समाज और सेक्स


समाज और सेक्स


समाज में सेक्स का महत्व :

           मानव एक सामाजिक प्राणी है और समाज के अंदर ही उसका अस्तित्व संभव है। वह समाज में रहकर ही अच्छी व बुरी आदतें भी सीखता है। आमतौर पर हमारे समाज में यौन से संबंधित बातों को हीनता की दृष्टि से देखा जाता है। युवकों को सही आचार-विचार और अच्छा कैरियर बनाने की सलाह तो घर-परिवार के सदस्य, शिक्षक और समाज के लोग दे देते हैं परन्तु यौन से संबंधित जानकारी देने अथवा चर्चा करने से कतराते हैँ। जबकि बढ़ते हु्ए बच्चोँ के मन में यौन से संबंधित जानकारी प्राप्त करने की जिज्ञासा होती है। जब उन्हें सही जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती है तो वे विभिन्न प्रकार की यौन समस्याओँ से पीड़ित हो जाते हैं। इससे उनके मन में यौन संबंधी गलत धारणाएं बैठ जाती हैं। इस प्रकार की गलत धारणाएं आमतौर पर हस्तमैथुन, वीर्यक्षय एवं नपुंसकता आदि के बारे में होती हैं।

           हमारे समाज में हस्तमैथुन करने वाले व्यक्ति को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता है। किसी भी युवक के चेहरे पर कील-मुंहासे या आंखों के पास काले रंग के निशान देखने पर दूसरे लोग ऐसी धारणा बना लेते हैं कि यह युवक हस्तमैथुन अवश्य ही करता होगा। क्योंकि उनकी सोच यह होती है कि युवकों के चेहरे पर कील-मुंहासे या आंखों के पास काले रंग के दाग-धब्बे बनना हस्तमैथुन के कारण ही होता है। जबकि हस्तमैथुन करने से शारीरिक तौर पर कोई हानि नहीं होती है क्योंकि पुरुष का लिंग जो कार्य स्त्री की योनि में जाकर करता है, उसी कार्य को वह मुट्ठी में भी करता है जिससे उसे मानसिक व शारीरिक तनाव से मुक्ति मिलती है। यह क्रिया पुरुष की तंत्रिका प्रणाली को अनु्क्रियात्मक बनाती है। हस्तमैथुन का सहारा लेकर अनचाहे गर्भों व एड्स जैसे हानिकारक रोगोँ से बचा जा सकता है।

           सामाजिक व नैतिक दृष्टि से भी हस्तमैथुन क्रिया का काफी महत्व है। आप कल्पना करें कि यदि कोई युवक अपने पड़ोस की किसी लड़की से सेक्स संबंध बनाने की इच्छा करता हो परन्तु उस लड़की की सेक्स में इच्छा न हो और वह लड़का उस लकड़ी से सेक्स संबंध बनाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहता हो। यदि ऐसे मेँ लड़का उस लकड़ी से सेक्स करने का मन बदल दे और हस्तमैथुन करके अपनी इच्छा की शांति कर ले तो सामाजिक सुरक्षा व नैतिक परंपरा बनी रहती है। यदि वही लड़का हस्तमैथुन न करके लड़की से जबर्दस्ती करने लगे तो इससे यौन अपराध की उत्पत्ति होती है। इससे सामाजिक असुरक्षा व भय का वातावरण फैल जाता है।

           यदि समाज में इसी तरह से हस्तमैथुन को नकारात्मक दृष्टि से देखा जाएगा तो समाज में यौन अपराधों व बलात्कारों की बाढ़ आ जाएगी। जिस प्रकार से संभोग करने से कोई कमजोरी नहीं होती, उसी प्रकार से हस्तमैथुन करने से भी कमजोरी नहीं होती है। फिर भी समाज में इसको लेकर अनेक भ्रांतियां विद्यमान हैं, जैसे- हस्तमैथुन करने से नपुंसकता आ जाती है, इससे टी.बी. हो जाती है, मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और हार्ट अटैक की शिकायत हो जाती है आदि। जबकि ये सभी बातें निराधार हैं। वास्तविकता तो यह है कि इन सभी बातों से हस्तमैथुन करने वालों का मन कुंठित हो जाता है जिसके फलस्वरूप वह मानसिक रूप से पागल हो जाता है। 

