ी-सी मात्रा में लौहा, कैल्शियम और पोटैशियम आदि के लवण भी थोड़ी बहुत मात्रा में पाये जाते हैं। नीम की गोंद में 26 प्रतिशत पेन्टोसन्स, 12 प्रतिशत गेलेक्टीन व अल्प मात्रा में अल्बयूमिन्स और ऑक्साइडस भी होते हैं।

नीम के पेड़ के विभिन्न अंगों का अलग-अलग प्रयोग होता है जो इस प्रकार से हैं-

नीम के पत्ते : नीम के पत्ते कड़वे, कृमिघ्न (कीड़ों के नाशक), पित्त, अरुचि तथा विष विकार में लाभ देते हैं।

नीम की कोपले : इसकी कोपले संकोचक, वातकारक, रक्तपित्त (खूनी पित्त), आंखों के रोग और कुष्ठ रोग नाशक होती हैं।

नीम की सींक (डंडी) : यह रक्त (खून), खांसी, श्वास (दमा), बवासीर (अर्श), गांठे, पेट के कीड़े और प्रमेह आदि रोगों में लाभकारी है।

नीम के फूल : नीम के फूल पित्तनाशक तथा कड़वे होते हैं। ये पेट के कीड़े और कफ को समाप्त करने वाले होते हैं।

कच्ची निंबौली : कच्ची निंबौली रस में कड़वी, तीखी, स्निग्ध (चिकनी), लघु, गर्म होती है तथा यह फोड़े-फुंसियां और प्रमेह को दूर करती है।

नीम की छाल : नीम की छाल संकोचक, कफघ्न (कफ को मिटाने वाली), अरुचि, उल्टी, कब्ज, पेट के कीडे़ तथा यकृत (लीवर) विकारों में लाभकारी होती है। नीम की छाल में निम्बीन, निम्बोनीन, निम्बीडीन, एक उड़नशील तेल, टैनिन और मार्नोसेन नामक एक तिक्त घटक होता है। नीम में एक जैव रासायनिक तत्व प्राप्त होता है जिसे लिमानायड कहते हैं। लगभग 200 प्रकार के हानिकारक कीटाणुओं पर नीम का असर होता है।

नीम का पंचांग (फल, फूल, पत्ती, तना और जड़ का चूर्ण) : रुधिर (खून की बीमारी) विकार, खुजली, व्रण (जख्म), दाह (जलन) और कुष्ठघ्न (कोढ़ को नष्ट करने वाला) में पहुंचाता है।

नीम के बीज : नीम के बीज दस्तावर और कीटाणुनाशक हैं। पुरानी गठिया, पुराने जहर और खुजली पर इसका लेप करने से आराम मिलता है।

नीम का तेल : नीम के तेल की मालिश करने से लाभ होता है।

विभिन्न रोगों में सहायक :

1. रक्तार्बुद (फोड़ा) : नीम की लकड़ी को पानी में घिसकर एक इंच मोटा लेप फोड़े पर लगायें। इससे फोड़ा समाप्त हो जाता है।

2. नकसीर (नाक में से खून का आना) : नीम की पत्तियों और अजवायन को बराबर मात्रा में पीसकर कनपटियों पर लेप करने से नकसीर का चलना बन्द हो जाता है।

3. बालों का असमय में सफेद होना (पालित्य रोग) :

  • नीम के बीजों के तेल को 2-2 बूंद नाक से लेने से और केवल गाय के दूध का सेवन करने से पालित्य रोग में लाभ होता है।
  • नीम के तेल को सूंघने से बाल काले हो जाते हैं।
  • नीम के बीजों को भांगरा और विजयसार के रस की कई भावनाएं देकर बीजों का तेल निकाल लें, फिर इसकी 2-2 बूंदों को नाक से लेने से तथा आहार में केवल दूध और भात खाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं।

4. बालों की रूसी  :

  • एक मुट्टी नीम के पत्तों का काढ़ा बनाकर नहाने से 1 घंटे पहले सिर पर मलने से रूसी मिट जाती है।
  • नीम की निबौलियों को सुखाकर अरीठा के साथ मिलाकर बारीक पीसकर रख लें। इसे 2 चम्मच भर एक गिलास गर्म पानी में घोलकर सिर को धो लेने से सिर की जूंएं, लीखें, सिर की दुर्गन्ध खत्म हो जाती है तथा बाल काले और मुलायम होते हैं।
  • नीम के पत्तों को पीसकर पानी में उबालकर ठंड़ा होने दें। इसके बाद इसे छानकर इससे सिर को धो लें और बालों को सही तरह से मालिश करें। बालों के सूख जाने पर स्वच्छ एरण्ड का तेल और नारियल का तेल बराबर मात्रा में लेकर इसे मिला लें और इससे सिर की अच्छी तरह से मालिश करें। इससे सिर की रूसी मिट जाएगी।

5. खसरा :

  • खसरा के मरीज के बिस्तर पर रोजाना नीम की पत्तियां रखने से अन्दर की गर्मी शान्त हो जाती है।
  • नीम के ताजे और मुलायम पत्तों को पानी में उबालकर छान लें, फिर उसमें साफ कपड़े की पट्टी को भिगोकर खसरे के रोगी की आंखों पर रखने से आंखों का लाल होना दूर हो जाता है।
  • रोगी को नीम के पानी से नहलाने से खसरे के रोग में जलन दूर होती है।

6. शरीर के आधे अंग में लकवा (अर्धांगवात) : नीम के तेल की 3 सप्ताह तक मालिश करने से लाभ होता है।

7. गंजापन और बालों की वृद्धि :

  • नीम के पत्ते 10 ग्राम, बेर के पत्ते 10 ग्राम दोनों को अच्छी तरह पीसकर इसका उबटन (लेप) बना लें। इस लेप को गंजे सिर पर मालिश करके 1 से 2 घंटे बाद धोने से बाल उग आते हैं। इसका प्रयोग 1 महीने तक करने से लाभ होता है।
  • नीम का तेल 2-3 महीने रोजाना बालों के उड़कर बने हुए चकते पर लगाने से बाल उग आते हैं।
  • 100 ग्राम नीम के पत्तों को 1 लीटर पानी में उबालने के बाद बालों को धोकर नीम का तेल लगाएं। इससे बाल उगने लगते हैं।
  • नीम के तेल को सूंघने से गंजेपन का रोग दूर हो जाता है।

8. बालों को मजबूत बनाना और गिरने से रोकना :

  • नीम के पत्तों को पानी में खूब उबालें। इसके बाद इसे उतारकर ठंड़ा कर लें। इस पानी से सिर को धोते रहने से बाल मजबूत, काले होते हैं और बालों का गिरना या झड़ना बन्द हो जाता है।
  • नीम का तेल रात को सोने से पहले बालों में लगा लें और सुबह नीम वाले साबुन से सिर को धो लें। कुछ दिनों तक नियमित रूप से सेवन करने से सिर की जुंए और लीख दूर होती हैं। इसके साथ बाल मजबूत होते हैं।
  • नीम का तेल लगाने से बाल फिर से जम जाते हैं।
  • नीम और बेर के पत्तों को पानी में उबालकर बालों को धोकर बालों को सुखा लें। अब नीम के तेल को बालों की जड़ों में लगाकर मसलने से बालों का गिरना बन्द हो जाता है।
  • सिर के बाल गिरने की शुरूआत ही हुई हो तो इसके लिए आप को नीम और बेर के पत्तों को पानी में उबाल लेना चाहिए। इससे बालों को धोने से बालों का झड़ना कम हो जाता है। इस तरह बाल काले भी होगें और लंबे भी। इसके प्रयोग से जुएं भी मर जाते हैं। सिर धोते समय इस बात का ध्यान रखें कि यह पानी आंखों में प्रवेश हो। इसके लिए आंखों को बन्द रखें।

9. सिर में खुजली होने पर : नीम के पत्तों का काढ़ा बनाकर सिर को धो लें। सिर को धोने के बाद नीम के तेल को लगाने से सिर की जूएं और लीखों के कारण होने वाली खुजली बन्द हो जाती है। नीम के बीजों को पीसकर लगाने से भी लाभ होता है।

10. कील-मुंहासे :

  • नीम के पत्ते, अनार का छिलका, लोध्र और हरड़ को बराबर लेकर दूध के साथ पीसकर लेप तैयार कर लें। इस लेप को रोजाना मुंह पर लगाने से मुंह और चेहरा निखर उठता है।
  • नीम की छाल के बिना नीम की लकड़ी को पानी के साथ चंदन की तरह घिसकर मुंहासों पर 7 दिनों तक लगातार लगाने से मुंहासे पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं।
  • नीम की जड़ को पानी में घिसकर लगाने से कील-मुंहासे मिट जाते हैं और चेहरा सुंदर बन जाता है।

11. दांतों के रोग :

  • नीम की दातुन करने से दांतों के रोगों में लाभ मिलता है।
  • नीम के फूलों से बने काढ़े से दिन में 3 बार गरारे करें और पतली टहनी को दांतों से चबा-चबाकर सुबह-शाम दातुन करते रहने से दांतों और मसूढ़ों के रोगों से छुटकारा मिलता है।
  • नीम की पत्तियों का रस मलने से दांतों के जीवाणु मिट जाते हैं।
  • नीम की निंबौली की गुठली से प्राप्त किये तेल को दांतों में लगाने से दांतों के कीड़े खत्म होते है और दांतों में दर्द कम होता है।
  • नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर साफ कपड़े से छानकर कुल्ला करने से दांतों के जीवाणु नष्ट होते हैं और पायरिया में भी लाभ मिलता है।
  • नीम की जड़ की छाल का 50 ग्राम चूर्ण, सोनागेरू 50 ग्राम, सेंधानमक 10 ग्राम को पीसकर, नीम के पत्तों का रस मिलाकर सुखाकर शीशी में रख दें। इसका मंजन करने से दांतो में से खून का गिरना, पीव का आना, मुंह में छाले पड़ना, मुंह से दुर्गन्ध का आना, जी मिचलाना आदि रोगों से छुटकारा मिलता है।
  • 100 ग्राम नीम की जड़ को कूटकर 500 मिलीलीटर  पानी में उबालें। जब पानी 250 मिलीलीटर शेष रह जाये तो इस पानी से कुल्ला करते रहने से दांतों के रोग दूर होते हैं।
  • सुबह उठते ही नीम की दातुन करने से और फूलों के काढ़े से कुल्ला करने से दांत और मसूढ़ों के रोग से मुक्त मिलती है और दांत मजबूत होते हैं।

12. दंतमंजन बनना :

  • नीम की टहनी और पत्तियों को छाया में सुखाने के बाद जलाकर राख बना लें। इसे पीसकर मंजन बना लें। सुगन्ध और स्वाद के लिए इसमें लौंग, पिपरमेंट और नमक को मिला लें। इससे पायरिया ठीक हो जाता है और दांत मजबूत होते हैं।
  • नीम की कोपलों को पानी में उबालकर कुल्ला करने से दांतों का दर्द मिटता है।
  • नीम के सूखे फूलों का 3 ग्राम कपड़े में छना हुआ चूर्ण रोजाना रात को गर्म पानी के साथ लेना चाहिए। 

13. आंखों की पलकों के बालों का झड़ना : नीम के ताजे पत्तों को पीसकर, निचोड़कर इसे पलकों पर लगाने से पलकों के बाल झड़ना बन्द हो जाते हैं।

14. आंखों की सूजन : नीम की 10 से 15 हरी पत्तियों को 1 गिलास पानी में उबालें। इसके बाद इसमें आधा चम्मच फिटकरी को मिलाकर पानी को छान लें। इस पानी से आंखों को 3 बार सेंकने से आंखों की सूजन और खुजली ठीक हो जाती है।

15. आंखों के रोगों में :

  • जिस आंख में दर्द हो उसके दूसरी ओर के कान में नीम के कोमल पत्तों का रस गर्म करके 2-2 बूंद टपकाने से आंख और कान का दर्द कम हो जाता है।
  • नीम के पत्तों और लोध्र को बराबर लेकर पीसकर चूर्ण बना लें, फिर इस चूर्ण की पोटली बनाकर पानी में भीगने दें। बाद में इस पानी को आंखों में डालने से आंखों की सूजन कम होती है।
  • नीम के पत्तों और सौंठ को पीसकर उसमें थोड़ा सेंधानमक मिलाकर गर्म कर लें और रात के समय एक कपडे़ की पट्टी रखकर आंखों पर बांधे। इससे आंखों के ऊपर की सूजन के साथ दर्द और भीतरी खुजली समाप्त हो जाती है। ध्यान रहे कि रोगी को शीतल पानी और शीतवायु से आंखों को बचाना चाहिए।
  • 500 ग्राम नीम के पत्तों को 2 मिट्टी के बर्तनों के बीच कण्डों की आग में रख दें। शीतल होने पर अन्दर की राख का 100 मिलीलीटर नींबू के रस में कुटकर सूखा लें। इसका अंजन (काजल) लगाने से आंखों के रोगों में लाभ मिलता है।
  • 50 ग्राम नीम के पत्तों को पानी के साथ बारीक पीसकर टिकिया बनाकर सरसों के तेल में पका लें। जब यह जलकर काली हो जाए तब उसे उसी तेल में घोटकर उसमें 500 ग्राम कपूर तथा 500 ग्राम कलमीशोरा मिलाकर खूब घोटकर कांच की शीशी में भर लें। इसे रात को आंखों में काजल के समान लगाने तथा सुबह त्रिफला को पानी के साथ सेवन करने से आंखों की जलन, लालिमा, जाला, धुन्ध आदि दूर हो जाती है तथा आंखों की रोशनी बढ़ जाती है।
  • नीम की कोपलें 20 पीस, जस्ता भस्म 20 ग्राम, लौंग के 6 पीस, छोटी इलायची के 6 पीस और मिश्री 20 ग्राम को एकत्रित करके खूब बारीक करके सुर्मा बना लें। इसे थोड़ा-थोड़ा सुबह-शाम आंखों में लगाने से धुंध ठीक होता है।
  • 10 ग्राम साफ रूई पर 20 नीम के सूखे पत्तों को बिछा दें, फिर नीम के पत्तों पर 1 ग्राम कपूर का चूर्ण रखकर रूई को लपेटकर बत्ती बना लें। इस बत्ती को 10 ग्राम गाय के घी में भिगोकर इसका काजल बना लें। इस बने हुए काजल को रात को लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ जाती है।
  • नीम के पत्तों के रस को गाढ़ा कर अंजन (काजल) के रूप में लगाते रहने से आंखों की खुजली, बरौनी (आंखों की पलकों के बाल) के झड़ने में लाभ होता है।

16. मोतियाबिन्द :

  • नीम की बीज की गुठली के बारीक चूर्ण को रोजाना थोड़ी-सी मात्रा में आंखों में काजल के समान लगाना हितकारी होता है।
  • नीम के तने की छाल (खाल) की राख को सुरमे की तरह आंखों में लगाने से आंखों का धुंधलापन दूर होता है।
  • नीम या कमल के फूल के बारीक चूर्ण को शहद के साथ रात को सोते समय आंखों में काजल के समान लगाने से मोतियाबिन्द ठीक हो जाता है।

18. आंव (दस्त के साथ एक प्रकार का सफेद चिकना पदार्थ का आना) :

  • नीम की हरी पत्तियों को धोकर सुखाकर पीस लें, इसे आधा चम्मच सुबह-शाम खाने के बाद 2 बार ठंड़े पानी से फंकी लें। कुछ दिनों तक लेने से आंव का आना बन्द हो जाता है।
  • नीम की हरी पत्तियों को छाया में सुखाकर अच्छी तरह चूर्ण बना लें, यह चूर्ण आधा चम्मच सुबह-शाम ठंड़े पानी के साथ फंकी के रूप में सेवन करने से आंव रुक जाती है।

19. आंखों का फूलना, धुंध जाला : नीम के सूखे फूल, कलमी शोरा को बारीक पीसकर कपड़े में छानकर आंखों में काजल के रूप में लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। रतौंधी (शाम को दिखाई देना बन्द होना) में कच्चे फलों का दूध आंखों में लगा सकते हैं।

20. सिर में दर्द का होना :

