हम और हमारा भोजन


हम और हमारा भोजन


आहार चिकित्सा :
प्राकृतिक चिकित्सा के कुछ महत्वपूर्ण ऑर्टिकल्स :

परिचय-

           कोई भी व्यक्ति जब भोजन करता है तो उस समय भोजन करने का मकसद सिर्फ यह नहीं होता कि उस भोजन से हमारी भूख शांत हो जाए या हमारा शरीर मोटा और ताकतवर बन जाए। भोजन करने का मतलब वास्तव में यह होता है कि हमारे स्थूल शरीर को पोषण के साथ-साथ हमारा मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य भी ठीक रहे।

           किसी भी व्यक्ति को पूरी तरह से स्वस्थ तभी करार दिया जा सकता है जब वह शरीर, मन और आत्मा तीनों से ही पूरी तरह से स्वस्थ हो। इनमें से किसी भी एक के अस्वस्थ रहने पर हम अपने आपको पूरी तरह से स्वस्थ नहीं कह सकते। इसी बात को ध्यान में रखकर हमारे यहां भोजन को 3 वर्गों में बांटा गया है- सात्विक भोजन, राजसिक भोजन और तामसिक भोजन।

सात्विक भोजन-

          जो अपने अच्छे-बुरे स्वास्थ्य के लिए अच्छे और मध्यम भोजन को चुनना चाहते हैं अर्थात जो आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक तीनों प्रकार से अच्छा स्वास्थ्य पाना चाहते हैं उन्हें सात्विक भोजन करना चाहिए।

राजसिक भोजन-

            जो लोग चाहते हैं कि वे सिर्फ मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ बने उन्हें राजसिक भोजन करना चाहिए।

तामसिक भोजन-

            जो लोग चाहते हैं कि भोजन करने से सिर्फ उनका शरीर ताकतवर और मजबूत बने उन लोगों को तामसिक भोजन करना चाहिए।

            बहुत से आहार शास्त्रियों का मानना है कि काफी सारे भोजन वाले पदार्थ ऐसे होते हैं जो शरीर के लिए भले ही बहुत अच्छे लाभ देने वाले हो लेकिन वे मानसिक और आध्यात्मिक नजरिये से रोग पैदा करने वाले ही होते हैं जैसे एक प्याज को ही ले लो, प्याज शरीर को लाभ पहुंचाने के हिसाब से चाहे कितना ही लाभकारी और गुणकारी क्यों न हो लेकिन मानसिक और आध्यात्मिक नज़रिये से यह एक तेज और निचले दर्जे का तामसिक भोजन का पदार्थ है। इसी तरह से मांस खाने से शरीर में मांस भले ही बढ़ जाए लेकिन उससे मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य की आशा कभी नहीं करनी चाहिए।

            स्वामी विवेकानंद जी ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि भगवान की भक्ति प्राप्त करने के बहुत सारे उपायों में सबसे पहली शर्त सात्विक भोजन करना ही है। इसका कारण यह है कि जिस ताकत से शरीर और मन का गठन होता है, वह ताकत खाने वाले भोजन में मौजूद होती है, हमारे पेट में जाकर इसका सिर्फ आकार ही बदलता है। हर भोजन का हमारे मन और शरीर दोनों पर अलग-अलग तरह से असर पड़ता है। भोजन में बहुत से पदार्थ बहुत उत्तेजक होते हैं। क्या एक शराब पीने वाला व्यक्ति अपने मन को काबू में रख सकता है? ऐसे ही एक मांस खाने वाला व्यक्ति अहिंसा का व्रत नहीं रख सकता। यह एक आध्यात्मिक रहस्य है कि मन तब तक शुद्ध नहीं हो सकता जब तक कि व्यक्ति का खाने वाला भोजन शुद्ध नहीं होता। ईश्वर की भक्ति तब तक नहीं बन सकती जब तक कि मन पवित्र नहीं होता। भोजन की शुद्धि होने से तत्व की शुद्धि होती है अर्थात उस समय मन, इन्द्रिय, विषय समूह को ग्रहण करके राग, द्वेष, मोह को त्याग कर शुद्ध हो जाता है और इस रूप से सत्व शुद्धि हो जाने पर मन में ईश्वर की भक्ति विराजमान होती है।