           हस्तमैथुन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यदि कोई व्यक्ति शादी से पहले या शादी के बाद भी हस्तमैथुन करते हैं तो इससे उसके व्यक्तित्व पर कोई भी असर नहीं पड़ता है। आमतौर पर प्रवासी लोग अपनी पत्नी से दूर रहते हैं। ऐसी स्थिति में सेक्स की इच्छा होने पर वह हस्तमैथुन का सहारा लेगा अथवा किसी वेश्या के पास जाएगा। इस हालत में किसी वेश्या या पराई स्त्री के पास जाना सामाजिक और कानूनी तौर पर गलत है। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति अपनी कामवासना की पूर्ति के लिए किसी वेश्या या पराई स्त्री के पास जाता है, तो वह कई प्रकार के यौन रोगों से ग्रस्त हो जाता है। अतः ऐसे व्यक्तियों को हस्तमैथुन करके अपनी सेक्स-इच्छा की पूर्ति कर लेनी चाहिए। जो व्यक्ति यह कहते हैं कि उन्होने कभी भी हस्तमैथुन नहीं किया है, ऐसे व्यक्तियों के दावे आमतौर पर गलत होते हैं। जबकि वास्तविकता तो यह है कि हस्तमैथुन व्यक्ति को उसकी कल्पनाओं को साकार करना सिखाता है जिससे उसकी तंत्रिका प्रणाली की क्रियात्मकता उसकी कल्पनाओं के अनुरूप बनती है।

           अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों को हस्तमैथुन करते देखकर परेशान हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में माता-पिता को परेशान नहीं होना चाहिए।

           हस्तमैथुन और संभोग दोनों एक ही सिक्के दो पहलू हैं क्योंकि दोनों ही माध्यम से निकलने वाले वीर्य का कोई महत्व नहीं होता है। वीर्य तो निकलने के लिए ही बना है। यह न तो जीवनप्रद है और न ही शक्तिप्रद। फिर भी हमारे समाज में यह धारणा है कि वीर्य की एक बूंद का निर्माण 100 बूंद खून से होता है जबकि वीर्य और खून में कोई भी समानता नहीं होती है। जननांगों में वीर्य का निर्माण लगातार होता रहता है जो उत्सर्जन के लिए होता है न कि जमा रखने के लिए। आमतौर पर झोलाछाप डाँक्टर नवयुवकों के मन में वीर्य के नष्ट होने से वाले वाली गंभीर रोगों की मिथ्या बाते बताकर भय उत्पन्न कर देते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे इन बातों में आकर अपना समय व पैसा बर्बाद कर देते हैं और मानसिक रूप से कुंठित बने रहते हैं। यही कुंठा धीरे-धीरे करके उनका यौवन समाप्त कर देती है।

           इसके अतिरिक्त वे वीर्य के गाढ़ेपन अथवा पतलेपन को लेकर भी परेशान रहते हैं जबकि इसका वैज्ञानिक विद्यान यह है कि जब मैथुन क्रिया देर से संपन्न होती है तो वीर्य गाढ़ा निकलता है। लेकिन जब मैथुन क्रिया जल्दी-जल्दी संपन्न होती है तो स्वाभाविक है कि वीर्य पतला ही निकलेगा। इससे सेक्स शक्ति पर बिल्कुल भी प्रभाव नहीं पड़ता है। नवयुवकों के वीर्य और 30-35 साल के व्यक्ति के वीर्य में अंतर होता है। नवयुवकों के वीर्य का रंग सफेद होता है लेकिन जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ती है, उसके वीर्य का रंग सफेद से पीला होता जाता है तथा वीर्य की मात्रा भी घट जाती है। इसलिए वीर्य के रंग व उसकी मात्रा का बढ़ती हुई आयु के लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

           ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अधिकतर लोग नपुंसकता को लेकर ज्यादा ही परेशान रहते हैं। यदि किसी लड़के की शादी होने के 2-3 साल बीत जाने के बाद भी बच्चा नहीं होता है तो उसे नपुंसक मान लिया जाता है। इसलिए इस धारणा को बदलने की जरूरत है क्योंकि बच्चा पैदा करना शुक्राणुओं पर निर्भर करता है। शुक्राणुओं की कमी या अधिकता से व्यक्ति की मैथुन क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी तरह से वीर्य में धातु जाने की एक अन्य गलत धारणा अकसर व्यक्तियों में पायी जाती है।

           कुछ लोग पेशाब के साथ वीर्य निकलने की शिकायत करते हैं और कहते हैं कि इससे उनका शरीर दिन पर दिन कमजोर होता जा रहा है। ऐसे लोग नीम-हकीमों के चक्कर में पड़कर एक ऐसी कुंठा के शिकार हो जाते हैं जो उन्हें अंदर से दीमक की तरह खोखला कर देती है। ऐसे लोगों को यौन से संबंधित जानकारी अवश्य ही कर लेनी चाहिए क्योंकि पेशाब के साथ वीर्य जिसे लोग धातु कहते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं निकलता। पेशाब के साथ निकलने वाला चिपचिपा पदार्थ वीर्य नहीं होता है बल्कि वह प्रोस्टेट तथा मूत्रमार्गीय ग्रन्थियों का स्राव होता है। जब कोई व्यक्ति शौच के लिए बैठता है तथा मलत्याग के लिए जोर लगाता है अथवा पेशाब त्याग करने के लिए थोड़ा दबाव डालता है तो यह दबाव मलाशय से होकर प्रोस्टेट तथा मूत्रमार्गीय ग्रन्थियों पर भी पड़ता है जिससे प्रोस्टेट तथा मूत्रमार्गीय ग्रन्थियों का जमा हुआ स्राव चिपचिपे पदार्थ के रूप में कुछ बूंदे मूत्रमार्ग से बाहर निकल आती हैं। सच तो यह है कि शरीर क्रिया विज्ञान के अनुसार पेशाब के साथ वीर्य का जाना संभव नहीं है क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति चरमसीमा पर पहुंचकर वीर्यपात करता है तब मूत्राशय का द्वार स्वतः ही बंद हो जाता है।

           विकसित देशों में लोग शौच के लिए कमोड का प्रयोग करते हैं लेकिन हमारे देश में उकडूं बैठकर शौच जाने का प्रचलन है। इस अवस्था में शौच के लिए बैठने वाला व्यक्ति अधिकतर नीचे की ओर देखता है तथा पेशाब से निकलते हुए पदार्थ को वीर्य समझ लेता है। इस संबंध में उसके मन में पहले से ही यह गलत धारणा बैठी होती है कि वीर्य बहुत ही कीमती और शक्ति बढ़ाने वाला होता है। इस सोच के चलते उसकी चिंता और भी अधिक बढ़ जाती है कि उसकी सारी शक्ति नष्ट हो रही है। इसके फलस्वरूप वह स्वयं को मानसिक और शारीरिक तौर पर कमजोर समझने लगता है। इसकी तुलना में विकसित देशों में कमोड का प्रचलन होने से शौच जाने वाले व्यक्ति का मुंह सीधा होता है। उसका ध्यान नीचे की ओर नहीं जाता है। इसलिए वह मानसिक व शारीरिक रूप से भी स्वस्थ बना रहता है।