  • सूखे नीम के पत्ते, कालीमिर्च और चावल को बराबर लेकर बारीक पीसकर चूर्ण बना लें, सुबह उठकर जिस ओर पीड़ा हो, उसी ओर के नाक में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग तक नस्य लेने से पुराने आधे सिर का दर्द तुरन्त नष्ट हो जाता है।
  • नीम के ताजे पत्तों का रस 2 से 3 बूंद की मात्रा में नाक में टपकाने से लाभ मिलता है।
  • नीम के तेल की मालिश करने से सिर के दर्द में आराम आता है।
  • नीम की छाल और आंवला के काढ़े को पिलाने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।
  • सिर में दर्द होने पर नीम की छाल, झाड़ की छाल और चंदन को घिसकर सिर या माथे पर लेप की तरह लगाने से सिर का दर्द खत्म हो जाता है।

21. बुखार :

  • नीम के पत्ते, गिलोय, तुलसी के पत्ते, हुरहुर के पत्ते 20-20 ग्राम और कालीमिर्च 6 ग्राम को बारीक पीसकर पानी के साथ मिलाकर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की गोली बना लें तथा 2-2 घंटे के अंतर के बाद 1-1 गोली गर्म पानी के साथ लेने से इन्फ्लुएंजा में लाभ होता है।
  • नीम की छाल 5 ग्राम, लौंग लगभग आधा ग्राम या दालचीनी लगभग आधा ग्राम को पीसकर चूर्ण बना लें, 2 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पानी के साथ लेने से सामान्य बुखार में राहत मिलती है।
  • नीम की कोमल पत्तियों को पीसकर, किसी कपड़े में बांधकर रस निकाल लें, इस रस में शहद को मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन करने से बुखार कम होता है।
  • सोंठ, गिलोय, नीम की छाल, धनिया, लाल चंदन, पदमकाष्ठ आदि को पीसकर सेवन करने से बुखार समाप्त होता है।
  • नीम की छाल का काढ़ा पीने से लगातार आने वाले बुखार दूर होता है।
  • नीम की छाल, कुटकी, चिरायता, गिलोय और अतीस का अष्टमांश काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पिलाने से आराम मिलता है।

22. पुराना बुखार :

  • नीम के पत्ते 20 से 25 और 25 कालीमिर्च को लेकर मलमल के कपड़े में पोटली बांधकर आधा लीटर पानी में उबाल लें, बचे चौथाई पानी को ठंड़ा होने पर सुबह-शाम पीने से पुराने बुखार में लाभ होता है।
  • नीम की छाल, मुनक्का और गिलोय को बराबर लेकर 100 मिलीलीटर  पानी में मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 20 मिलीलीटर  की मात्रा में कुछ दिनों तक सुबह, दोपहर और शाम को सेवन करना चाहिए।

23. कान बहना, कान में दर्द :

  • नीम का तेल और शहद बराबर लेकर मिला लें, फिर इसकी 2-2 बूंदे रोजाना 1 से 2 महीने तक कान में डालने से कान के बहने में लाभ मिलता है।
  • नीम के तेल को शहद में मिलाकर रूई की बत्ती को भिगो लें, फिर इस बत्ती को कान में रखने से कान के बहने में आराम मिलता है।
  • नीम के तेल की बूंदे कान में डालने से कान में दर्द कम होता है और कान की फुंसियां खत्म हो जाती हैं।
  • नीम के पत्तों का रस 40 मिलीलीटर और 40 मिलीलीटर तिल के तेल को मिलाकर गर्म कर लें, फिर इस तेल को छानकर 3-4 बूंद कान में डालने से लाभ होता है।
  • कान में दर्द होने पर चंदन या नीम के तेल को गर्म करके बूंद-बूंद की मात्रा में लेकर कान में डालने से लाभ होता है।
  • नीम के पत्तों को उबालते समय इसकी भाप से कान को सेंकने से लाभ मिलता है।

24. यक्ष्मा (टी.बी.) : नीम का तेल 4-4 बूंद कैप्सूल में भरकर टी.बी. के रोग में प्रतिदिन 3 बार प्रयोग करने से लाभ मिलता है।

25. दमा (श्वास) : 10 बूंदे नीम का तेल पान पर लगाकर खाने से दमा व खांसी में लाभ होता है।

26. पित्त ज्वर (पित्त के कारण उत्पन्न बुखार) :

  • नीम के पत्तों का फेन-युक्त रस शरीर पर मलने से पित्त ज्वर की जलन शान्त हो जाती है।
  • नीम की छाल, हल्दी, गिलोय, धनिया और सोंठ इन पांचों को बराबर सेवन से पित्त के बुखार में फायदा होता है।
  • नीम के कोमल पत्तों को नींबू के रस में पीसकर माथे पर लगाने से जलन और बुखार ठीक हो जाता है।
  • नीम और गिलोय का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर खाने से पित्त ज्वर मिट जाता है।
  • नीम की कोंपल और चिरायते का काढ़ा बनाकर उसमें थोड़ी-सी मात्रा में शहद को मिलाकर देना चाहिए।

27. हिक्का (हिचकी) :

  • 2 पीस नीम की सींक को 10 मिलीलीटर पानी में पीस लें, फिर मोरपंख के चांद की राख लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिलाकर सेवन करें।
  • नीम की पत्तियों को इकठ्ठा करके उसे जला दें, फिर उसमें कालीमिर्च का चूर्ण डालें। इसका धुआं लेने से हिचकियां आनी बन्द हो जाती हैं।

28. गलकर कटने वाला कुष्ठ (गलित कुष्ठ) : नीम की छाल और हल्दी 1-1 किलो और 2 किलो गुड़ को बडे़ मिट्टी के मटके में भरकर उसमें 5 लीटर पानी डालकर मुंह बन्द कर घोड़े की लीद से मटके को ढ़क दें, 15 दिन बाद निकालकर रस (अर्क) निकाल लें। इस रस को 100 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम सेवन कराने से गलित कुष्ठ में लाभ होता है। इसके सेवन के बाद बेसन की रोटी घी के साथ सेवन कर सकते हैं।

29. पेट के कीड़े (उदर कृमि) :

  • सब्जी या बैंगन के साथ नीम के 8-10 पत्तों को छौंककर खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।
  • एक मुट्टी नीम के पत्तों का काढ़ा बनाकर 20 मिलीलीटर की मात्रा में खाली पेट 3 दिन तक पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।
  • नीम के पेड़ की छाल को उतारकर बारीक पीसकर चूर्ण बना लें, इस बने चूर्ण की 2 ग्राम को खुराक के रूप में हींग और शहद के साथ सेवन करने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं।
  • नीम के पेड़ के ताजे पत्तों की कोपलों को पीसकर प्राप्त हुए रस को शहद के साथ मिलाकर पीने से पेट के कीड़े और खून की खराबियां मिट जाती हैं।
  • नीम के पत्तों को तिल के तेल में पकाकर छानकर रख लें, फिर इसी तेल की मालिश करने से सिर की जूं, लीख और बाहरी कीड़े समाप्त हो जाते हैं।
  • नीम की पत्तियों को सुखाकर अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2 चुटकी की मात्रा में लेकर शहद के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है।
  • नीम के पत्तों का रस शहद के साथ मिलाकर पीने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं।

30. अम्लपित्त (एसिडिटिज, खटटी डकारे) :

  • धनिया, सौंठ, नीम की सींक और शक्कर (चीनी) को मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को सुबह-शाम पीने से खट्टी डकारे, अपचन (भोजन का न पचना) और अधिक प्यास का लगना दूर होता है।    
  • नीम की जड़ का बारीक चूर्ण 10 ग्राम, विधारा चूर्ण 20 ग्राम, सत्तू को 100 ग्राम लेकर अच्छी तरह से मिला लें। इसे थोड़ी-सी मात्रा में लेकर शहद के साथ सेवन करने से अम्ल पित्त समाप्त होती है।
  • नीम के पत्ते और आंवलों का काढ़ा पीने से अम्लपित्त नष्ट होता है।

31. पेट में दर्द : नीम के पेड़ के तने की मोटी छाल 40-50 ग्राम को जौ के साथ कूटकर 400 मिलीलीटर पानी में पका लें और 10 ग्राम नमक को ऊपर से डाल दें, जब पानी आधा शेष बचे तो इसे गर्म-गर्म ही छानकर पीने से लाभ होता है।

32. दस्त (अतिसार):

  • नीम की 50 ग्राम छाल को जौ के साथ कूटकर पानी में आधा घंटे उबालकर छान लें, फिर इसी छनी हुई छाल को पुन: 300 मिलीलीटर पानी में पकायें, 200 मिलीलीटर शेष रहने पर छानकर शीशी में भर लें और इसमें पहले छाने हुए पानी को मिला दें, इसे 50-50 मिलीलीटर दिन में 3 बार पिलाने से पतले दस्त आने बन्द हो जाते हैं।
  • नीम की 1 ग्राम बीज की गिरी थोड़ी-सी चीनी मिलाकर पीसकर पानी से फंकी लें। ध्यान रहें कि रोगी चावल का सेवन न करें।
  • गर्मी में दस्त होने पर नीम के 10 पत्ते और 25 ग्राम मिश्री पीसकर पानी में मिलाकर पी लें।
  • 5 नीम के हरे पत्तों को पीसकर आधा चम्मच शक्कर (चीनी) मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से दस्त ठीक हो जायेंगे।
  • नीम के पत्तों और हल्दी को मिलाकर अच्छी तरह से पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर रख लें, फिर इन्हीं गोलियों में से 1-1 गोली को सुबह-शाम सेवन करने से दस्त का आना बन्द हो जाता है।
  • नीम के 10 पत्तों को पीसकर थोड़ी-सी मात्रा में मिश्री को मिलाकर 1 कप पानी में डालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को पीने से लाभ होता है।
  • 1 ग्राम निबौली की गिरी यानी गुठली के बीच के भाग और थोड़ी-सी चीनी को मिलाकर खाकर ऊपर से गुनगुना पानी पीने से लाभ मिलता है।
  • नीम के बीज यानी निबौली की गिरी 10 ग्राम, बड़ी हरड़ की छाल 20 ग्राम को बारीक पीसकर चूर्ण बनाकर रख लें, इस चूर्ण को 2 से 5 ग्राम की मात्रा में ताजे दूध में मिश्री या चीनी डालकर एक दिन में 2 से 3 बार खुराक के रूप में पीने से खूनी दस्त और पेट के दर्द से छुटकारा मिलता है।
  • 1 ग्राम नीम के बीज (निबौली) की गिरी और थोड़ी-सी चीनी को डालकर अच्छी तरह पीसकर रख लें, फिर इसे फंकी के रूप में खाने से लाभ मिलता है। ध्यान रहे कि खाने में केवल चावल का प्रयोग करें।

33. पुराने दस्त :

  • 1 ग्राम नीम के पेड़ के बीज की गिरी, थोड़ी-सी चीनी मिलाकर पीस लें। इस चूर्ण को पानी के साथ लें। गर्मी के दिनों में दस्त होने पर नीम के 10 पत्ते और 25 ग्राम मिश्री पीसकर पानी में मिलाकर पीयें। ध्यान रहे कि खाने में केवल चावल का ही प्रयोग करें।
  • नीम के 5 हरे पत्ते और 4 कालीमिर्च को मिलाकर पीस लें और 125 मिलीलीटर पानी में मिलाकर, छान पीने से लाभ होता है।

34. पेचिश: 1 चम्मच नीम की पत्तियों के रस में 2 चम्मच मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पानी के साथ लेने से लाभ मिलता है।

35. जूते के कारण घाव बनने पर : नीम के तेल और नीम की पत्तियों की बारीक राख को घावों पर लगाने से आराम मिलता है।

36. यकृत (लीवर):

  • 30 ग्राम नीम के पत्ते 1 गिलास पानी में तेज उबालकर रोजाना पीने से लाभ होता है। मदिरा (शराब) पीने से लीवर जल्दी ठीक होता है।
  • 10 ग्राम नीम की छाल को पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं। उस काढ़े को कपडे़ द्वारा छानकर, उसमें शहद मिलाकर सुबह-शाम रोगी को सेवन कराने से यकृत वृद्धि मिट जाती है।

37. आमातिसार: नीम की छाल की राख 10 ग्राम को दही के साथ सुबह-शाम सेवन करने से आमातिसार में लाभ होता है।

38. रक्तातिसार (खूनी दस्त का आना): नीम की 3 से 4 पकी निबौलियां खाने से लाभ मिलता है।

39. सांप के काटने पर: नीम के पत्ते सुबह खाने से सांप का जहर नहीं चढ़ता है।

40. पीलिया (पाण्डु, कामला):

  • नीम की जड़ का बारीक चूर्ण 1 ग्राम सुबह-शाम 5 ग्राम घी और 10 ग्राम शहद के साथ मिलाकर खाने से पीलिया के रोग में आराम मिलता है। ध्यान रहे यदि घी और शहद अनुकूल न हो तो नीम की जड़ 1 ग्राम चूर्ण गाय के पेशाब या जल या दूध में किसी एक के साथ लेना चाहिए।
  • नीम की सींक 6 ग्राम और सफेद पुनर्नवा की जड़ 6 ग्राम को पीसकर पानी के साथ कुछ दिनों तक पिलाते रहने से पीलिया में आराम मिलता है।
  • नीम के पत्तों का रस 3 चम्मच, सोंठ का पाउडर आधा चम्मच और शहद चार चम्मच को मिलाकर सुबह खाली पेट पीने से 5 दिन में ही पीलिया ठीक होता है।
  • गिलोय के पत्ते, नीम के पत्ते, गूमा के पत्ते और छोटी हरड़ को 6-6 ग्राम की मात्रा में कूटकर 200 मिलीलीटर पानी में उबालें, जब 50 मिलीलीटर पानी शेष बचे तो पानी को छानकर 10 ग्राम गुड़ के साथ सुबह-शाम सेवन करें। ध्यान रहे कि इसके सेवन से पहले लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग शिलाजीत 6 ग्राम शहद के साथ अवश्य चाट लें। इससे पीलिया का रोग ठीक हो जाता है।
  • नीम के पेड़ की छाल के रस में शहद और सोंठ का चूर्ण मिलाकर देना चाहिए।
  • पानी में पिसे हुए नीम के पत्तों के 250 मिलीलीटर रस में शक्कर (चीनी) मिलाकर गर्म-गर्म पीने से आराम मिलता है।
  • पित्तनलिका में मार्गावरोध होने के कारण पीलिया रोग हो तो 100 मिलीलीटर नीम के पत्ते रस में 3 ग्राम सौंठ का चूर्ण और 6 ग्राम शहद के साथ मिलाकर 3 दिन तक सुबह पिलाने से लाभ पहुंचता है। ध्यान रहे की इसके सेवन के दौरान घी, तेल, शक्कर (चीनी) व गुड़ आदि का प्रयोग न करें।
  • 10 मिलीलीटर नीम के पत्तों के रस में 10 मिलीलीटर अडूसा के पत्तों के रस व 10 ग्राम शहद को मिलाकर सुबह लें।
  • 10 मिलीलीटर नीम के पत्तों के रस में 10 ग्राम शहद को मिलाकर 5 से 6 दिन तक पीने से आराम मिलता है।
  • नीम के पत्ते के 200 मिलीलीटर  रस में थोड़ी शक्कर (चीनी) मिलाकर गर्म करें। इसे 3 दिन तक दिन में एक बार खाने से लाभ होता है।
  • नीम के 5-6 कोमल पत्तों को पीसकर, शहद मिलाकर सेवन करने से मूत्रविकार (पेशाब के रोग) और पेट की बीमारियों में लाभ होता है।
  • कड़वे नीम के पत्तों को पानी में पीसकर एक पाव रस निकाल लें। फिर उसमें मिश्री मिलाकर गर्म करें और ठंड़ा होने पर पी जायें। इससे पाण्डु या पीलिया रोग दूर होता है।
  • नीम की छाल, त्रिफला, गिलोय, अडूसा, कुटकी, चिरायता और नीम की छाल बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इसमें शहद मिलाकर पीने से पाण्डु, कामला या पीलिया जैसे रोग मिट जाते हैं।
  • नीम के पत्तों का आधा चम्मच रस, सोंठ 2 चुटकी और शहद 2 चम्मच। तीनों को मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करें।