            इससे यह बात साफ हो जाती है कि हर दृष्टि से हमारा भोजन यानी लाभकारी भोजन का मतलब सात्विक भोजन ही होता है। सात्विक भोजन करने वाले का शरीर, मन और आत्मा तीनों शुद्ध और पवित्र होते हैं।

लाभकारी भोजन की कसौटी यह है कि-

  • भोजन शरीर की खर्च हुई ताकत को दुबारा लौटाने वाला हो।
  • यह भोजन शरीर को बढ़ाने वाला हो।
  • भोजन शरीर को अच्छी मात्रा में गर्मी देने वाला हो।
  • इस भोजन से शरीर में ताकत पैदा हो।
  • यह भोजन शरीर में जल्दी से जल्दी पचकर शरीर को लाभ पहुंचाने वाला हो।
  • भोजन उत्तेजक नहीं होना चाहिए।
  • खाने वाला भोजन याद्दाश्त, उम्र, रंग, ओज, सत्व और चमक को बढ़ाने वाला हो।

असंयुक्त भोजन-

            असयुंक्त भोजन का मतलब होता है कि एक समय में सिर्फ एक ही भोजन को खाना जैसे एक समय कोई एक किस्म का फल खाना और दूसरे समय में सिर्फ दूध तथा तीसरे समय कोई और भोजन खाना। ये एक संतुलित असंयुक्त भोजन है। अगर किसी तरह से ऐसा भोजन करना सम्भव न हो तो एक समय में 2 तरह के लेकिन मेल वाले भोज्य पदार्थ एक साथ खाए जा सकते हैं जैसे- फल और दूध, रोटी और गुड़, दाल और दही आदि।

            बहुत से लोग बोलते हैं कि एक समय में एक ही चीज खानी चाहिए  क्योंकि हमारे शरीर के अन्दर पहुंचने पर हर भोजन के पदार्थ अलग-अलग प्रतिक्रिया करते हैं और पचने में भी वे अलग-अलग समय लेते हैं। इसलिए हम जो भोजन करते हैं, उसका हमारे शरीर पर अच्छा असर पड़े और वह पूरी तरह से पचकर हमारे शरीर में लगे इसके लिए सबसे जरूरी है कि हम एक समय में सिर्फ एक ही चीज खाएं और उसे पूरी तरह से पचने का मौका दें। इसके विपरीत अगर हम एक बार के भोजन में बहुत सारी तरह की चीजें खाएंगे तो उनको पचने में गड़बड़ी होना तो स्वाभाविक ही है। यह इस कारण से होता है कि शरीर की जीवनीशक्ति को अगर एक समय में 2 या कई अलग-अलग गुण और असर वाले खाद्य पदार्थों को पचाने का काम सौंपा जाएगा तो यह बिल्कुल निश्चित है कि किसी भी खाद्य-पदार्थ को वह पूरा-पूरा नहीं पचा सकेगी और उसका नतीजा या तो कोई रोग होगा या बुरा स्वास्थ्य होगा।

लाभकारी भोजन का विश्लेषण-

            इस सिद्धांत के मुताबिक दूध और दही खाना सबसे अच्छा होता है। बहुत से लोग इन दोनों को एक साथ खाने को शरीर को नुकसान पहुंचाने वाला बोलते हैं। इस सिद्धांत को सामने रखकर दूध और ताजे फल खासकर खट्टे फल जैसे- संतरा, अंगूर, मौसमी, नींबू, टमाटर आदि को एकसाथ खाना सबसे अच्छा माना जाता है।

            एक जांच कराने पर पता चला है कि जिन व्यक्तियों को दूध हजम नहीं होता है वे अगर दूध पीने से पहले कागजी नींबू को चूस लें या 1-2 संतरे का रस पी लें तो उन्हें दूध हजम होने लगता है क्योंकि आमाशय में दूध को हजम होने के लिए जरूरी है कि वह पेट में जाते ही फट जाए। इस काम के लिए मुंह की लार में पूरी मात्रा में क्षार का होना बहुत जरूरी है जिससे मुंह में जाते ही दूध अपने आप फट जाता है और इस काबिल बन जाता है कि उसके अच्छे पाचन के लिए उस पर रासायनिक प्रक्रिया पूरी होने लगे। दूध के साथ खट्टे फलों का सेवन करना इस प्रक्रिया को और भी आसान बना देता है। इसी तरह से नीचे दिये गए मेल भी संयोग साध्य आहार कहलाते हैं।