           इसके अलावा हमारे देश में लिंग (पेनिस) के बारे में भी कुछ धारणाएं फैली हुई हैं जिसमें अधिकतर पु्रुषों में अपने लिंग (पेनिस) को लेकर खास उत्सुकता बनी रहती है। वे हमेशा अपने लिंग (पेनिस) की तुलना दूसरे के लिंग से किया करते हैं। यदि उसे लगता है कि दूसरे व्यक्ति के लिंग (पेनिस) की तुलना में उसके लिंग (पेनिस) की लंबाई व मोटाई कम है तो उसे अपने आप में ग्लानि और शर्मिन्दगी महसूस होती है। जिससे वह अपने लिंग (पेनिस) की लंबाई और मोटाई में वृद्धि के उपाय ढूढ़ता रहता है जोकि बिल्कुल ही निरर्थक है क्योंकि जिस प्रकार दो व्यक्तियों में नाक की लंबाई, आंखों की गहराई, माथे की चौड़ाई और कद की ऊंचाई भिन्न-भिन्न होती है। उसी प्रकार सभी व्यक्तियों के लिंग (पेनिस) की लंबाई और मोटाई अलग-अलग होती है। इस लंबाई और मोटाई का व्यक्ति की मैथुन क्षमता पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है।

           साधारतयः योनि की गहराई 15 सेमी होती है जबकि उसकी संवेदनशील तंत्रिकाएं केवल 5 सेमी गहरे भाग में ही समाप्त हो जाती हैं, बाकी के 10 सेमी भाग में कोई भी संवेदनशीलता नहीं होती है। इसलिए छोटे लिंग (पेनिस) वाले पुरुष को सेक्स करते समय अपना अधिक ध्यान योनि की संवेदनशील तंत्रिकाओं पर देना चाहिए क्योंकि स्त्री की कामसंतुष्टि के लिए उत्तेजित अवस्था में लिंग (पेनिस) की लंबाई 5 सेमी भी पर्याप्त होती है जोकि लगभग सभी पुरुषों की होती ही है। इसलिए लिंग (पेनिस) की लंबाई के चक्कर में न पड़कर केवल अपने यौनशक्ति की ओर ही ध्यान देना चाहिए।

           कुछ स्त्रियां भी लिंग के आकार को महत्व देती हैं। वे सोचती हैं कि लंबे लिंग (पेनिस) वाला पुरुष छोटे लिंग (पेनिस) वाले पुरुष की तुलना में स्त्री को अधिक काम-सुख प्रदान करता है। इसलिए ऐसी स्त्रियों को समझ लेना चाहिए कि योनि की रचना बहुत लचीली होती है। ऐसी अवस्था में लिंग (पेनिस) की लंबाई और मोटाई का कोई महत्व ही नहीं रह जाता है।

           नवविवाहित दम्पति इस बात को जानने के इच्छुक रहते हैं कि वे सेक्स कब और कितनी बार करें क्योंकि उनके मन में समाज में फैली भ्रांतियों के कारण ये डर बैठा होता है कि अधिक सेक्स करने से शारीरिक दु्र्बलता आ जाती है। या पुरुष को टी.बी. हो सकती है। इस तरह की बातें हमारे रूढ़वादी समाज की देन हैं। इसी चिंता और सोच के कारण वे दम्पति सेक्स की तीव्र इच्छा होते हुए भी अपनी सेक्स उत्तेजना को दबाये रखते हैं। ऐसा करना शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक हानिकारक होता है।