41. प्रमेह (वीर्य विकार), सुजाक (गिनोरिया की बीमारी) :

  • नीम के पत्तों को पीसकर टिकिया बना लें। फिर उसे गाय के घी में तलकर रख लें। जब टिकिया जल जाए तो घी को छानकर रोटी के साथ लगाकर सेवन करें। इससे दोनों रोगों में लाभ मिलता है।
  • नीम के पत्ते के 10 मिलीलीटर रस को शहद के साथ मिलाकर सेवन करें।
  • 20 मिलीलीटर नीम के पत्तों के रस को 1 ग्राम नीला थोथा घोटकर सुखा लें, फिर इसे कौड़ियों में रखकर भस्म करें। इसके बाद इसे लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग लेकर गाय के दूध के साथ सेवन करें। इसे दिन में 2 बार लेने से आराम मिलता है।

42. मलेरिया का बुखार:

  • 20 ग्राम नीम की जड़ की छाल को कूटकर 160 मिलीलीटर पानी में रात को भिगो दें। इसे सुबह के समय उबालकर काढ़ा बना लें। यह काढ़ा दिन में तीन बार मलेरिया के रोगी को देने से लाभ मिलता है।
  • नीम की जड़ की बीच की छाल 50 ग्राम को कूटकर 600 मिलीलीटर पानी में लगभग 20 मिनट तक उबालकर छान लें। जब रोगी को मलेरिया का बुखार चढ़ रहा हो तो बुखार चढ़ने से पहले 40 से 60 मिलीलीटर 2 से 3 बार पिलाने से बुखार (मलेरिया) रुक जायेगा।
  • नीम के तेल की 5-10 बूंद दिन में 1 या 2 बार सेवन करना चाहिए।
  • 60 ग्राम नीम के हरे पत्ते, 4 कालीमिर्च को पीसकर 125 मिलीलीटर पानी में छानकर पीने से मलेरिया ठीक होता है।
  • नीम के पत्ते, निबौली, कालीमिर्च, तुलसी, सोंठ, चिरचिटा को समान मात्रा में मिलाकर 1 गिलास पानी में इतना उबाल लें कि आधा पानी उड़ जाए। इसके बाद इसे छानकर 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार पीने से मलेरिया के बुखार में लाभ मिलता है।
  • नीम के कोमल पत्तों में उसकी आधी मात्रा में फिटकरी भस्म मिलाकर कूट लें, फिर लगभग आधा ग्राम की गोलियां बना लें। इसकी 1-1 गोली मिश्री के शर्बत के साथ लेने से मलेरिया में लाभ मिलता है।
  • नीम के थोडे़-से पत्ते और 8 से 10 कालीमिर्च लेकर 1 कप पानी में उबाल लें। पानी जब आधा कप शेष बचे तो सुबह-शाम देने से लाभ होता है।
  • 60 ग्राम नीम के हरे पत्ते और 4 कालीमिर्च को मिलाकर पीस लें। इसे रोगी को पिलाने से मलेरिया का बुखार ठीक हो जाता है।
  • नीम की 5 पत्तियां, तुलसी के 5 पत्ते और 1 चम्मच नींबू के रस की चटनी बनाकर सुबह-शाम खाने से लाभ होता है।
  • नीम की छाल 10 ग्राम, सूखा धनिया 10 ग्राम, सोंठ का चूर्ण 10 ग्राम तथा तुलसी के 5 पत्ते को पीसकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को दिन में 4 बार लेने से बुखार में लाभ होता है।
  • नीम की छाल के काढ़े में धनिया और सोंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से मलेरिया बुखार समाप्त हो जाता है।
  • नीम की आन्तरिक छाल का चूर्ण 2 से 4 ग्राम, धनिया, सोंठ, लौंग, दालचीनी या मिर्च, चिरायता और कुटकी के साथ सुबह-शाम लेने से मलेरिया, विषम, सविराम बुखार में लाभ होता है।

43. खून की बीमारी (रक्त विकार):

  • नीम की जड़ की छाल का काढ़ा 5-10 मिलीलीटर रोजाना पीने से खून की बीमारी मिटती है।
  • नीम के पत्तों के रस को 5 से 10 मिलीलीटर रोजाना पीने से खून साफ होता है और खून बढ़ता है।
  • नीम के फूलों को पीसकर चूर्ण तैयार कर लें। इस चूर्ण को आधा-आधा चम्मच सुबह-शाम नियमित रूप से सेवन करें और दोपहर को 2 चम्मच नीम के पत्तों का रस 1 बार प्रयोग करें।

44. खून के बहने और स्त्री प्रदर होने पर:- नीम के वृक्ष के रस मे जीरा डालकर 7 दिन तक सेवन करें।

45. खूनी पित्त (रक्तपित्त):

  • नीम के पत्तों की लुगदी बनाकर 10 मिलीलीटर सेवन करने से रक्तपित्त में लाभ मिलता है।
  • नीम के पत्तों के रस और अडूसा के पत्तों के रस को 20-20 मिलीलीटर लेकर थोड़े शहद के साथ सुबह-शाम सेवन से लाभ मिलता है।

46. चूहे के काटने से (प्लेग):

  • नीम की आन्तरिक छाल 20 ग्राम को पानी के साथ पीसकर छान लें, इस पानी को 50 मिलीलीटर सुबह-शाम पिलाने से तथा पत्तों को बारीक पीसकर पुल्टिश बांधने से प्लेग की गांठें टूटकर बिखर जाती हैं।
  • नीम के पेड़ की जड़ को पानी में कूट-छानकर 10-10 मिलीलीटर की मात्रा में 15-15 मिनट के अंतर से पिलाने से और गांठों पर इसके पत्तों की पोटली को बांधने से तथा आसपास इसकी धूनी (धुनी) करते रहने से लाभ मिलता है।
  • नीम का सेवन करने से प्लेग के जीवाणु मर जाते हैं।
  • नीम की ताड़ी में कपास या कपडे़ को खूब गीला करके प्लेग की गांठों पर बांधते रहने से लाभ होता है।

47. अधिक दस्त का आना (संग्रहणी) : नीम की ताड़ी को सुबह-शाम को 7-7 बूंद ताजे रस में मिलाकर 21 दिन तक सेवन करें।

48. लू (गर्मी) लगने पर :

  • नीम की जड़ों का चूर्ण 10 ग्राम, मिश्री 10 ग्राम को पानी के साथ पीसकर छानकर पिलाने से लू लगना शान्त हो जाती है।
  • नीम के पत्तों के रस में शक्कर (चीनी) मिलाकर लगातार 8 दिनों तक सुबह के समय सभी प्रकार की गर्मी शान्त हो जाती हैं।

49. चेचक:

  • नीम की लाल रंग की कोमल पत्तियों की 7 पीस और कालीमिर्च के 7 पीस, 1 महीने तक नियमित रूप से कुछ दिनों तक सेवन करने से निश्चित ही लाभ होता है।
  • नीम के बीज, बहेड़े और हल्दी को बराबर मात्रा में लेकर ठंड़े पानी में पीसकर छान लें। इसे कुछ दिनों तक चेचक के रोग में पीते रहें।
  • नीम के पेड़ की 3 ग्राम कोपलों को 15 दिन तक लगातार खाने से 6 महीने तक चेचक नहीं निकलती है।
  • नीम की हरी पत्तियों को पीसकर रात को सोते समय चेहरे पर लेप करें और सुबह ठंड़े पानी से चेहरे को लगातार 50 दिनों तक धोयें। इससे चेचक के दाग मिट जाते हैं।
  • नीम की 10 ग्राम कोमल पत्तियों को पीसकर उसका रस बहुत पतलाकर लेप करना चाहिए। चेचक के दानों पर कभी भी मोटा लेप नहीं चाहिए।
  • नीम के बीजों की 5-10 गिरी को पानी में पीसकर लेप करने से चेचक की जलन शान्त हो जाती है।
  • चेचक के रोगी को अधिक प्यास लगती हो तो नीम की छाल को जलाकर उसके अंगारों को पानी में डालकर बुझा लें और इस पानी को छानकर रोगी को पिलाने से प्यास शान्त हो जाती है। अगर इससे भी प्यास शान्त न हो तो 1 लीटर पानी में 10 ग्राम कोमल पत्तियों को उबालें, जब यह पानी आधा शेष रह जाये तो इसे छानकर पिला दें। इससे प्यास के साथ-साथ चेचक के दाने भी सूख जाते हैं।
  • जब चेचक ठीक हो जाये तो नीम के पत्तों के काढ़े से नहाना चाहिए।
  • नीम के तेल या नीम के बीजों की मगज पानी में घिसकर लगाया जाये तो दाग मिट जाते हैं।
  • चिरायता, नीम, मुलहठी, नागरमोथा, अडूसा, पित्तपापड़ा, कड़वे परवल, हरड़, बहेड़ा, आंवला, खस और इन्द्रजौ को एक साथ बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें और रोजाना पियें। इसको पीने से हर तरह के विस्फोटक (फोड़े) समाप्त हो जाते हैं।
  • नीम की हरी पत्तियों को पीसकर रात को सोते समय लेप कर लें। सुबह उठने पर ठंड़े पानी से चेहरा धो लें। ऐसा लगातार 50 दिन तक करने से चेहरे के चेचक (माता) के दाग (निशान) दूर हो जाते हैं।

50. खाज-खुजली :

  • नीम के बीजों के तेल में आक (मदार) की जड़ को पीस लें। इसके लेप से पुरानी से पुरानी खाज-खुजली मिट जाती है।
  • नीम का तेल या निंबोली को पानी में पीसकर खुजली वाले स्थान पर लगाने से आराम होता है।
  • रोजाना सुबह 25 मिलीलीटर नीम के पत्तों के रस को पानी के साथ पीने से खून साफ होता है और खुजली भी दूर होती है।
  • रक्त विकार (खून की खराबी) से पैदा हुई खुजली को दूर करने के लिए 6 ग्राम नीम के पत्ते और दस दाने कालीमिर्च के दाने पीसकर खाने चाहिए।
  • खुजली होने पर नीम की छाल को घिसकर पानी के साथ लगाएं।
  • थोड़े से नीम के पत्तों को पानी में डालकर उबाल लें। इस पानी से 8 से 10 दिनों तक स्नान करें। इससे खुजली दूर हो जाती है।
  • खुजली की वजह से शरीर में जख्म बन गये हो या फोड़े-फुंसियों के कारण खुजली हो तो नीम की छाल को पानी के साथ घिसकर लगाने से आराम आता है।
  • 10 ग्राम कत्थे की छाल, 10 ग्राम नीम और 10 ग्राम जामुन की छाल को 50 ग्राम गाय के पेशाब के साथ पीसकर लेप करने से खुजली दूर हो जाती है। अगर गाय का पेशाब न भी मिले तो पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • नीम या नीम की निंबोली के तेल को खुजली वाले स्थान पर 15-20 दिनों तक लगाने से लाभ मिलता है।
  • नीम के पत्ते 50 ग्राम और मेंहदी की पत्तियां 50 ग्राम, 60 मिलीलीटर नारियल के तेल में उबाल-छानकर मालिश करें। नीम और मेंहदी के इतने ही पत्तों का रस निकालकर सुबह-शाम पीयें।
  • नीम की जड़ की ताजी छाल और नीम के बीजों की गिरी 10-10 ग्राम दोनों को अलग-अलग ताजे पत्तों के रस में पीसकर एकत्रकर मिला दें, जब यह उबटन (लेप) की तरह हो जाये, जब प्रयोग में लाने से शरीर की मैल, खुजली, दाद, वर्षा तथा गर्मी में होने वाली फुन्सियां, शीतपित्त, शारीरिक दुर्गन्ध तथा पसीने में अधिक गंध का आना आदि रोगों में लाभ मिलता है।

51. भूतबाधा को दूर करने के लिए :

  • नीम की लकड़ी सूतिका गृह में जलाने से नवजात शिशु को किसी भी प्रकार की भूत सम्बंधी परेशानी नहीं आती है।
  • शवदाह होने के बाद मशान में नीम के पेड़ की कोमल पत्तियों को चबाकर घर लौटते हुए खाते हैं क्योंकि लोगों का मानना है कि ऐसा करने से भूत की बाधा से निजात मिलती है।

52. हैजा (विसूचिका):

  • नीम की 20 पत्तियों को पीसकर एक कप पानी में मिलाकर पीने से हैजा में लाभ मिलता है।
  • नीम की थोड़ी-सी पत्तियां पीसकर 1 कप पानी में मिलाकर पीने से हैजा में दस्त तथा उल्टियां आनी बन्द हो जाती हैं।

53. पेशाब का बन्द होना: नीम के फूलों को पानी में पीसकर पेडू (नाभि) पर बांधने से पेशाब खुलकर आने लगता है।

54. जले हुए अंग की सूजन दूर करना : नीम के पत्तों को पीसकर लगाना चाहिए। इससे खून साफ होकर जलन शान्त कम होती है।

55. अरुचि (भूख का कम लगना) : नीम के पेड़ के 8 से 10 कोमल पत्तों को घी में भूनकर खाने से अरुचि हट जाती है।

56. वमन (उल्टी) :

  • 7 नीम की सींकों को 2 बड़ी इलायची और 5 कालीमिर्च के साथ बारीक पीसकर 250 मिलीलीटर पानी के साथ लें।
  • नीम की छाल का लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग रस शहद के साथ मिलाकर पिलाने से लाभ मिलता है।
  • नीम के 20 ग्राम पत्ते पीसकर 100 मिलीलीटर पानी में घोल-छानकर 50-50 मिलीलीटर की मात्रा में पिलायें।
  • 5 ग्राम नीम के पत्ते की लई (लुगदी) की गोली को पानी या शहद के साथ लेने से लाभ मिलता है।
  • 25 ग्राम नीम के पत्ते को पीसकर 125 मिलीलीटर पानी में छानकर पीने से सभी प्रकार की उल्टी ठीक हो जाती है।
  • 5-5 ग्राम नीम की छाल, पटोल और गिलोय को मोटा-मोटा पीसकर 200 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालने के लिए रख दें, जब उबलने पर पानी लगभग 50 मिलीलीटर के करीब रह जाये तो उसे छानकर उसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम पीने से उल्टी के रोग में आराम आता है।
  • 25 ग्राम नीम के नये मुलायम पत्तों को लेकर पीस लें। फिर उसे 1 गिलास पानी में मिला लें। इस पानी को थोड़ा-थोड़ा करके पीने से सभी प्रकार की उल्टी बन्द हो जाती है।

57. बवासीर (अर्श) :