  • चने की रोटी के साथ टमाटर या दूसरे खट्टे फल खाना।
  • दही के साथ फल खाना।
  • दाल या मांस के साथ खट्टे फल खाना।
  • मछली या अण्डे के साथ खट्टे फल खाना।
  • दूध के साथ कागजी नींबू का सेवन करना।

श्वेतासार (स्टार्च) प्रधान-

            खाने वाले पदार्थ जैसे- गेहूं, जौ, मक्का, बाजरा, चावल और आलू आदि के साथ कच्ची सब्जियों, ताजे फलों, मेवों और शर्करा को मिलाकर खाना बहुत लाभदायक रहता है। इस सिद्धांत के मुताबिक नीचे कुछ स्वास्थ्यवर्द्धक मेल वाले भोजन इस तरह से हैं-

  • रोटी और सलाद।
  • चावल और किशमिश
  • रोटी और पिंडखजूर।
  • रोटी और शहद या खांड या शहद।
  • चावल और मीठे आम का रस।

वसा प्रधान-

            चिकनाई वाले पदार्थ आमाशय में जाकर बिल्कुल नहीं हजम होते। वे केवल आंतों में ही पचते हैं। इसलिए अगर ये पदार्थ, प्रोटीन प्रधान, या श्वेतासार प्रधान वाले खाद्य पदार्थों के साथ खाए जाएं तो ये लाभकारी साबित होते हैं। इस तरह के कुछ उदाहरण हैं-

  • मक्खन के साथ रोटी।
  • दालों के साथ घी या मक्खन।
  • मांस के साथ नारियल या मूंगफली।
  • चावल के साथ मलाई या क्रीम।
  • रोटी के साथ घी

         इन सबको इस तरह से मिलाकर खाना बहुत ही लाभकारी साबित होता है और ये पचकर आसानी से शरीर में लग जाते हैं।

         श्वेतासार प्रधान और चिकनाई वाले द्रव्यों के साथ चीनी वाले खाद्य द्रव्यों और हरी सब्जियों का मेल खूब बैठता है, क्योंकि ये क्षारमय होते हैं, जैसे-

  • रोटी और मक्खन के साथ सलाद और मुनक्का
  • रोटी और घी के साथ सलाद और गुड़।
  • चावल और मलाई के साथ हरा साग और शहद।
  • आलू के साथ तेल, गुड़ और हरी सब्जियां।
  • रोटी के साथ क्रीम, शहद और सब्जियां।

प्रोटीन प्रधान-

            खाद्य द्रव्यों के साथ खट्टे फलों या हरी सब्जियों को मिलाकर खाना लाभकारी होता है जैसे-

  • दही के साथ सलाद और दाल।
  • दही के साथ मांस और सब्जियां।
  • दाल के साथ घी और सेब
  • दाल के साथ मलाई और अंडा।
  • दाल के साथ पकाई हुई साग-सब्जियां और घी।

प्रोटीन प्रधान-

            इन चीजों को एकसाथ मिलाकर खाना बहुत अच्छा रहता है। लेकिन ऐसे पदार्थ ज्यादा मात्रा में नहीं खाने चाहिए क्योंकि प्रोटीन वाले भोजनों का ज्यादा सेवन कभी-कभी जहर की तरह हानिकारक हो जाता है।

          नीचे लिखे मेल वाला भोजन गुणकारी होता है, लेकिन अगर वो थोड़ी मात्रा में खाए जाए तो-

  • चने की रोटी और गाढ़ी दाल।
  • चने की रोटी और दही।
  • मांस और दाल।
  • मांस और मछली।
  • अंडा और चने की रोटी।