            नवविवाहित दम्पतियों को अपनी सेक्स इच्छा को दबाकर नहीं रखना चाहिए। उन्हें जब भी सेक्स की इच्छा हो, सेक्स कर लेना चाहिए क्योंकि सेक्स कब और कितनी बार करें इसका किसी भी चिकित्सा प्रणाली में कोई भी नियम या कानून नहीं है। सेक्स करने से किसी भी तरह की शारीरिक और मानसिक कमजोरी नहीं होती है। सेक्स सप्ताह में एक बार करें या सातों दिन करें- यह आपकी सेक्स इच्छा पर निर्भर करता है। कुछ दम्पति दिन या रात में दो या तीन बार सेक्स करके संतुष्ट होते हैं तथा कुछ दम्पति सप्ताह में केवल दो-तीन बार सेक्स करके ही संतुष्टि महसूस करते हैं। इसलिए सेक्स कितनी बार करें। इस बारे में न सोचकर अपनी इच्छानुसार सेक्स संबंध बना लेना चाहिए। इससे वैवाहिक जीवन में खुशिया बनी रहती हैं।

           वैवाहिक जीवन में आनंद, खुशी और संतुष्टि ही सबसे अधिक अहम बात होती है। कई दम्पति बार-बार सहवास करके भी संतुष्ट नहीं होते हैं तथा कई दम्पति एक बार की सेक्स क्रिया से असीम सुख और आनंद प्राप्त करते हैं। इसलिए सेक्स क्रिया की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण बात है- सेक्स की गुणवत्ता। इसके लिए सेक्स की तकनीक के बारे में जानना आवश्यक है जिससे सेक्स का अधिक से अधिक आनंद प्राप्त किया जा सके क्योंकि सेक्स की क्रिया स्त्री-पु्रुष दोनों मिलकर करते हैं और उन दोनों को समान रूप से तृप्ति मिलनी चाहिए।

           कुछ लोगों के अनुसार पुरुषों में स्त्रियों की अपेक्षा कामुकता अधिक होती है। इसलिए वे सेक्स क्रिया के दौरान उत्तेजित होकर शीघ्र ही स्खलित हो जाते हैं और स्त्री की सेक्स इच्छा अधूरी रह जाती है। ये धारणा आमतौर पर उन लोगों की होती है जो समाचारपत्रों और टी.बी. चैनलों पर यौन से संबंधित घटनाओं को पढ़ते और देखते हैं। इस प्रकार की घटनाओं में अक्सर पुरुषों को ही जिम्मेदार माना जाता है। जबकि कुछ स्त्रियां भी सेक्स क्रिया के मामले में पुरुषों से पीछे नहीं होती।

सामान्तयः ब्रह्मचर्य़ का तात्पर्य है- अविवाहित रहकर सेक्स क्रिया से दूर रहना। ब्रह्मचर्य़ का पालन करने वाला व्यक्ति हमेशा स्वस्थ, निरोगी और लंबी आयु वाला होता है। इसी गलतफहमी के कारण कुछ लोग ब्रह्मचर्य़ का पालन करके अपने शरीर की ऊर्जा को बनाये रखने की कोशिश करते हैं। जब उनकी यह कोशिश बेकार जाती है तो उनके मन में चिंता और ग्लानि का भाव उत्पन्न होने लगता है कि ब्रह्मचर्य़ का पालन भंग करके उन्होंने अपने स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा लिया है। जब ऐसी घटनाएं कई बार घट जाती हैं तो व्यक्ति की स्थिति बहुत ही गंभीर हो जाती है। क्योंकि सेक्स की इच्छा को रोकने से भावनात्मक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है, जिससे मन में तरह-तरह की कामुक कल्पनाएं आकर व्यक्ति की एकाग्रता को भंग कर देती हैं। इसके साथ ही चिड़चिड़ापन, अधीरता, अनिद्रा आदि गंभीर परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। कभी-कभी सेक्स की इच्छा को रोकने से जननेन्द्रियां भी निष्क्रिय होकर सेक्स उत्तेजना को कम कर देती हैं। ऐसे व्यक्तियों को स्वप्नदोष की शिकायत होना आम बात है। इसे दूसरे तरीके से इस प्रकार से समझा जा सकता है।   