  • 50 मिलीलीटर नीम तेल, कच्ची फिटकारी 3 ग्राम, चौकिया सुहागा 3 ग्राम को बारीक पीस लें। शौच के बाद इस लेप को उंगली से गुदा के भीतर तक लगाने से कुछ ही दिनों में मस्से मिट जाते हैं।
  • नीम के बीज, बकायन की सूखी गिरी, छोटी हरड़, शुद्ध रसौत 50-50 ग्राम, घी में भूनी हींग 30 ग्राम तथा 50 ग्राम बीज निकाली हुई मुनक्का को घोटकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। इसकी 1 से 4 गोली दिन में 2 बार बकरी के दूध के साथ या ताजे पानी से लेने से बवासीर में लाभ मिलता है और खूनी बवासीर में खून का गिरना बन्द हो जाता है।
  • छिलके सहित कूटी हुई सूखी निबौली के 10 ग्राम बारीक चूर्ण को सुबह बासी पानी के साथ लें। ध्यान रहे कि सेवन क्रिया के दौरान घी का प्रयोग जरूर करें नहीं तो आंखों की रोशनी कम हो सकती है।
  • नीम की गिरी का तेल 2-5 बूंद शक्कर (चीनी) के साथ खाने से या कैप्सूल में भरकर निगलने से लाभ मिलता है। इसके सेवन के समय केवल दूध और चावल का ही प्रयोग करें।
  • नीम के बीज की गिरी, एलुआ और रसौत को बराबर मात्रा में लेकर कूटकर (मोटा कूटना) झड़बेरी जैसी गोलियां बना लें। इन गोलियों को रोजाना सुबह 1-1 गोली नीम के पत्तों के रस के साथ लेने से आराम मिलता है।
  • नीम के बीजों की गिरी 100 ग्राम और नीम के पेड़ की छाल 200 ग्राम को पीसकर 1-1 ग्राम की गोलियां बना लें, फिर 4-4 गोली दिन में 4 बार 7 दिनों तक खाने से तथा नीम के काढ़े से बवासीर के मस्सों को धोने से या नीम के पत्तों की लुगदी को बवासीर के मस्सों पर बांधने से लाभ मिलता है।
  • 100 ग्राम सूखी नीम की निबौली 50 मिलीलीटर तिल के तेल में तलकर पीस लें, बाकी बचे तेल में 6 ग्राम मोम, 1 ग्राम फूला हुआ नीला थोथा मिलाकर मलहम या लेप बनाकर दिन में 2 से 3 बार मस्सों पर लगायें। इसे मस्से पर लगाने से मस्से समाप्त हो जाते हैं।
  • फिटकरी का फूला 2 ग्राम, सोनागेरू 3 ग्राम, नीम की बीज की गिरी 20 ग्राम, सभी को घोटकर मलहम बना लें। फिर उसमें थोड़ा घी या मक्खन या गिरी का तेल मिला लें, इसे बवासीर के मस्सों पर लगाने से दर्द तुरन्त दूर होता है और खून का बहना बन्द होता है।
  • नीम की गिरी, रसौत, कपूर व सोनागेरू को पानी में पीसकर लेप करें या इस लेप को एरण्ड के तेल में घोंटकर मलहम (लेप) करने से मस्से सूख जाते हैं।
  • नीम के बीजों को तेल में तलकर, उसी में खूब बारीक पीस लें। इसके बाद फुलाया हुआ तूतिया डालकर बवासीर के मस्सों पर लेप करना चाहिए।
  • पकी नीम की निंबौली के रस में 6 ग्राम गुड़ को मिलाकर रोजाना सुबह सात दिन तक खाना चाहिए।

58. योनि दर्द :

  • निंबौली को नीम के पत्तों के रस में खूब पीसकर लंबी गोलियां बना लें, इसकी एक गोली को कपड़े के भीतर रखकर सिल लें और एक डोरा लटकता रखें, फिर इस गोली को योनि में रखने से दर्द मिटता है।
  • नीम की निबौलियों को कूट-पीसकर कपड़े की पोटली बनाकर योनि में रखने से योनि में दर्द कम होता है और प्रदर (खून का बहना) के जीवाणु खत्म हो जाते हैं।
  • नीम की कोपलों को पानी में उबालकर पीने से मासिक-धर्म चालू हो जाता है।
  • नीम के बीजों की गिरी और एरण्ड के बीजों की गिरी तथा नीम की पत्तों के रस को समान मात्रा में लेकर घोट लें, फिर इसमें रूई को भिगोकर योनि में रखने से दर्द मिटता है।
  • नीम की निंबौली और एरण्ड के बीजों के गूदे को नीम के रस में पीसकर योनि पर लेप करना चाहिए।
  • नीम की निंबोली (बीज) और एरण्ड के बीज के गूदा को नीम के पत्तों के रस में पीस लें, फिर इसे योनि में लगाने से योनि की पीड़ा शान्त होती है। नोट- इनमें से किसी एक के न मिलने पर किसी एक बीज के गूदे का प्रयोग भी कर सकते हैं।
  • नीम के पत्तों को पानी में पकाने के बाद ठंड़ा होने पर छान लें, फिर इस पानी से योनि को धोने से फुंसियों के कारण होने वाले योनि के दर्द में लाभ मिलता है।
  • नीम की छाल को पानी के साथ पीसकर योनि पर लेप करें। इससे  नाखूनों के द्वारा योनि को खुजलाने से हुए जख्म के दर्द में राहत मिलती है।

59. योनि में दुर्गन्ध : नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर, पानी को छानकर योनि की सफाई करने से सभी तरह के जीवाणु नष्ट होते हैं और बदबू कम होती है।

60. मासिक-धर्म का रुकना (रजोरोध) : नीम की छाल का चूर्ण 20 ग्राम, पिसी हुई जौ, गाजर के बीज 6 ग्राम, ढाक के बीज 6 ग्राम, काले तिल और पुराना गुड़ 20-20 ग्राम, आदि को मिट्टी के बर्तन में डालकर 300  मिलीलीटर में उबालें, जब यह पानी 100 मिलीलीटर शेष बचे तो इसे छानकर 7 दिनों तक पिलाने से मासिक-धर्म खुलकर आने लगता है। ध्यान रहे कि गर्भवत्ती स्त्री को इसे नहीं देना चाहिए।

61. योनि की शिथिलता दूर करना : नीम के पेड़ की छाल को अनेक बार पानी में धोयें, फिर उस पानी में रूई को भिगोकर रोजाना योनि में रखें तथा धोने से बची हुई छाल को सुखाने के बाद जलाकर उसका धुंआ योनि में देने से तथा नीम के पानी से बार-बार योनि को धोने से योनि टाईट हो जाती है।

62. पथरी (अश्मरी) :

  • नीम के पत्ते 120 ग्राम को पीसकर, 2 लीटर पानी में उबालें, जब चौथाई पानी जल जाये तो इसे नीचे उतारकर बफारा देने से पथरी निकल जाती है।
  • नीम के 2 ग्राम पत्तों को 50 से 100 मिलीलीटर तक पानी में पीसकर छान लें। इस पानी को लगातार 45 दिनों तक सुबह, दोपहर और शाम को पिलाते रहने से पथरी गलकर निकल जाती है।
  • नीम के पत्तों की राख 1 चम्मच ठंड़े पानी से दिन में 3 बार रोजाना सेवन करने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी गलकर बाहर निकल जाती है।
  • नीम के पत्तों को सूखा कर चूर्ण बना लें। प्रतिदिन आधा चम्मच चूर्ण पानी के साथ सुबह-शाम खायें। यह दोनों प्रकार की पथरी को ठीक करती है।
  • नीम का काढ़ा बनाकर पीने से पेट की पथरी गल जाती है तथा पेट दर्द में आराम मिलता है।

63. सफेद प्रदर (श्वेत प्रदर) :

  • नीम की छाल और बबूल की छाल को बराबर लेकर काढ़ा बना लें। इस काढे़ को सुबह-शाम सेवन करने से श्वेतप्रदर में लाभ मिलता है।
  • कड़वे नीम की छाल के रस में पिसा हुआ सफेद जीरा डालकर 7 दिनों तक पीने से प्रदर रोग मिट जाता है।
  • नीम के पत्तों को पानी में उबालकर उस पानी को छानकर योनि साफ करने से श्वेत प्रदर के ´´ट्राइकोमोनास वैजाइनैलिस´´ नामक जीवाणु मिट जाते हैं।

64. कठिनाई से होने वाला प्रसव (कष्ट प्रसव) और सूतिका बुखार :

  • नीम के बीजों के 3-6 ग्राम चूर्ण के सेवन से लाभ पहुंचता है। सूखे फलों के चूर्ण का दाल तथा सब्जी (शाक) में छोंक लगाकर सेवन करने से अनेक रोगों में लाभ मिलता है।
  • नीम की छाल का काढ़ा 10-20 मिलीलीटर की मात्रा में 6 दिनों तक सुबह-शाम पिलाएं। इससे बच्चे के जन्म के बाद महिला के शरीर में रुका हुआ दूषित खून बाहर निकल जाता है।
  • नीम की 6 ग्राम छाल को पानी के साथ पीसकर 20 ग्राम घी में मिलाकर, कांजी के साथ पिलाने से सूतिका बुखार में आराम मिलता है।

65. पेशाब करने में कठिनाई होना (मूत्रकृच्छ) : नीम की सींक और पत्तों के 25 मिलीलीटर रस को उन्नाव औषधि के साथ पिला सकते हैं।

66. कफज मेह : नीम के सींकों के काढ़े में 1 ग्राम त्रिकुटा चूर्ण मिलाकर 30 दिनों तक सेवन करने से कफज मेह दूर होते हैं।

67. उपदंश (फिंरग) :

  • नीम की 20 ग्राम छाल और जौ को कूटकर 1 लीटर गर्म पानी में डालकर रात भर रखा रहने दें, सुबह होने पर इसे छानकर 50 मिलीलीटर पीयें तथा बचे हुए पानी से उपदंश के जख्मों को साफ करे। इससे लाभ मिलता है। परहेज: इस प्रयोग के समय भोजन में रोगी को केवल घी, खाण्ड और गेहूं की पतली रोटी दे सकते हैं।
  • नीम की बीच की छाल को 5 ग्राम घिसकर उसमें बिल्कुल थोड़ी सी मिश्री मिलाकर पीना चाहिए।
  • उपदंश में नीम का रस 125 मिलीलीटर सुबह-शाम रोज 2 बार पीने से लाभ होता है।
  • 10 ग्राम नीम के पत्ते पानी के साथ पीसकर उसमें 3 ग्राम अजवायन मिलाकर पीने से उपदंश मिट जाता है।
  • 10 ग्राम नीम के पत्ते को पीसकर बकरी के दूध की लस्सी के साथ लेने से उपदंश मिटता है।
  • 250 ग्राम कड़वे नीम के पत्ते को लगभग 2 लीटर पानी में उबालें, जब डेढ़ लीटर पानी रह जाये तो तब उतार लें। ठंड़ा हो जाने पर इस पानी को उपदंश के घावों पर डालते हुए उन्हें सावधानी से धीर-धीरे साफ करें। इससे उपदंश के घाव ठीक हो जाते हैं।
  • उपदंश के घावों पर जोंक लगाकर नीम के पत्ते बांधना चाहिए।
  • नीम, अर्जुन, पीपल, कदम, शाल, जामुन, बड़, गूलर और बेन्त इन सबको पीसकर लेप करने या इनकी छालों को भिगोकर घावों को धोने या चूर्ण को बुरकने से उपदंश के घावों में लाभ होता है।
  • नीम का तेल 5 से 10 बूंद रोजाना सुबह-शाम खाने से लाभ होता है इसको बाहर से घाव पर लगायें।

68. सिकता मेह, मधुमेह होने पर :

  • नीम की छाल के काढ़े को 10-20 मिलीलीटर नियमित रूप से सुबह-शाम इन रोगों में प्रयोग कर सकते हैं।
  • नीम की छाल या डंठल का काढ़ा दे सकते हैं।

69. सुजाक (गिनोरिया) : नीम की छाल के मोटे-मोटे चूर्ण को 40 ग्राम लेकर लगभग 3 लीटर पानी के साथ मिट्टी के बर्तन में उबालें, जब यह 200 मिलीलीटर शेष बचे तो इसे छानकर पुन: पकायें और 20 या 25 ग्राम कलमीशोरा चूर्ण चुटकी से डालते जायें तथा नीम की लकड़ी से हिलाते रहें, फिर इसे पीस-छानकर रख लें। इस काढ़े को लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग की मात्रा में रोजाना गाय के दूध की लस्सी के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है।

70. साइटिका पेन :

  • बड़े नीम (बकायन) के पत्तों का रस 2 चम्मच, 1 कप पानी में मिलाकर रोजाना 2 बार पिलायें तथा पीड़ित भाग पर मालिश करें।
  • नीम के वृक्ष की कोपलें 20 ग्राम सुबह भूखे पेट चबाकर खायें, रात को सोते समय 50 ग्राम गुड़ और 6 ग्राम देशी घी मिलाकर खाने से सायटिका (कूल्हे से लेकर पैर के पंजे तक आने वाले दर्द) ठीक हो जाता है।
  • साइटिका के रोगी को नीम की जड़ का काढ़ा बनाकर पिलाने से तथा उसी का लेप बनाकर लेप करने से लाभ मिलता है।

71. गर्भनिरोध :

  • नीम के शुद्ध तेल में रूई का फोहा तर करके सहश्वास (संभोग) करने से पहले योनि के भीतर रखने से शुक्राणु (बच्चा पैदा करने वाले जीवाणु) 1 घंटे के भीतर ही मर जाते हैं और गर्भ नहीं ठहरता है।
  • 10 ग्राम नीम के गोंद को 250 मिलीलीटर पानी में डालकर कपड़े में छान लें, उसमें लगभग 30 सेंटीमीटर लंबा और 30 सेंटीमीटर चौड़ा साफ मलमल के कपड़े को भिगोकर छाया में सुखा लें, सूखने पर रुपये के बराबर आकार के गोल-गोल टुकड़े अन्दर डाल लें, इससे गर्भ नहीं रुकता है। इसे लगाने के 1 घंटे बाद निकालकर बाहर फेंक दें।

72. वातरक्त (खूनी वात) और गठिया (जोड़ों में दर्द) :

  • नीम के पत्ते 20 ग्राम, कड़वे परवल के पत्ते 20 ग्राम को 300 मिलीलीटर जल में उबालें, जब यह एक चौथाई शेष बचे तो इसमें शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें। इससे खून की सफाई होती है। इसके साथ ही नीम के पत्तों को छाछ में उबालकर पीसकर लेप करते रहना चाहिए।
  • नीम की छाल को पानी के साथ पीसकर रस निकाल लें। इस रस की 10-20 बूंदों को 2 से 4 दिन तक सेवन करें। इसके सेवन के 2 घंटे के बाद ताजी बनी हुई रोटी घी के साथ आहार (भोजन) में लेने से लकवा, आधे शरीर में लकवा होना (अर्द्धांवात) व गठिया में लाभ होता है।
  • नीम के तेल की मालिश करने से लाभ होता है।
  • नीम के तेल की कुछ बूंदे डालकर पिलाने से ऐंठन तथा अन्य प्रकार के वात रोग समाप्त हो जाते हैं।
  • नीम के ताजे पत्ते और 60 ग्राम लाल-लाल कोपलें, 250 मिलीलीटर उबलते हुए सरसों के तेल में डालें, तेल में कोपलें जब काली हो जायें, तब तेल को छान लें, ध्यान रखें कि कोपलें जलकर राख न हो। इस तेल को लगाने से जला हुआ घाव और जोड़ों के दर्द में लाभ मिलता है।

73. आतशक : 1 चम्मच नीम के तेल को रोजाना पीने से तथा गुप्तांगों पर लगाने से आतशक 14 दिनों में ठीक हो जाता है।

74. कफज्वर : नीम की छाल, पीपल की जड़, हरड़, कुटकी और अमलतास को बराबर मात्रा में लेकर 1 लीटर पानी में उबालें, जब यह आठवां हिस्सा शेष बचे तो इसे आग पर से उतार लें, इस काढ़ा को 10-20 ग्राम सुबह-शाम सेवन करें।

75. विष (जहर) :

  • नीम की 2 निबौली तथा सेंधानमक व कालीमिर्च का चूर्ण 10-10 ग्राम को एक साथ मिलाकर बारीक कर लें। इस मिश्रण को शहद में मिलाकर खिलाने से स्थावर और जंगम विष समाप्त होता है।
  • पकी व कच्ची निबौलियां 8-10 ग्राम को पीसकर गर्म पानी में मिलाकर पिलाएं। इसके सेवन के तुरत बाद ही उल्टी होकर अफीम, संखिया, बच्छनाभ आदि विषों से पीड़ित व्यक्ति तुरन्त अच्छा हो जाता है।

76. विषम ज्वर :

  • नीम की छाल के काढ़े में धनिया और सोंठ का चूर्ण मिलाकर देने से विषम ज्वर में लाभ होता है।
  • नीम, पटोल के पत्ते, दाख (मुनक्का), नागरमोथा, इन्द्रजौ और त्रिफला को मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को पीने से विषम बुखार दूर होता है।
  • 400 ग्राम नीम के पत्ते, 120 ग्राम सौंठ, कालीमिर्च, पीपल, त्रिफला, तीनों प्रकार के नमक, 80 ग्राम सज्जी और जवाखार तथा 200 ग्राम अजवाइन को मिलाकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को सुबह-शाम लेने से विषम ज्वर में लाभ मिलता है।
  • नीम के पत्ते, घुड़बच, हरड़, शिरस, घी और गुग्गुल इनको जलाकर धुआं देने से विषमज्वर समाप्त होता है।

77. आगन्तुक व्रण (जख्म) और फोड़े होने पर : गर्म तेल में नीम के पत्तों को जलाकर बारीक कर लें। इसे फोड़े और आगन्तुक घाव के जख्मों पर लगाने से बहुत लाभ होता है।