संतुलित भोजन-

           संतुलित भोजन को अंग्रेजी में बेलेन्सड डाइट भी कहा जाता है। संतुलित भोजन वह भोजन होता है, जिसमें आहार-विज्ञान और शरीर विज्ञान के मुताबिक वे सारी चीजें सही मात्रा में मौजूद होनी चाहिए, जो शरीर के निर्वाह के लिए बहुत जरूरी हैं। इस तरह के भोजन से शरीर का अच्छी तरह पालन-पोषण होता है, शरीर को पूरी ताकत ओर गर्मी मिलती है तथा अच्छा स्वास्थ्य और उम्र बढ़ती है। संतुलित भोजन में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, चिकनाई, खनिज लवण, स्फोक, पानी तथा हर प्रकार के विटामिन सही मात्रा में होते हैं, जिनसे शरीर की सारी जरूरतें पूरी हो जाती हैं।

            अगर इन सारे खाने वाले तत्वों में से किसी एक ही खाने वाले तत्व का सेवन किया जाएगा तो स्वाभाविक है कि उससे शरीर की बहुत सारी दूसरी जरूरतें पूरी नहीं हो सकेंगी, जिससे शरीर रोगी हो जाएगा।

            साधारणत: एक व्यक्ति को रोजाना कौन सी वस्तु खानी चाहिए और कितनी मात्रा में खानी चाहिए, जिससे कि उसकी सारी शारीरिक जरूरत पूरी हो जाएं, संतुलित भोजन कहलाता है-

संतुलित भोजन निम्नलिखित है-

खून का क्षारत्त्व तथा अम्लता का संतुलन प्रदान करने वाला संतुलित भोजन-

           किसी भी व्यक्ति के शरीर का खून तभी साफ समझा जाता है, जब उसमें रासायनिक प्रक्रिया के फलस्वरूप 80 प्रतिशत क्षारता और 20 प्रतिशत अम्लत्व हो।

            जब शरीर के खून में क्षारत्व और अम्लत्व के इस 4 और 1 के अनुपात में कमी या अधिकता हो जाती है, अथवा जब खून में क्षारधर्मी खाने वाले पदार्थों के कम इस्तेमाल के कारण क्षारत्व की कमी और अम्लतत्व की अधिकता हो जाती है तो प्रकृति खून और शरीर के दूसरे तंतुओं में से क्षारत्व को खींचकर शरीर के पोषण के काम में उसे लगाने के लिए मजबूर हो जाती है, जिसका नतीजा यह होता है कि शरीर का खून और दूसरे तंतु जिनसे क्षार तत्व खींच लिया जाता है, नि:सत्व, कमजोर और रोगी हो जाते हैं। स्नायु और मज्जा को बनाने के लिए खून में अम्ल तत्व की थोड़ी बहुत मात्रा तो होनी चाहिए। इससे ज्यादा खून में अम्ल तत्व के होने से तो खून जहरीला बन जाएगा और जिसका नतीजा बहुत भयानक होगा।

            एक बहुत बड़े चिकित्सक ने कहा है कि रोगों के कारण जो मौतें होती हैं, वे सारी शरीर में अम्लता की अधिकता से होती हैं। इसके विपरीत खून में क्षारत्व वह चीज होती है जो खराब हुए तंतुओं की मरम्मत करती है, बीजकोशों को नया जीवन देती है और व्यक्ति को रोगों से लड़ने की ताकत प्रदान करती है। किसी भी व्यक्ति के शरीर में अगर क्षारत्व की कमी होती है तो वह एक पल भी जिंदा नहीं रह सकता। यह इस कारण से होता है कि खून में क्षारत्व की कमी हो जाने से उसमें मौजूद सफेद कणों की हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए काम करने की ताकत कम हो जाती है तथा शरीर को सही तरीके से चलाने वाली सारी व्यवस्था ही उल्ट-पुल्ट हो जाती है।

            शरीर में खून के अन्दर क्षार की कमी हो जाने के कारण रोगी को मधुमेह, आंखों के रोग, हर तरह का बुखार, गैस के रोग, पेट के रोग और भोजन पचाने की क्रिया के खराब होने के रोग पैदा हो जाते हैं।