           मान लो कि कोई बर्तन पानी से पूरा भरा हुआ है। यदि उस बर्तन  में कोई ठोस चीज या कोई अन्य सामान डाला जाए तो उस बर्तन में भरा हुआ पानी निकलकर बाहर निकल जाएगा। यही बात वीर्य के संबंध में भी लागू होती है। मनुष्य के शरीर में वीर्य का निर्माण लगातार होता रहता है लेकिन जो व्यक्ति ब्रह्मचारी होता है उसका वीर्य शरीर से बाहर नहीं निकलता है। इससे शरीर के कोष में वीर्य लगातार भरता रहता है। ऐसा व्यक्ति जब कभी भी कामुक सपने देखता है तो इससे उसके शरीर में एकत्रित वीर्य में गति आ जाती है जिसके परिणामस्वरूप उसका वीर्यपात हो जाता है। इस प्रकार से वीर्यपात होना ही स्वप्नदोष कहलाता है। कामुक सपने किसी भी आयु वाले व्यक्ति को आ सकते हैं। ब्रह्मचर्य़ और स्वप्नदोष का आपस में गहरा संबंध होता है।

           यही कारण है कि ब्रह्मचर्य़ का पालन करने वाले व्यक्ति स्वप्नदोष से पीड़ित हो जाते हैं। इसमें किसी भी प्रकार के आश्चर्य़ की बात नहीं है क्योंकि पुरुष का शुक्राशय, प्रोस्टेट ग्रंथियां तथा अंडग्रंथि मिलकर वीर्य का निर्माण लगातार करते रहते हैं और उसका निष्कासन भी स्वाभाविक है। वीर्य़ का निष्कासन सेक्स क्रिया, हस्तमैथुन अथवा स्वप्नदोष के माध्यम से होता है। यही कारण है कि ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले लोगों को स्वप्नदोष की अधिक शिकायत होती है। इसलिए स्वप्नदोष कोई रोग नहीं है बल्कि यह एक शारीरिक वृत्ति है। यदि आप भी इस समस्या से ग्रस्त हैं तो परेशान नहीं होना चाहिए और न ही इसकी चिकित्सा के लिए किसी डाँक्टर के पास जाने की आवश्यकता है। कुछ लोगों में यह भ्रम होता है कि स्वप्नदोष के बाद कमजोरी महसूस होती है। इसके बारे में सही राय यह है कि स्वप्नदोष के बाद कमजोरी महसूस होना सिर्फ मनोवैज्ञानिक है क्योंकि बचपन से हमारे मन में यह बात बैठा दी जाती है कि हमारी जननेन्द्रिय शरीर का विशेष अंग हैं और उससे निकलने वाला पदार्थ भी विशेष होता है। इस प्रकार की गलत धारणा ही व्यक्ति को तंत्रिकावसाद ग्रस्त कर देती है।

           कुछ लोग शादी के बाद अपनी पत्नी के कुंवारेपन की परीक्षा पहली बार सेक्स के दौरान निकलने वाले रक्त के माध्यम से करते हैं। उनकी धारणा यह होती है कि कुंवारी लड़की से पहली बार सेक्स करने से उसकी योनि से रक्त का स्राव होता है। यदि रक्त नहीं निकलता है तो इसका मतलब है कि वह लड़की कुंवारी नहीं है तथा वह पहले भी किसी दूसरे के साथ सेक्स संबंध बना चुकी है जबकि इस प्रकार की सोच मिथ्या होती है। वैज्ञानिक मतानुसार किसी युवती का योनिच्छद, जो कुंवारेपन की निशानी है, वह जन्म से ही होता है। किसी-किसी लड़की की कौमार्य झिल्ली खेल-कूद के दौरान चोट लगने से फट जाती है जिसके फलस्वरूप रक्तस्राव हो जाता है। कभी-कभी साइकिल चलाने से भी कौमार्य झिल्ली फट जाती है तथा रक्तस्राव हो जाता है। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि प्रथम सेक्स संबंध के समय में ही योनि से रक्त निकले।

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