78. बिच्छू के काटने पर : बिच्छू के दंश पर नीम के पत्ते या फूल सुंघाना चाहिए या नीम की पत्तियों को चबाते हुए मुंह की हवा बाहर न निकालकर दंश से पीड़ित अंग के दूसरी ओर के कान में फूंक देना चाहिए।

79. भूख को बढ़ाने के लिए :

  • 20 ग्राम नीम की छाल को कूटकर लगभग 470 मिलीलीटर पानी में उसका अष्टमांश काढ़ा बनायें। इसे काढ़े में 3 ग्राम शहद डालकर रोजाना सुबह पीने से भूख खूब लगती है।
  • नीम के गुलाबी कोमल पत्तों को चबाकर उसका रस पीने से आंत्र (आंत) के कीड़े नष्ट होते हैं।

80. बाला या नारू रोग :

  • नीम के कोमल पत्ते को सुबह-शाम रोजाना लेने से बाला रोग नहीं होता है तथा खून में उत्पन्न हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं।
  • नीम के पत्तों को पीसकर लेप करें।

81. कुष्ठ रोग (कोढ़) :

  • 1 साल तक नीम के पेड़ के नीचे रहने से लाभ होता है।
  • नीम की लकड़ी की दातुन करनी चाहिए।
  • नीम के सूखे पत्तों का चूर्ण और हरड़ के बारीक चूर्ण को समान मात्रा में लेकर मिश्रण तैयार कर लें। इस मिश्रण को एक चम्मच की मात्रा में 4-6 हफ्ते सुबह और नियमित सेवन करने से लाभ होता है।
  • चारपाई (शय्या) पर नीम की ताजी पत्तियां बिछानी चाहिए।
  • नीम की पत्तियों के काढ़े से नहाना चाहिए।
  • नीम के तेल में नीम की पत्तियों की राख को मिलाकर कोढ़ के जख्मों पर रोजाना लगाना चाहिए।
  • 10 मिलीलीटर नीम की पत्तियों के रस को सुबह पीना चाहिए।
  • शरीर में नीम के पत्तों का रस व नीम के तेल की मालिश करनी चाहिए।
  • भोजन के बाद 50-50 मिलीलीटर नीम का रस पीना चाहिए।
  • नीम और चालमोगरा के तेल को समान मात्रा में मिलाकर कोढ़ पर लगाना चाहिए।
  • नीम की जड़ के 10 ग्राम चूर्ण को नियमित रूप से खैर के बीस ग्राम काढ़े के साथ सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
  • नीम के बीजों की गिरी प्रत्येक दिन 1 गिरी, दूसरे दिन 2 गिरी को निंरतर बढ़ाते हुए जाये तथा इसी प्रकार 100 गिरी तक खाने के बाद क्रम उलटा करके खाने के बाद इसका सेवन बन्द कर दें। ध्यान रहे कि चने की रोटी और घी के अलावा कुछ और भी नहीं देना चाहिए।
  • गर्मी के मौसम में 10 ग्राम नीम पर पकी हुई निबौली रोजाना खाने से कुष्ठ (कोढ़) रोग जल्दी ठीक होता है और खून के जीवाणु समाप्त हो जाते हैं।
  • 100-100 ग्राम करंज, नीम और खादिर के पत्तों को पानी में उबालकर नहाने से कुष्ठ (कोढ़) रोग ठीक हो जाता है।
  • नीम के पत्तों को पानी में उबालकर रोजाना उस पानी से नहाने से और कुष्ठ (कोढ़) के जख्मों को धोने से कुष्ठ (कोढ़) का असर कम होता है।
  • नीम के कोमल पत्तों और गिलोय का रस बराबर मात्रा में मिलाकर रोजाना पीने से कुष्ठ विकृति (कोढ़ की बीमारी) समाप्त होने लगती है।
  • कुष्ठ रोग (कोढ़) में नीम का तेल लगाने से लाभ होता है। इसके साथ ही इस तेल की 5 से 10 बूंदे रोजाना 2 बार पीना चाहिए। नीम के तेल में चालमोंगरा का तेल मिलाकर लगाने से भी काफी जल्दी आराम होता है।
  • कुष्ठ रोग (कोढ़) में नीम के पत्तों को आंवला या हरीतकी के साथ पीसकर 3 से 6 ग्राम सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।
  • 3-3 ग्राम आंवला और नीम के कोमल पत्तों को पीसकर शहद के साथ मिलाकर खाने से कुष्ठ (कोढ़) के जख्मों में पूयस्त्राव (मवाद) बहना बन्द होता है।
  • रोजाना नीम के काढ़े से कोढ़ के जख्म को धोना भी चाहिए। इससे यह रोग जल्दी समाप्त होने लगता है।
  • त्रिफला, गिलोय, परवल, नीम, अडूसा और खैरसार को एक साथ मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को रोजाना सुबह-सुबह पीने से `कण्डू´ `पामा´ `विसर्प´ और `किटिभ´ नाम का कोढ़ रोग मिट जाता है।
  • नीम के पत्तों को पानी में उबालकर उसी पानी से नहायें। गाय के दूध में 3 ग्राम नीम के पत्तों को पीसकर दो-तीन महीने तक खायें और रात को सोते समय नीम के नीचे सोयें। दो-तीन महीने में गलित-कुष्ठ (कोढ़ में चमड़ी का गलना) रोग ठीक हो जाता है।
  • नीम के ताजे पत्तों का रस लगाने से कोढ़ के रोग में बहुत जल्दी आराम आता है।
  • नीम और गिलोय का रस पीने से कफ-पित्त (बलगम और गर्मी) का कोढ़ मिट जाता है।
  • नीम की छाल का काढ़ा और योगराज गुग्गुल लेने से बढ़ा हुआ कोढ़ का रोग जल्दी ही समाप्त हो जाता है।
  • नीम के फूल, फल और पत्ते का चूर्ण 2 ग्राम से 6 ग्राम तक 40 दिनों तक खाने से सफेद कोढ़ में आराम हो जाता है।
  • नीम के पेड़ से निकलने वाले रस को पीने से खून साफ हो जाता है और कोढ़ का रोग दूर हो जाता है।

82. सफेद कुष्ठ (सफेद दाग) :      

  • ताजे नीम के पत्ते 5 पीस और हरा आंवला 10 ग्राम (हरे आंवले के अभाव में सूखा आंवला 6 ग्राम)। इसे सुबह सूर्योदय के पहले ही ताजे पानी में पीस-छानकर पीयें तथा केले के रस में पिसी हल्दी और गाय के पेशाब को मिलाकर सफेद दागों पर लगाने से लाभ मिलता है।
  • नीम के पत्ते, फूल और फल को बराबर लेकर पानी के साथ डालकर बारीक पीस लें। इसे 2 ग्राम की खुराक के रूप में सेवन करने से लाभ मिलेगा।
  • नीम की पत्तियों और फूलों को एक साथ पीसकर पानी के साथ मिलाकर सफेद दागों पर लगाने से वे ठीक होने लगते हैं।
  • नीम के तेल में चालमोंगरे का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर शीशी में भरकर रख लें। इस तेल को सफेद दागों पर लगा लें और 5 से 6 बूंद बताशे में डालकर खा लें।
  • 5 नीम के ताजे कोमल पत्ते और 10 ग्राम हरा आंवला को पीसकर 50 मिलीलीटर पानी में मिलाकर और छानकर पीने से सफेद दाग ठीक हो जाते हैं।

83. त्वचा (चर्म) रोग :

  • 100 साल पुराने नीम के पेड़ की सूखी छाल को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें, रात को सोने से पहले 3 ग्राम चूर्ण पानी के साथ भिगो दें। सुबह उठकर शहद के साथ मिलाकर पिलाने से छाजन, खाज-खुजली, फोड़ा, फुंसी और उपदंश के रोगों में आराम मिलता है।
  • नहाते समय नीम को पानी में मिलाकर नहाने से त्वचा के सारे रोग मिट जाते हैं।
  • नीम, निर्गुण्डी और करंज को पीसकर इसका लेप करने से फुंसियों को फैलाने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
  • नीम के पत्तों के रस की पट्टी बांधने से और बदलते रहने से लाभ मिलता है।
  • गीली छाजन होने पर नीम की 8-10 पत्तों को पीसकर बांधना चाहिए।
  • नीम के पत्तों की 5-10 ग्राम राख को लगाने से आराम मिलता है।
  • नीम के तेल को शहद में मिला दें, फिर उसमें रूई की बत्ती को भिगोकर कान में रखने से कान में पीव का आना बन्द होता है।
  • पुराने नीम की सूखी लकड़ी को पानी में घिसकर खुजली वाले स्थान पर लेप करना चाहिए ।
  • 10 मिलीलीटर नीम के पत्ते के रस को शहद के साथ दिन में 2 बार दें। इससे त्वचा के विभिन्न रोग दूर होते है।
  • नीम का तेल खुजली में लगाना चाहिए। खून की खराबी से शरीर पर पड़े हुए दागों और मूलव्याधि (बवासीर) के लिए भी यह बहुत लाभकारी होता है।
  • गर्मियां जब शुरू हो तो 30 ग्राम नीम की कोपले (नयी पत्तियों) को पीसकर पानी में मिलाकर रोजाना पीने से फोड़े-फुंसी, दाद, खुजली, खून के रोग, वात (गैस), पित्त (गर्मी) और बलगम आदि रोग समाप्त हो जाते हैं। अगर फोड़ा फूट जाने पर मवाद बह रहा हो तो नीम के पत्तों को पीसकर शहद में मिलाकर लगाने से लाभ होता है।
  • 100 ग्राम नीम के पत्ते, 200 ग्राम कनेर के पत्ते और 80 ग्राम बकायन को मिलाकर पीस लें और इसकी टिकिया बना लें। फिर आधा किलो मीठा तेल और 130 ग्राम मोम कड़ाही में डाल लें और इसके अन्दर पहले से बनायी हुई टिकिया भी डालकर आग पर पकाने के लिए रख दें। जब टिकिया जल जाये तो उसे छानकर बोतल में भर लें। यह तेल जख्म को भरने के लिए बहुत ही ज्यादा लाभकारी है।
  • 175 ग्राम नीम के पत्ते को पानी डाले बिना पीसकर लेप बना लें। एक तांबे के बर्तन में लगभग 90 मिलीलीटर सरसों का तेल डालकर गर्म कर लें। जब गर्म करते हुए तेल में धुंआ उठने लगे तो यह लेप इसमें डाल दें। जब लेप तेल में जलकर काला पड़ जाये तो इसे उतारकर ठंडा होने दें। फिर इसमें कपूर और थोड़ा सा पीला मोम डालकर पीस लें। खून के खराब होने की वजह से होने वाले फोड़े-फुंसी, दाद, त्वचा पर पपड़ी जमना और फुंसी के जख्म हो जाने पर इस लेप को लगाने से जल्दी लाभ मिलता है।
  • नीम के फूल 50 ग्राम पीसकर, एक गिलास पानी में घोल-छानकर, स्वादानुसार शहद मिलाकर पीने से खून साफ हो जाता है। इसके फूलों को पानी के साथ पीसकर लेप करने से दाद, फोडे़-फुंसी आदि रोग ठीक हो जाते हैं।

84. दाद :

  • नीम के 8 से 10 पत्तों को दही में पीसकर लेप करने से दाद समाप्त होता है।
  • नीम के पेड़ की एक गीली लकड़ी को जलायें, जलाने पर इस लकड़ी में से पानी निकलेगा। इस पानी को दाद पर लगाने से दाद ठीक हो जाता है।
  • नीम के पत्तों के रस में कत्था, गन्धक, सुहागा, पित्तपापड़ा, नीला थोथा व कलौंजी को बराबर लेकर खूब पीसकर गोली बना लें। इसकी गोली को पानी में घिसकर दाद पर लगाने से अवश्य लाभ होगा।
  • 12 मिलीलीटर नीम के पत्तों का रस रोजाना पीने से दाद ठीक हो जाता है।
  • दाद को खुजालकर उस पर नीम का तेल लगाने से दाद में लाभ होता है।
  • नीम की कोपले (नये मुलायम पत्ते) को पीसकर पानी में मिलाकर रोजाना पीने से दाद ठीक हो जाता है।

85. त्वचा का खुरदरा होना: नीम के पत्तों की पोटली से त्वचा को सेंककर नीम के पानी से नहाना चाहिए और फिर नीम के पत्तों को जलाकर उनकी राख को लगाने से त्वचा नर्म हो जाती है।

86. शीतपित्त :

  • नीम की पेड़ की छाल को बारीक पीसकर गर्म पानी में मिलाकर छान लें, फिर इसे आंवला के 4 ग्राम चूर्ण के साथ सेवन करने से शीतपित्त समाप्त होती है।
  • शरीर के ददोरे पर कालीमिर्च के चूर्ण को घी में मिलाकर मसलने से या तेल में कपूर की मालिश करें।
  • नीम के हरे पत्ते साफ करके तब तक खाते रहे जब तक की पत्ते कड़वे लगने शुरू नहीं हो जाते हैं।
  • नीम का तेल या नीम के बीज की गिरी सरसों के तेल में जलाकर उस तेल की शीत पित्त की बीमारी में मालिश करें।
  • नीम की नई कोमल पत्ती को आंवलों के साथ पीसकर घी के साथ खाने से शीत पित्त की बीमारी खत्म होती है।
  • शीतपित्त में सात हरी निबौली चबानी चाहिए। छोटे बच्चों को 2 निबौली 12 मिलीलीटर पानी में घिसकर देने से पित्ती में शीघ्र ही फायदा होता है।

87. निमोनिया (ठंड़ लगकर बुखार का आना) : नीम की पत्तियों के रस को थोड़ा-सा गर्म करके सीने पर मालिश करें।

88. छोटी लड़कियों के कान के छेदने पर होने वाले दर्द में : कान के छेदने के 21 दिन बाद नीम की सींक छेद में डालने से घाव जल्दी ठीक होता हैं। उनमें जीवाणु नहीं पड़ते हैं तथा इसके बाद गहने पहनने से कान पकते नहीं हैं।

90. घाव (जख्म) :

  • नीम की छाल और खैरसार लेकर 50 मिलीलीटर गाय के पेशाब में पीसकर छान लें, फिर इसे 6 ग्राम की मात्रा में सुबह, दोपहर और शाम को शहद के साथ पिलाने से लाभ मिलता है।
  • नीम के पत्तों के काढ़े से घाव को अच्छी तरह धोयें। छाल की राख को भर देने से हमेशा बहने वाले फोड़ों में लाभ पहुंचता है।
  • नीम की गिरी के 100 मिलीलीटर तेल में 20 ग्राम मोम को डालकर पकायें, जब दोनों अच्छी तरह मिल जाये तो आग से उतारकर 10 ग्राम राल का चूर्ण मिलाकर रख लें। इस चूर्ण में थोड़ा-सा संगज राहत मिलाकर मलहम बना लें। इस मलहम को व्रण (जख्म) में जलन होने पर, आग से जले हुए घाव और अन्य घावों में लगाने से लाभ होता है।
  • नीम के हरे पत्तों को अच्छी तरह पीसकर कपड़े में लेकर निचोड़कर रस निकालें। इस रस में रूई को भिगो दें, फिर रूई को घी में गर्म करके घाव पर पट्टी बांधे।
  • नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर छान लें, इस पानी से घाव को धोने से पूय (मवाद) के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
  • फोड़े की सूजन कम करने के लिए नीम के पत्ते, तिल, दन्ती, निशोथ, सेंधानमक तथा शहद इन सभी को पीसकर लेप बना लें, फिर इस लेप को रोगी के घाव पर लगाने से रोग में आराम मिलता है। इससे फोड़े की सूजन भी कम हो जाती है।
  • नीम के पत्तों को पीसकर लेप करने से फोड़ा फूट जाता है और रोगी को काफी आराम मिलता है।
  • नीम और हींग को पीसकर फोड़े पर लेप करने से फोड़े के कीड़े मर जाते हैं और घाव जल्द ठीक हो जाता है। 

91. भगन्दर :