            कुछ बहुत बड़े चिकित्सकों ने बताया है कि मौत का मतलब क्या होता है- अम्लविष के शरीर के द्वारा सोखे जाने का आखिरी नतीजा और शरीर में क्षारत्व की कमी। हम लोग रोजाना जो भोजन करते हैं वह शरीर में जाकर क्षार या अम्ल जातीय पदार्थ में परिवर्तित हो जाता है। भोजन पहले आमाशय में ऑक्सीजन की आग से पकता है और उसके बाद जलकर राख बन जाता है। उस भोजन की राख में जो खनिज लवण मौजूद होते हैं वे ही शरीर के अन्दर गलकर अम्लत्व या क्षारत्व को बढ़ाते हैं। बहुत तरह के खनिज लवण खाने वाले लवणों में पाए जाते हैं। उनमें से कुछ जैसे- सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम और आयन (लोहा) आदि शरीर में क्षारत्व पैदा करते हैं। किसी खाने वाली वस्तु के स्वाद में खट्टापन मालूम करके ही उसे अम्लजातीय खाने वाली वस्तु या खटाई नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि किसी भी खाने वाले वस्तु की प्रक्रिया खाने के बाद आमाशय में जाकर क्या होती है उसके स्वाद द्वारा पता करना मुश्किल है, जैसे- लेमू क्षारधर्मी खाने वाली वस्तु होती है, लेकिन ये स्वाद में बहुत खट्टी होती है। इसके अलावा लगभग जितने भी खट्टे फल होते हैं सारे के सारे क्षारधर्मी ही होते हैं क्योंकि आमाशय में जाने के बाद ये सारे क्षारधर्मी तत्व के रूप में बदल जाते हैं और उनका खट्टा भाग उसी में खो जाता है। क्षारधर्मी खाने वाले पदार्थों के अन्दर सिर्फ 3 ही तरह की खटास पाई जाती है- मैलिक एसिड, टार्टरिक एसिड और साइट्रिक एसिड। ये तीनों ही शरीर के लिए बहुत ही लाभकारी हैं। दूसरी सभी तरह की खटाइयां अम्लकारक होती हैं और शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं।

           नींबू की जाति के सारे फलों में साइट्रिक एसिड पूरी मात्रा में होते हैं। बेदाना, काली किशमिश और टमाटर में यह एसिड पाया जाता है।

            इन सबसे एक बात तो पता चलती है कि हमारे भोजन के चुनाव में क्षारधर्मी और अम्लधर्मी भोजनों के क्रमश: 4 और 1 के अनुपात की कितनी बड़ी महत्त्वता और खासियत है।

क्षारधर्मी खाने वाले पदार्थ

अम्लधर्मी खाने वाले पदार्थ

सारे ताजे, पके हुए और खट्टे फल (खासकर की नींबू जाति के फल)

मछली, अंडा

धार वाला दूध

पनीर

मट्ठा

गेंहू, चावल, मकई आदि अनाज

हरा साग

रोटी

हरी सब्जियां छिलकों के साथ

दालें

हरी मटर

सूखा मेवा

छिलके के साथ आलू

सफेद चीनी और मिश्री आदि

पत्तों के साथ मूली

मिठाइयां

मक्खन

तली हुई चीजें

प्याज

चाय, कॉफी तथा सारी नशे की चीजें, शहद, गुड़, मुरब्बा, अचार, चटनी, खटाई, सिरका आदि।

कच्ची गिरी

उबला हुआ दूध

किशमिश

खीर

मीठा दही

मसाले

गन्ना

चटपटे मसाले

गाजर

डिब्बों में बंद भोजन

सलाद

तेल

हरा चना

नमक

साधारण संतुलित भोजन-

            अगर अपने हिसाब से हम अपने भोजन में कार्बोहाइड्रेट 2 से 3 भाग, चिकनाई 1 से 6 भाग तथा प्रोटीन, खनिज लवण और विटामिन 1 से 6 भाग रखते हैं तो यह एक आम व्यक्ति के लिए संतुलित भोजन समझा जा सकता है। व्यक्ति की उम्र, शारीरिक बनावट, काम-काज, मौसम और देश तथा स्थान के विचार से इस तरह के भोजन में कमी या ज्यादा तो होना स्वाभाविक है।

सबसे सस्ता संतुलित भोजन-

हमारे रोजाना के भोजन में निम्नलिखित खाने वाले तत्व सही मात्रा में  मौजूद होने चाहिए-

कार्बोहाइड्रेट

408 ग्राम

चर्बी

73 ग्राम

प्रोटीन

74 ग्राम

कैल्शियम

1.024 ग्राम

स्फुर

1.47 ग्राम

आयन (लोहा)