  • नीम के तेल में कपूर को मिलाकर रख लें, फिर इसमें रूई को भिगोकर उसकी बत्ती बनाकर भगन्दर से पीड़ित व्यक्ति के गुदा के अन्दर रखें, ऊपर से इसी तेल की पट्टी बाधे। इससे भगन्दर, कंठमाला (गले में गिल्टी का होना), गलगण्ड (घेंघा) आदि रोगों में लाभ होता है।
  • नीम के पत्तों को शहद के साथ पीसकर लेप करने से लाभ होता है।
  • नीम के पेड़ की जड़ का चूर्ण 6 ग्राम की मात्रा में रोजाना नियमित रूप से लेने से जीर्ण (पुराना) भगन्दर ठीक होता है।
  • नीम की पत्तियां, घी और तिल 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर उसमें 20 ग्राम जौ के आटे को मिलाकर जल से लेप बनाएं। इस लेप को कपड़े के टुकड़े पर फैलाकर भगन्दर पर बांधने से लाभ होता है।
  • नीम की पत्तियों को पीसकर भगन्दर पर लेप करने से विकृति नष्ट होती है।
  • नीम के पत्ते, तिल और मुलैठी, इनको गाढ़ी छाछ में पीसें, फिर इसे खूनी (रुधिर) वाले तथा दर्द वाले भगन्दर में लगाने से भगन्दर ठीक होता है।

92. फोड़े-फुंसियां :

  • नीम की 6-10 पकी निबौली 2 से 3 बार पानी के साथ देने से फुन्सियां समाप्त होती हैं।
  • नीम, तुलसी और पुदीने की पत्तियों को पीसकर, उसमें मुल्तानी मिट्टी और चंदन का चूर्ण मिलाकर बने मिश्रण को चेहरे पर लगाने से चेहरे के मुंहासे समाप्त होकर त्वचा निखर जाती है।
  • नीम की छाल को घिसकर थोड़े दिनों तक लगाने से छोटी फुंसियां दूर हो जाती हैं।
  • नीम की पत्तियों का रस पानी में मिलाकर नहाने से खाज-खुजली नष्ट होती है।
  • नीम की पत्तियों को पीसकर फोडे़-फुन्सियों पर लगाने से लाभ होता हैं।
  • शरीर में छोटी-छोटी फुंसियों पर नीम या तारपीन का तेल लगाने से लाभ मिलता है।
  • नीम के पत्ते, छाल और निबौली को बराबर मात्रा में पीसकर लेप बना लें। इस लेप को दिन में 3 बार लगाने से फोड़े-फुंसी और घाव ठीक हो जाते हैं।
  • नीम की पत्तियों को गर्म करके या नीम की छाल को घिस करके फोड़े-फुंसी और बिच्छू के काटे भाग पर लगाकर सेंकने से लाभ होता है।
  • नीम के पत्ते को पीसकर शहद के साथ मिलाकर लेप करने से फूटे हुए फोड़े जल्दी ठीक हो जाते हैं।
  • नीम के पत्ते को पीसकर दही और बेसन में मिलाकर चेहरे व दूसरे अंगों में लगायें। इसे लगाने के कुछ देर बाद पानी से साफ कर देने से चेहरे की फुंसियां और मुंहासे समाप्त होकर त्वचा निखर उठती है।
  • 175 ग्राम नीम के पत्ते को बिना पानी डाले पीसकर लुगदी बना लें, फिर तांबे के बर्तन में इसका आधा हिस्सा सरसों का तेल डालकर गर्म करें, जब तेल में धुंआ आने लगे तो इसमें लुगदी डाल दें। जब लुगदी तेल में जलकर काली पड़ जाए तो उतारकर ठंड़ा कर लें। इसके बाद इसमें कपूर और थोड़ा-सा मोम डालकर पीस लें। इस बने लेप को लगाने से लाभ होता है।
  • नीम की ताजी कोंपले (मुलायम पत्तियां) रोजाना दातुन-कुल्ला करने के बाद चबाकर खाने से पूरे साल तक फोड़े-फुंसिया नहीं निकलती हैं।

93. विश्राम स्थल : नीम के पेड़ की शीतल छाया में विश्राम करने से मन प्रसन्न और शरीर स्वस्थ रहता है।

94. मच्छर के लिए : सूखी नीम की पत्तियों को जलाकर धुंआ करने से मच्छर भाग जाते हैं।

95. पाचन : नीम की मुलायम कोपलों को चबाने से हाजमा ठीक रहता है।

96. अनाज को सुरिक्षत रखना : सूखी पत्तियों को अनाज में रखने से उनमें कीड़े नहीं पड़ते हैं।

97. कपड़ों तथा किताबों में कीड़े होने पर : नीम की पीली और सूखी पत्तियों को रखने से कीड़े नहीं लगते हैं।

98. कब्ज :

  • नीम के फूलों को सुखाकर पीस लें। इस चूर्ण को चुटकी भर रोजाना रात को गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज की शिकायत नहीं रहती है।
  • नीम की 20 पत्तियों को पीसकर 1 गिलास पानी में मिला लें, सुबह-सुबह इससे एक कुल्ला करके यह सारा पानी पीने से कब्ज़ नहीं रहता है।
  • नीम के सूखे फल को रात में गर्म पानी के साथ खाने से शौच खुलकर आती है।

99. गले में दर्द : 2 चम्मच नीम की पत्तियों के रस को 1 गिलास गर्म पानी में, आधा चम्मच शहद मिलाकर रोजाना गरारे करें। इससे गले में जलन, दर्द तथा जमा हुआ कफ दूर होता है।

100. स्तनों के दूध को सूखाना :

  • नीम की निंबौली की गिरी को पीसकर स्तनों पर लेप करने से स्तनों का बढ़ा हुआ दूध सूख जाता है।
  • नीम की पत्तियों को पीसकर स्तनों पर लेप करने से असर होता है।

101. जोड़ों में दर्द : नीम के तेल की मालिश या नीम के पत्ते को पानी में उबालकर भाप से सेंकने और गर्म पत्ते बांधने से आराम मिलता है।

102. कनफेड : नीम की 4 कच्ची निंबौली सुबह-शाम रोजाना 2 बार चबाने से लाभ होता है।

103. नासूर (पुराना जख्म) :

  • नीम की पत्तियों की पोटली बांधें।
  • बराबर मात्रा में नीम और तिल का तेल मिलाकर प्रतिदिन 2 या 3 बार नासूर में लगाने से आराम मिलता है।
  • बेर और नीम के पत्तों को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर बांधने से नासूर का रोग दूर हो जाता है।
  • नीम की पत्तियों को पीसकर बने लेप को घाव पर लगाकर बांधने से लाभ मिलता है।
  • फोड़े या नासूर में से ज्यादा मवाद बहने पर नीम की छाल की राख लगाने से लाभ होता है।
  • नीम के पत्ते और बेर के पत्तों को पीसकर नासूर और फोड़े पर लगाने से लाभ मिलता है।

104. अपच (भोजन का पचना): नीम की पत्ती 25 ग्राम, 3 लौंग, 3 कालीमिर्च पीसकर थोड़ा-सा पानी और शक्कर (चीनी) मिलाकर सुबह-शाम रोजाना दिन में 3 बार पीयें।

105. मासिकस्राव में होने वाला जांघों का दर्द : मासिक-धर्म के दिनों में दर्द जांघों में हो तो नीम के पत्ते का रस 6 मिलीलीटर, अदरक का रस 12 मिलीलीटर को पानी में मिलाकर पिलाने से दर्द में तुरन्त आराम मिलता है।

106. शरीर पित्ती उछल आने पर :

  • नीम के तेल या नीम के बीज की गिरी को सरसों के तेल में जलाकर उस तेल की मालिश करें। इसके अलावा नीम के पत्ते जब तक कड़वे न लगे, चबाते रहने से पित्ती ठीक होती है।
  • नीम के पेड़ की डंठल, धनिया, सोंठ और शक्कर (चीनी) का काढ़ा बनाकर देना चाहिए।

107. बुखार की कमजोरी : नीम की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से बुखार के बाद आई कमजोरी मिटती है।

108. पारी का बुखार :

  • नीम की छाल का काढ़ा दिन में 3 बार पिलाने से पारी का बुखार नहीं आता है।
  • नीम की कोंपलें और कालीमिर्च को बराबर मात्रा में लेकर घोटकर पिलाने से पारी का बुखार उतर जाता है।

109. दिमाग के कीड़ों के लिए : लगभग 5 मिलीलीटर नीम के पत्तों के रस को लगभग 50 मिलीलीटर तिल के तेल में मिलाकर नाक में डालकर सूंघने से दिमाग के कीड़े मर जाते हैं।

110. सुख से प्रजनन के लिए : नीम के वृक्ष की जड़ को कमर पर बांधने से प्रसव (बच्चे का जन्म) आसानी हो जाता है, प्रसव होने पर इसे हटाना चाहिए।

111. सोमल, अफीम के विष तथा कृमि (कीड़े) : नीम के पत्तों का रस देना चाहिए।

112. स्थावर, जंगम तथा सभी जहरों पर : सेंधानमक और कालीमिर्च को बराबर मात्रा में लें तथा इन दोनों के बराबर ही नीम की निंबौली लेकर एक साथ पीस लें, फिर इसे शहद और घी के साथ सेवन करने से आराम मिलता है।

113. सभी प्रकार के जख्मों पर : नीम के पत्ते, दारूहल्दी और मधुयिष्ठ के चूर्ण में घी और शहद को मिलाकर लेप बना लें। इस लेप को लगाने से घाव तुरन्त भर जाता है।

114. गर्मी में शरीर में ठंड लाने और दस्त रोकने के लिए : नीम के पत्तों को पीसकर उसमें शक्कर (चीनी) मिलाकर पिलाना चाहिए।

115. उरूस्तंभ होने पर (जांघों की सुन्नता) : नीम की जड़ को घिसकर गर्म लेप करना चाहिए।

116. प्रमेह (वीर्य विकार), उपदंश (गर्मी) और बादी पर : नीम की छाल को मिट्टी के बर्तन में रख लें, उसमें लगभग 1 लीटर उबाला हुआ पानी डालें और ढककर रख दें, दूसरे दिन शक्ति के अनुसार 1 या 2 बार, 40-40 मिलीलीटर पीना चाहिए। इससे 1-2 सप्ताह में ही गर्मी (उपदंश) जन्य रोग अच्छे हो जाते हैं। इस प्रयोग के दौरान घी, शक्कर और रोटी के अलावा कुछ भी न खाएं।

117. दांतों का दर्द : नीम की दातुन करने से दांतों में कीड़े नहीं लगते तथा दांतों में लगे हुए कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

118. आंख आना :

  • नीम के पत्ते और मकोय का रस निकालकर पलकों पर लगाने से आंखों का लाल होना दूर होता है।
  • नीम के पानी से आंखों को धोकर आंखों में गुलाबजल या फिटकरी का पानी डालें।

119. अण्डकोष की खुजली

  • नीम के तेल को रोजाना लगाने से अण्डकोष में खुजली नहीं होती है।
  • नीम का तेल, तिल का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर लगाने से अण्डकोष की खुजली दूर होती है।
  • नीम के पत्ते के काढ़े से अण्डकोष को धोने से अण्डकोष की खुजली मिट जाती है।

120. सविराम बुखार : नीम के तेल की 5 से 10 बूंदे सुबह-शाम सेवन करने से सविराम बुखार में लाभ होता है।

121. वात-पित्त ज्वर :

  • नीम की छाल, सोंठ, गिलोय, कटेरी, कचूर, अडूसा, कुटकी, कायफल, पोहकर मूल (जड़), छोटी पीपल और शतावर आदि को मिलाकर काढ़ा बनाकर पिलाने से कफ के बुखार में लाभ होता है।
  • नीम की छाल, सोंठ, गिलोय, पोहकर मूल, छोटी पीपल, कटाई, चिरायता, कचूर और शतावर को मिलाकर पीस लें। इसे 3-3 ग्राम की मात्रा में रोगी को देने से कफ का बुखार दूर होता है।

122. पायरिया :

  • नीम की जड़ को पानी में उबालकर थोड़ी-सी फिटकरी घोल लें। इससे प्रतिदिन कुल्ले करने से मुंह की दुर्गन्ध दूर होती है तथा मसूढ़ों से खून का निकलना बन्द हो जाता है।
  • नीम की कोमल पत्तियां, कालीमिर्च और कालानमक को मिलाकर सुबह खायें। इससे दांतो के कीड़े मरते हैं और पायरिया मिटता है।
  • नीम के पत्तों को जल में उबाल लें तथा इस गर्म जल से लगातार कुछ दिनों तक कुल्ला करें। इससे पायरिया रोग ठीक होता है। नीम की दातुन करने से दांतों के रोग नष्ट होते हैं।

123. दांतों को साफ और चमकदार बनाना : नीम की टहनी पत्तियों सहित छाया में सुखाकर आग में जला लें। इसकी राख में लौंग मिलाकर पीसकर मंजन बना लें। इससे रोजाना मंजन करने से दांत साफ व चमकदार बनते हैं तथा दांतों में कीड़े नहीं लगते हैं।

124. दांत घिसना या किटकिटाना :

  • नीम के पत्तों का रस 5 मिलीलीटर सुबह-शाम लगातार 2 से 4 दिनों तक पीयें। इससे दांतों में होने वाले कीड़े खत्म हो जाते हैं और रोगी का दांत किटकिटाना बन्द होता है।
  • दांत घिसने वाले रोगी के गुदा मार्ग से नमक मिले नीम के पत्ते का रस की बस्ति दें।

125. बालतोड़ : 50 ग्राम नीम के पत्तों को पीसकर इसकी टिकिया सी बना लें। इसे लेप की तरह बालतोड़ पर लगाने से वह जल्द ही ठीक हो जाती है। अगर बालतोड़ में पीव (मवाद) आ गया हो तो नीम की पत्तियों में उतनी ही कालीमिर्च पीसकर लगाने से बालतोड़ बहकर सूख जाता है।

126. अंजनहारी, गुहेरी : नीम की छाल को पानी के साथ पीसकर दिन में 2 बार लेप करने से अंजनहारी जल्दी पककर फूट जाती है।

127. खांसी : 10 बूंदों से लेकर 4 मिलीलीटर तक नीम का तेल सेवन करके उसके  ऊपर से पान खाने से श्वांस खांसी ठीक हो जाती है।

128. सिर के दाग-धब्बे : सिर के बाल उड़ जाने पर धब्बे और निशान बन जाते हैं। इसके लिए नीम का तेल प्रयोग में लाने से बाल फिर से उग आते हैं।

129. इन्फ्लुएन्जा : नीम की छाल, सोंठ, गिलोय, कटेरी, कुटकी, अडूसा और पीपल को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। इसे सुबह-शाम पानी के साथ पीने से इन्फ्लुन्जा के रोग में आराम मिलता है।

130. कंठ (गले) के रोग : नीम के पत्तों को सिल पर पीसकर टिकिया बना लें। इस टिकिया को आंखों पर रखकर पट्टी बांधने से पित्त और कफ (बलगम) की पीड़ा (दर्द) दूर हो जाती है।

131. गुदा रोग : बच्चे के गुदा में कीड़े होने पर नीम के तेल में रूई भिगोकर बच्चे की गुदा के अन्दर लगाएं।

132. जूं का पड़ना :

  • नीम की निबौलियों को घोटकर सिर में लगाने से जूएं मर जाते हैं।
  • नीम का तेल और सरसों का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर कुछ दिनों तक रोजाना मालिश करने से जूएं मर जाते हैं।
  • नीम के पत्तों को पानी में उबालकर ठंड़ा करें। बाद में उस पानी से सिर को धो लें। इससे जूएं मर जाएंगे।
  • नीम का तेल लगाने से जूएं मर जाते हैं।

133. मसूढ़ों का रोग : नीम के तेल को मसूढ़ों पर लगाने से मसूढ़ों के रोग ठीक होते हैं।

134. गर्भाशय की सूजन : नीम, सम्भालू के पत्ते और सोंठ सभी का काढ़ा बनाकर योनिमार्ग (जननांग) में लगाने से गर्भाशय की सूजन नष्ट हो जाती है।

135. मुंह के छाले :

  • नीम की छाल तथा कत्थे को एक साथ बारीक पीसकर मिश्रण बना लें। इस मिश्रण को छालों पर लगाकर लार टपकाने से मुंह के छाले नष्ट होते हैं।
  • नीम की पत्तियों को पानी में उबाल लें। फिर उस पानी से बार-बार कुल्ला करें। इससे मुंह के छाले व घाव नष्ट होते हैं।
  • थोड़ी-सी नीम की पत्तियों को पीसकर देशी घी में मिलाकर छालों पर लगाने से छाले नष्ट होते हैं।
  • नीम की नई कोमल पत्तियों को दिन में 3 से 4 बार चबाने से लाभ होता है।

136. मुंह के रोग :

  • नीम की 2 से 4 पत्तियों को चबाकर थूंकने से दांत, जीभ व मुंह के सभी रोग ठीक हो जाते हैं।
  • नीम की दातुन करने से दांत के कीड़े नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही मुंह के घाव, मुंह के कैन्सर एवं मुंह के रोगों से बचाव होता है।

137. कान की फुंसी :

  • कान में फुंसी होने पर नीम का तेल लगाने से फुंसियां ठीक हो जाती हैं।
  • नीम के पत्तों को पानी में डालकर उबाल लें। पानी को काफी उबालने के बाद इसमें से जो भाप (धुआं) निकलता है उसे कान में लेने से कान का मैल निकलकर कान साफ हो जाता है और कान का दर्द भी ठीक हो जाता है।

138. कान की सफाई : नीम के पत्तों की भाप कान में लेने से कान का मैल बाहर निकल जाता है और कान बिल्कुल साफ हो जाता है।

139. योनि रोग : नीम के पत्तों को उबालकर उसमें सेंधानमक मिलाकर गुप्तांग (योनि) में पिचकारी देने से योनि रोग मिट जाते हैं।

140. बवासीर (अर्श):

  • नीम के फलों का बीज, सफेद कत्था, बकायन और रसवन्ती को बराबर मात्रा में लेकर कूट लें तथा कपड़ा से छानकर इसके लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की गोलियां बना लें। इसकी 2 से 4 गोली प्रतिदिन ताजा पानी या गाय के दूध के साथ सुबह-शाम लेने से रोग में लाभ होता है।
  • नीम के निंबोली (नीम का बीज) 10 ग्राम, रसौत 5 ग्राम और हरड़ 5 ग्राम इन सब को महीन कूट-पीसकर छान लें। इस चूर्ण में 1 कप गुलाब का जल मिलाकर चने के बराबर गोलियां बना लें। प्रतिदिन सुबह-शाम इसकी 2-2 गोलियां पानी के साथ खाने से बवासीर ठीक होती है।
  • नीम की कोमल पत्तियों को घी में भूनकर उसमें थोड़ा-सा कपूर डालकर टिकिया बना लें। टिकियों को गुदाद्वार पर बांधने से मस्से नष्ट होते हैं।
  • नीम के पके हुए फल को छाया में सुखाकर इसके फल का चूर्ण बना लें। 5 ग्राम चूर्ण सुबह जल के साथ खाने से रोग ठीक होता है।
  • महानीम के 11 बीजों को पीसकर इसमें 5 ग्राम चीनी मिलाकर पानी के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से खूनी बवासीर में लाभ होता है।

141. कष्टार्तव (मासिक-धर्म का कष्ट के साथ आना) :

  • नीम के पत्तों को भाप में गर्म करके योनि पर बांधने से मासिक-धर्म की पीड़ा नष्ट हो जाती है।
  • यदि मासिक-धर्म के दिनों में जांघों में दर्द हो तो प्रतिदिन नीम के पत्तों का रस 6 मिलीलीटर, अदरक का रस लगभग 12 मिलीलीटर, इतनी ही मात्रा में पानी मिलाकर पिलाते हैं। इससे जांघों का दर्द तुरन्त समाप्त हो जाता है।

142. कान का बहना :

  • कान को साफ करके नीम के तेल में शहद मिलाकर रूई के फोये से कान के अन्दर लगाने से कान से मवाद बहना ठीक हो जाता है।
  • नीम के तेल को रूई के फाये से कान में लगाने से कान में से मवाद बहना ठीक हो जाता है।
  • नीम की पत्तियों को पानी में डालकर उबालकर छान लें। इस पानी से कान को अच्छी तरह से साफ करके रोजाना ताजे प्याज का रस बूंद-बूंद करके डालने से कान में से मवाद बहना ठीक हो जाता है।

143. कान के बाहर की फुंसिया :

  • नीम के पत्तों को पीसकर कान की फुंसियों पर बांध दें। इसको सूख जाने के बाद खुद इसे न हटाए बल्कि फुंसियों के ठीक हो जाने के बाद ये अपने आप ही हट जाता है।
  • नीम के तेल को लगाने से कान की फुंसिया ठीक हो जाती हैं। अगर फुंसियों में जलन भी हो तो नीम के तेल के बराबर ही तिल का तेल मिलाकर फुंसियों पर लगाने से आराम आता है।

144. कमजोरी : नीम के फूल को बारीक पीसकर गर्म पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से कमजोरी में लाभ होता है। इससे पाचन की खराबी भी सही होती है।

145. मासिक-धर्म की अनियमितता : नीम की छाल 4 ग्राम की मात्रा में लेकर 20 ग्राम गुड़ के साथ पानी में उबालें। जब आधा पानी रह जाए तब इसे उतारकर गुनगुना पीने से मासिक-धर्म की रुकावट दूर हो जाती है और मासिक-धर्म नियमित रूप से आने लगता है।

146. कान की नयी सूजन : नीम, सिनुआर, करंज और धतूरे के पत्तों को पीसकर गर्म-गर्म ही नयी सूजन पर बांधने से सूजन में लाभ होता है।

147. मासिक-धर्म सम्बंधी परेशानियां : नीम की सूखी पत्तियां 10 ग्राम, 10-11 तुलसी की पत्तियां, 10 ग्राम त्रिफला का चूर्ण, 5 ग्राम सोंठ, 3 ग्राम पीपल, 2 ग्राम कालीमिर्च और 5 ग्राम जवाखार। इन सभी को कूट-पीसकर चूर्ण बनाकर शीशी में भरकर रख लें। इस चूर्ण में से 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करना चाहिए। इससे मासिक-धर्म सम्बन्धी परेशानियां समाप्त हो जाती है।

148. कान में कुछ पड़ जाना : नीम के पत्तों के रस को तिल के तेल में मिलाकर कान में डालने से कान के अन्दर जितने भी कीड़े-मकोड़े होगें वे अन्दर ही मर जाएंगे। इसके बाद कान को किसी रूई से अच्छी तरह साफ कर लें।

149. घाव :

  • करंज, नीम, निर्गुण्डी 10-10 ग्राम को पानी में पीसकर घाव पर लगायें।
  • जो घाव काफी भयकंर रूप ले रहा हो तो उस पर नीम का तेल लगायें इससे वह जल्द ही भर जायेगा।
  • नीम के पत्ते के काढ़े से घाव को साफ करने और पत्तों को पीसकर घाव पर बांधने से फायदा होता है।
  • दूषित घाव में नीम का तेल लगाने से लाभ मिलता है।

150. नष्टार्तव-मासिक धर्म का बन्द हो जाना : नीम की छाल 250 ग्राम और गुड़ 250 ग्राम को लगभग 2 लीटर पानी में उबालें। जब यह 250 मिलीलीटर की मात्रा में शेष बचे तो इसे 50-50 मिलीलीटर की मात्रा में माहवारी शुरू होने के एक दिन दिन पहले सुबह-शाम दोनों समय सेवन करने से बन्द हुआ मासिक-धर्म पुन: शुरू हो जाता है।

151. अग्निमान्द्य (हाजमें की खराबी) :

  • नीम की 4 पत्तियों के रस में नींबू का रस मिलाकर पीने से आराम मिलता है।
  • नीम की पत्तियां, 4 कालीमिर्च के दाने और 4 लौंग लेकर पीस लें, फिर इसमें थोड़ा-सा पानी और चीनी मिलाकर दिन में 3 बार (सुबह, दोपहर और शाम) सेवन करने से अपच या अग्निमान्द्य में लाभ मिल सकता है।
  • नीम की छाल या नीम की सूखी पत्तियां, गुर्च, आंवला, पीपल, अजवाइन, जवाखार, जीरा, नागरमोथा, सेंधानमक, देवदारू, सोंठ, बच, दारूहल्दी को 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर रख लें। फिर इसे आधा चम्मच लेकर पानी में घोलकर पकायें, जब काढ़ा आधा बच जाये तब इस काढ़े को पीने से अपच (अग्निमान्द्यता) में लाभ पहुंचता है।

152. प्रदर रोग : 1 चम्मच नीम का तेल चौगुने गाय के दूध में मिलाकर सेवन करने और ऊपर से मिश्री मिले गाय के दूध को पीने से प्रदर के सभी रोग मिट जाते हैं।

153. प्यास अधिक लगना :

  • प्यास अधिक लगने पर नीम के पत्तों का शर्बत बनाकर पीना चाहिए।
  • नीम की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से कफ के कारण लगने वाली प्यास शान्त हो जाती है।
  • नीम के पत्तों को मिट्टी में मिलाकर गोला बनाकर आग में जला दें। लाल होने पर 1 बर्तन में पानी भरकर उस पानी में गोला को बुझाकर उस पानी को पीने से तेज प्यास भी शान्त हो जाती है।
  • कड़वे नीम की छाल, धनिया, सोंठ और मिश्री बराबर मात्रा में लेकर 20 ग्राम की मात्रा बना लें। इसे 375 मिलीलीटर पानी में डालकर पकायें। आधा पानी रह जाने पर उतारकर ठंडाकर पीने से गर्मी की प्यास बुझ जाती है।

154. प्रसवोत्तर रक्तस्राव (प्रजनन के बाद खून का बहना) : नीम का रस 30 से 60 मिलीलीटर सुबह-शाम लेने से लाभ होता है। इससे गर्भाशय से खून का बहना बन्द होता है और सूजन भी कम हो जाती है। भूख लगना, मल साफ आना, ज्वर का रुक जाना जैसे अनेक लाभ होते हैं।

155. गिल्टी (ट्यूमर) :

  • नीम के पत्तों को पीसकर गिल्टी पर बांधने से आराम मिलता है।
  • नीम के पत्तों को पानी में डालकर उबाल लें और छानकर पीस लें। इस पीसे हुए लेप में थोड़ा-सा गुड़ (ईख) मिलाकर गिल्टी पर बांधने से गिल्टी नष्ट होती है।

156. जलोदर (पेट में पानी की अधिकता) : नीम की जड़ की छाल को पानी में गर्म करके पीने से लाभ होगा।

157. मधुमेह (शूगर) के रोग :

  • नीम पर चढ़ी गिलोय 2 किलोग्राम लेकर 6 गुने पानी में 8 घंटे भिगोये रखें और भाप के द्वारा इसका रस निकालकर इसे रख लें। इस रस को 5 चम्मच, 3 ग्राम शहद और चौगुने गाय के दूध के साथ दिन में 3 बार रोजाना पीयें। इसके सुबह-शाम सेवन से 4-5 सप्ताह में ही मधुमेह के रोग से लाभ होता है।
  • नीम के गुलाबी कोमल पत्तों को चबाकर रस चूसने से मधुमेह रोग से आराम मिलता है।
  • नीम की छाल को पत्थर पर घिसें, फिर उसी जगह मुर्दासन घिसकर बने लेप से प्रमेह (वीर्य विकार) पिड़िकाओं में लाभ होता है।
  • चौथाई चम्मच नीम की पत्तियों का रस और 2 बूंद लहसुन का रस-दोनों को मिलाकर सेवन करने से मधुमेह में लाभ होता है।

158. रक्तप्रदर : आधा चम्मच नीम का तेल दूध में मिलाकर सुबह-शाम को पीने से रक्तप्रदर निश्चित रूप से बन्द हो जाता है।

159. गोली लगना :

  • नीम की पत्तियों को कुचलकर पानी में खौलाकर, फिर पानी को ठंड़ा होने के बाद उस घाव को अच्छी तरह से धोयें। इससे रोगी का घाव अच्छी तरह से साफ हो जाता है।
  • नीम की पत्ती, हरी घास एवं हल्दी को पीसकर लेप बने लेप को घाव पर लगाकर ऊपर से पट्टी बांध दें। इससे गोली का घाव जल्द ही सही हो जाता है।

160. हॉजकिन (लसिका ग्रंथियों बढ़ जाना) : नीम की पत्तियों को पानी में उबाल लें और छानकर पत्तियों को गुड़ के साथ सिल (पत्थर) पर पीसकर ग्रंथियों पर लेप करने से बढ़ी हुई लसिका ग्रंथियां ठीक हो जाती हैं।

161. स्तनों की घुण्डी फटने पर : नीम के तेल और तिल के तेल को बराबर मात्रा में लेकर चूंची (घुण्डी) के जख्म पर लगाने से जख्म भरने लगता है।

162. शिश्न चर्म रोग : नीम के तेल और तिल के तेल को मिलाकर मालिश करने से लिंग को आगे से ढकने वाली खाल हट जाती है।

163. तालु रोग :

  • नीम के काढ़े के कुल्ले करने से तालु रोग सही हो जाता है।
  • नीम, अतीस, पाढ़, रास्ना, कुटकी और नीम की छाल इन सभी को पीसकर काढ़ा बना लें। रोगी को इस काढ़ा से कुल्ला करवाने से यह रोग दूर हो जाता है।

164. नाक के रोग :

  • नीम और चौलाई के पत्तों को पीसकर मस्तक (माथे की नसों) पर लगाने से नाक से खून आना रुक जाता है।
  • नीम के काढ़े को नाक के जख्म पर लगाने से कीड़े खत्म हो जाते हैं और जख्म भी ठीक हो जाता है।
  • नीम और रसौत को नाक में डालें तथा माथे पर दूध और पानी लगायें। इससे नाक में से धुंए जैसी हवा का निकलना और नाक के अन्दर जलन महसूस होना आदि रोग दूर होते हैं।

165. अरूंषिका (वराही) :

  • नीम, परवल और आडू़ के पत्तों को पीसकर सिर पर लेप की तरह लगाने से सिर और मुंह पर होने वाली छोटी-छोटी फुंसियां ठीक हो जाती हैं।
  • नीम के पत्तों को पानी में देर तक उबालकर सिर को इस उबाले हुए पानी से धोने से जीवाणु मर जाते हैं और फुंसियां ठीक हो जाती हैं।
  • लगभग 10-10 ग्राम की मात्रा में नीम, जामुन की छाल और खादिर (कत्था) को गाय के पेशाब में कूट पीसकर सिर में लेप करने से अरुंशिका रोग ठीक हो जाता है।
  • यदि सिर के घाव में कीड़े अथवा सूजन आ जाए तो नीम, करंज या नीलगिरी में से किसी एक के तेल को लगाने से सिर और मुंह की फुंसियों में लाभ मिलता है।

166. स्तनों की रसूली (गांठे) :

  • नीम के तेल और तिल के तेल को बराबर मात्रा में लेकर मालिश करने से स्तनों में होने वाली गांठे कम होकर मिट जाती हैं। परन्तु ध्यान रहे कि केवल नीम के तेल से स्तनों की मालिश करने से स्तनों में जलन आदि के पैदा होने का डर सा लगा रहता है।
  • नीम के बीजों का तेल लगाने से स्तनों की गांठें दूर हो जाती हैं।

167. स्तनों में दर्द : नीम के तेल या कार्बोलिक तेल से धीरे-धीरे स्तनों की मालिश करें और ऊपर से घी ग्वार (ग्वार पाठा) के गूदे को हल्दी में मिलाकर हल्का गर्म करके स्तनों में बांधने से लाभ मिलता है।

168. योनि की जलन और खुजली :

  • नीम की पत्तियों को पानी में पकाकर रख लें, फिर इस पानी को हल्का-सा गर्म करके योनि को धोने से योनि की खुजली मिट जाती है।
  • नीम की छाल को बारीक पीसकर पानी में मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को योनि के आस-पास की फुंसियों और खुजली पर लगाने से लाभ मिलता है।
  • नीम के पत्तों को पानी में उबाल-छानकर इससे योनि को धोने से योनि की खुजली नष्ट हो जाती है। इसे सुबह-शाम योनि की बीमारी में सेवन करना चाहिए।

169. एक्जिमा :

  • नीम के गुलाबी पत्तों को लेकर तेल में काफी देर तक पकाकर इस तेल को एक्जिमा पर लगाने से बहुत आराम आता है।
  • नीम के गुलाबी कोमल पत्तों का रस निकालकर उसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर पीने से दूषित रक्त (खून के कीटाणु) निकल जाते हैं और खून साफ होकर खून की खराबी से होने वाली सारी बीमारियां जैसे दाद, खुजली और फुंसियां नष्ट हो जाती हैं।
  • नीम के पत्ते को पानी में उबालकर एक्जिमा को साफ करें। फिर उस जगह पर नींबू का रस और तुलसी के पत्तों को पीसकर लेप करने से लाभ होता है।

170. योनि की बदबू : नीम 10 ग्राम, अमलतास 10 ग्राम और अडूसा की छाल को 10 ग्राम की मात्रा में लेकर मोटा-मोटा पीसकर लगभग 500 मिलीलीटर पानी में डालकर अच्छी तरह पकायें जब यह आधा रह जाए तब इसके पानी को ठंड़ा करके योनि पर लगाने से योनि में से बदबू आना बन्द हो जाती है।

171. योनि रोग :

  • नीम की निंबौलियों को नीम के ही रस में अच्छी तरह से पीसकर स्त्री की योनि के अन्दर रखने या लेप लगाने से योनि में होने वाला दर्द मिट जाता है।
  • नीम के पत्तों को सेंधानमक के साथ पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर योनि में रखने से योनि से आने वाली पीव (राध) बन्द हो जाती है।
  • नीम के चूर्ण को योनि में रख लें फिर इसके साथ ही अमलतास के काढ़े से योनि को धोयें। इससे योनि की दुर्गंध और लिबलिबापन दूर हो जाता है। ध्यान रखना चाहिए कि सबसे पहले योनि को धोना चाहिए तथा बाद में चूर्ण रखना चाहिए।

172. एलर्जी : नीम की छाल, आक के पत्ते तथा पुनर्नवा इन तीनों को एक साथ मिलाकर 2 कप पानी में उबालने के लिए रख दें। उबलने पर जब पानी आधा कप बचा रह जाए, तो उसमें थोड़ी सी मिश्री डालकर पीने से एलर्जी के रोग में लाभ होता है।

173. बाला रोग (गन्दा पानी को पीने से होने वाला रोग) : शरीर में जिस स्थान पर बाला निकल रहा हो वहां पर नीम के पत्तों को पीसकर लेप करने से लाभ होता है।

174. चेहरे की झांई : चेहरे पर मुंहासों के निशान या दाग-धब्बे हो तो निबौंली की मींगी (बीज) को पीसकर रोजाना चेहरे पर लेप करने से कुछ ही सप्ताह में चेहरा साफ और सुंदर हो जायेगा।

175. फोड़ा:

  • नीम की छाल की राख (भस्म) को अधिक बह रहे फोड़े पर लगाने से लाभ मिलता है।
  • लगभग 25 ग्राम नीम के पत्तों को पानी में पीसकर टिक्की बना लें, और इस टिक्की को 50 मिलीलीटर तिल के तेल में पकायें, जब यह टिक्की जल जाये तो तेल को निथारकर फिर इसमें 6 ग्राम मोम मिलाकर घोट लें और मरहम की तरह बना लें। इसके बाद फूटे हुए सिर के फोड़े के घाव पर लगाने से घाव ठीक हो जाता है। इसे हर प्रकार के घावों पर लगाया जा सकता है।

176. उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) :

  • नीम की गुलाबी, कोमल पत्तियों का रस 10-15 ग्राम शहद में मिलाकर पीने से उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) में लाभ होता है।
  • 1 कप नीम की पत्तियों के रस में सेंधानमक डालकर सेवन करें।
  • नीम की पत्तियों के रस के सेवन से उच्च रक्तचाप कम हो जाता है।

177. हृदय की दुर्बलता : बड़े नीम की जड़, कूट, सौंठ, कचूर तथा हरड़ को समान भाग लेकर पीस लें, फिर इसमें दूध कांजी, घी तथा नमक मिलाकर सेवन करने वातज हृदय रोग शान्त होता है।

178. हाथ-पैरों की ऐंठन : हाथ-पैरों की ऐंठन में नीम के तेल से मालिश करने से रोगी के हाथ-पैरों की ऐंठन दूर होती है।

179. हृदय रोग : बड़े नीम की जड़ 10 ग्राम, कूट 10 ग्राम, सोंठ 10 ग्राम तथा कचूर 10 ग्राम सबको कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 4 ग्राम चूर्ण देशी घी में मिलाकर सेवन करने से लाभ मिलता है।

180. हाथ-पैरों के फटने पर : नीम के पत्तों को पीसकर छोटी-छोटी टिकिया बना लें और इसे कम आग पर घी में तल लें। टिकियों को तलने के बाद बाहर निकालकर बचे हुए घी में उतना ही मोम डालकर किसी बर्तन में ठंड़ा कर लें। इसे लगाने से हाथ-पैरों का फटना ठीक हो जाता है।

181. चेचक (बड़ी माता) :

  • नीम की छाल (खाल) को पानी में पीसकर दानों पर लगाने से आराम आता है।
  • नीम के तेल में आक (मदार) के पत्तों का रस मिलाकर दानों पर लगाने से लाभ होता है।
  • रोगी का बिस्तर बिल्कुल साफ-सुथरा रखें और उसके बिस्तर पर नीम की पत्तियां रख दें। नीम की कोंपलों (मुलायम पत्तों) को पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। एक गोली सुबह और एक गोली शाम को दूध के साथ रोगी को खिलायें। गर्मी का मौसम हो तो नीम की टहनी से हवा करने से चेचक के दानों में मौजूद जीवाणु जल्दी ही समाप्त हो जाते है। तवे पर मुनक्का को भूनकर रोगी को खिलाना चाहिए।
  • 7 नीम के मुलायम पत्ते (कोपले) और 7 कालीमिर्च को 1 महीने तक लगातार सुबह खाली पेट खाने से चेचक जैसा भयंकर रोग 1 साल तक नहीं होगा। 15 दिन तक खाने से 6 महीने तक चेचक (माता) नहीं निकलती। जिन दिनों चेचक का रोग फैल रहा हो उन दिनों में जो लोग नीम के पत्तों का सेवन करते हैं उन्हें चेचक (माता) जैसा भयंकर रोग नहीं होता है।

182. शीतला (मसूरिका) बुखार :

  • सोते समय सिरहाने पर नीम के ताजे पत्ते रखने चाहिए तथा दरवाजे और खिड़कियों पर नीम के पत्तों को बांध देना चाहिए।
  • नीम, आंवला, त्रिकुटा (सोंठ, कालीमिर्च, छोटी पीपल), पटोलपत्र, पित्तपापड़ा, सफेद चंदन, लाल चंदन, अडूसा तथा धमासा को एक साथ मिलाकर काढ़ा बना लें और इसे ठंड़ा करके इसमें मिश्री और शहद मिलाकर पीने से पित्तज-मसूरिका (माता के दानों की वजह से गर्मी) के रोग में लाभ होता है।
  • नीम की हरी पत्तियों से मसूरिका (चेचक) में हवा की जाती है और पत्तियों को बिस्तर पर बिछाया जाता है। लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग पत्तियों की गोलियां मुलेठी के साथ सुबह-शाम देने से चेचक के रोग मे जल्दी ही लाभ होता है।

183. नाखूनों की खुजली : नाखूनों की खुजली दूर करने के लिए हल्दी और हरी दूब को नीम के पत्ते के साथ पीसकर आग पर गर्म करें। गर्म-गर्म लेप नाखूनों पर करके ऊपर से पट्टी बांधने से लाभ मिलता है।

184. फेवस और फंगस के रोग : नीम की पत्तियों के बने काढ़े से रोजाना सिर को धोने से और एरण्ड के तेल और नारियल के तेल को मिलाकर जिस स्थान पर जख्म हो उस स्थान पर रोजाना लगाने से जल्दी ही आराम हो जाता है।

185. फीलपांव (गजचर्म) :

  • फीलपांव के रोगी को 5 से 10 बूंद नीम का तेल प्रतिदिन 2 बार सेवन करना चाहिए।
  • नीम के 10 पत्ते और तुलसी के 10 पत्तों को मिलाकर रोजाना सुबह खाते रहने से हाथीपांव की शिकायत दूर होती है।

186. खून की खराबी के लिए : नीम की कोपलों को सुबह खाली पेट खाना चाहिए और उसके बाद 2 घंटे तक कुछ न खायें। इससे खून की सारी खराबी, खुजली, चमड़ी के रोग और वात (गैस), पित्त (शरीर की गर्मी) और कफ (बलगम) के रोग जड़ से खत्म हो जाते हैं। इसको लगातार खाने से मधुमेह (डायबिटीज) की बीमारी भी दूर हो जाती है। इससे मलेरिया और भयंकर बुखार के पैदा होने की संभावना भी नहीं रहती परन्तु ध्यान रखना चाहिए कि बड़ों को 15 कोपले (मुलायम पत्तों) और बच्चों को 7 कोपलों से ज्यादा नहीं देनी चाहिए और ज्यादा समय तक भी नहीं खाना चाहिए। नहीं तो मर्दाना शक्ति भी कमजोर हो जाती है।

187. विसर्प-फुंसियों का दल बनना : नीम के तेल में तिल का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर लगाने से दाह (जलन) और विसर्प में लाभ होता है।

188. शरीर का सुन्न पर जाना : नीम की छाल, निसोथ, कालीमिर्च तथा पुनर्नवा इनसब को मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से अंगों में सुन्न होने की बीमारी ठीक हो जाती है।

189. घमौरियां के होने पर

  • नीम की छाल को घिसकर चंदन की तरह लगाने से फुंसिया ठीक हो जाती हैं।
  • पानी में थोड़ी सी नीम की पत्तियां डालकर उबाल लें। इस पानी से नहाने से घमौरियां दूर हो जाती हैं।

190. मानसिक उन्माद (पागलपन) : लगभग 6 मिलीलीटर नीम के पत्तों का रस और लगभग 2 ग्राम कूठ के चूर्ण को शहद में मिलाकर पागलपन या उन्माद के रोगी को चटाने से यह रोग खत्म हो जाता है।

191. चेहरे के दाग-धब्बे और कीलमुंहासे :

  • नीम के बीज के तेल में आक (मदार) की जड़ को पीसकर लगाने से पुरानी से पुरानी खाज और खुजली मिट जाती है।
  • नीम के काढ़े से नहाने से या उसके पत्तों को पीसकर शरीर में जहां पर खुजली हो उस स्थान पर लगाने से लाभ होता है। नीम के पत्तों से बने घृत को खाने से भी खुजली पूरी तरह से ठीक हो जाती है।
  • नीम के बीज को सिरके के साथ पीसकर चेहरे पर मलने से चेहरे की झाईयां दूर हो जाती हैं।

192. सिर का दाद : नीम के पत्तों के काढ़े से सिर को धोकर, बाल सूख जाने पर एरण्ड का तेल और शुद्ध नारियल का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर सिर में मालिश करने से थोड़े ही दिनों में सिर का दाद ठीक हो जाता है।

193. बच्चों के रोग :

  • कड़वे नीम के बीजों को पीसकर पानी में मिलाकर सिर पर लगाने से `जूं´ समाप्त हो जाती हैं।
  • नीम की छाल घिसकर पानी में मिलाकर लगाने से फुंसियां दूर होती हैं।
  • कड़वे नीम के पत्तों को पीसकर उन्हें शहद में मिलाकर लगाने से फूटे हुए फोड़े का बहना´ बन्द हो जाता है।
  • कड़वे नीम के पत्ते, दारूहल्दी और मुलहठी को घी के साथ पीसकर मरहम बना लें। इस मरहम को लगाने से `जख्म´ भर जाता है।
  • नीम के पत्तों को पानी के साथ पीसकर उस पानी से जख्म को धोने से जख्म जल्दी भर जाता है। जख्म धोने के बाद उस पर मरहम लगाने से जल्दी आराम आता है।
  • 10 ग्राम नीम की पत्ती, 10 ग्राम शहद, 10 ग्राम घी को एक साथ मिलाकर बच्चे के सामने धूनी देने से बच्चे का बुखार उतर जाएगा।
  • कड़वे नीम के पत्तों को पीसकर लेप करने से `नहारू´ ठीक हो जाता है।
  • रविवार को नीम के कोंपल की कोमल लकड़ी को थोड़ी-सी तोड़कर कान में धागे से बांध दें तो आंख की फूली कट जाती है।
  • नीम, कड़वे परवल, हरड़, आमला और हल्दी का काढ़ा बनाकर पीने से जख्म, विसर्प, विस्फोटक (चेचक) तथा बुखार आदि रोग समाप्त हो जाते हैं।
  • अगर लड़की या लड़के के सिर में जूं पड़ जाएं, तो कड़वे नीम के बीज पानी में पीसकर सिर में लगायें।
  • नीम की कोपलों (मुलायम पत्ते) को पीसकर रस निकाल लें और गर्म कर लें। यदि दाहिनी आंख में दर्द हो, तो बांई कान में डालें और बांई आंख में दर्द हो तो दाहिने कान में डालें। अगर दोनों आंखों में दर्द हो तो दोनों कानों में डालने से आंखों का दर्द ठीक हो जाता है।
  • भद्रमोथा, हरड़, नीम, कड़वे परवल और मुलेठी को मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से हर प्रकार के ज्वर (बुखार) समाप्त हो जाते हैं। परन्तु यह काढ़ा गुनगुना सा पिलाना चाहिए। इसको `भद्रमुस्तादि´ काढ़ा कहते हैं।

194. आग से जलने पर : जलने की वजह से शरीर में जख्म बन जाने पर नीम या चंदन का तेल लगाने से जख्म जल्दी ठीक हो जाते हैं। जीवाणुओं के संक्रमण (फैलने) से भी सुरक्षा होती है।

195. नाभि रोग (नाभि का पकना) : नीम के पानी से नाभि को धोकर ऊपर से नीम की छाल घिसकर लगाने से नाभि के रोग में दर्द व खून का आना बन्द हो जाता है।

196. शरीर में सूजन :

  • 5-5 ग्राम की मात्रा में नीम की छाल, आक के पत्ते और पुनर्नवा को लेकर 2 कप पानी में उबालें, फिर इस हल्के गुनगुने से जल से सूजन वाले स्थान की सिंकाई करने से सूजन खत्म हो जाती है।
  • नीम की छाल, हरड़ की छाल, दारूहल्दी, गिलोय, कुटकी, सौंठ, परवल और सांठी की जड़ को लगभग 40 मिलीलीटर की मात्रा में काढ़ा बनाकर पूरे बदन पर लेप की तरह से लगाने से शरीर या बदन की सूजन दूर हो जाती है।
  • बराबर मात्रा में नीम के पत्तों का काढ़ा, दारूहरिद्रा का तना, यिष्टमधु की जड़, शहद, सफेद जीरा और राल को घी में मिलाकर लेप की तरह शरीर पर लगाने से शरीर की सूजन खत्म हो जाती है।
  • शरीर पर नीम के तेल की मालिश करने से शरीर की सूजन दूर हो जाती है।

197. गले की सूजन :

  • 2 नीम की पत्तियां, 4 कालीमिर्च, 2 नग लौंग और थोड़े से नमक को मिलाकर काढ़ा बनाकर सेवन करें।
  • दारूहल्दी, नीम की छाल, रसौत और इन्द्रजौ को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े में से 2-2 चम्मच काढ़ा सुबह-शाम पीना चाहिए।

198. स्तनों के घाव :

  • सरसों का तेल 50 मिलीलीटर और नीम की पत्तियों की राख 25 ग्राम को आग पर रखकर पका लें, फिर नीम के पत्ते के बने काढ़े से जख्म को धोकर, राख मिला हुआ तेल घाव में लगा दें, तथा कुछ सूखी राख को ऊपर से चुपड़कर पट्टी बांध दें। नियमित रूप से 2 से 3 दिनों तक बांधने पर लाभ मिलता है।
  • दूध बन्द करने के लिए नीम पत्तों का मिश्रण लेप करने से लाभ मिलता हैं।

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