44 मिलीग्राम

विटामिन `ए´

7000 बाहर की यूनिट में

विटामिन `बी´

400 बाहर की यूनिट में

विटामिन `सी´

170

`बी2´

बहुत सारी

एक व्यस्क मजदूर का संतुलित भोजन-

            एक आम मेहनत करने वाले लड़के के लिए रोजाना संतुलित भोजन में 90 ग्राम प्रोटीन, 475 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 60 ग्राम चिकनाई और पूरी मात्रा में विटामिन और खनिज लवणों की जरूरत होती है, जो निम्नलिखित भोजन से मिल सकती है-

प्रोटीन (दाल या मांस)

116 ग्राम

चिकनाई (घी, मक्खन आदि)

29 ग्राम

कार्बोहाइड्रेट (आटा, कभी-कभी चावल)

464 ग्राम

दूध (बदले में दही, मटठा)

464 ग्राम

साग-सब्जी

406 ग्राम

गुड़

29 ग्राम

कुल मिलाकर जोड़

डेढ़ किलो 13 ग्राम

एक बूढ़े व्यक्ति के लिए रोजाना के लिए संतुलित भोजन की तालिका निम्नलिखित है-

रोटी या चावल

392 ग्राम

हरी पत्ते वाली सब्जियां

84 ग्राम

सब्जियां जैसे गाजर आदि

112 ग्राम

दूसरी सब्जियां

84 ग्राम

फल

84 ग्राम

गुड़

56 ग्राम

घी, तेल या मक्खन

56 मिलीलीटर

मांस, मछली (बदले में दूध)

28 ग्राम

अंडा (बदले में मट्ठा या दही)

28 ग्राम

दूध

280 मिलीलीटर

किसी भी व्यक्ति के लिए रोजाना का संतुलित भोजन-

            दुनिया के बहुत मशहूर आहार विशेषज्ञों ने एकसाथ मिलकर एक सर्वांगपूर्ण भोजन की तालिका बनाई है और उन्होंने यह भी कहा है कि यह भोजन दुनिया में किसी भी व्यक्ति के लिए रोजाना का बहुत अच्छा, संतुलित भोजन लाभकारी साबित होगा।

दुनिया के किसी भी व्यक्ति के लिए संतुलित भोजन

भारतीय शाकाहारी लोगों के लिए संतुलित भोजन

भारतीय मांसाहारी लोगों के लिए संतुलित भोजन

 

गेहूं सही मात्रा में (280 ग्राम)

560 ग्राम

560 ग्राम

दाल

84 ग्राम

84 ग्राम

कन्द और ठोस सब्जी

(224 ग्राम)

336 ग्राम

224 ग्राम

हरे साग  

(224 ग्राम)

 

224 ग्राम

 

फल

(140 ग्राम)

56 ग्राम

56 ग्राम

तेल, घी (चिकनाई)

56 मिलीलीटर

28 मिलीलीटर

दूध (588 मिलीलीटर)

224 मिलीलीटर

224 मिलीलीटर

मिठाई

(56 ग्राम)

56 ग्राम

56 ग्राम

मांस, मछली

 

 

अंडा

(140 ग्राम)

 

112 ग्राम

सादा और सात्विक भोजन-

            सरस, स्निग्ध, शरीर और दिल को लाभ पहुंचाने वाले भोजन को सात्विक भोजन कहा जाता है। ज्यादा मिर्च-मसाले वाला, खट्टा, नमक वाला, तीखा, रूक्ष भोजन `राजसिक´ भोजन कहलाता है तथा बासी, बिना रस वाला, बदबूवाला, जूठा भोजन `तामसिक´ भोजन कहलाता है।

            सात्विक भोजन करने वाले व्यक्ति की उम्र, ताकत बढ़ती है और व्यक्ति पूरी जिंदगी निरोगी होकर खुशी के साथ जीता है।

            राजसिक भोजन करने वाले व्यक्ति को दुःख, शोक और रोग ज्यादातर होते हैं।

            तामसिक भोजन करने से अज्ञानता, जड़ता, कुरोग और हिंसक प्रवृति बढ़ती है। इसलिए विचारवान व्यक्ति सात्विक भोजन खाना पसंद करते हैं और राजसिक और तामसिक भोजन से नफरत करते हैं।

            बहुत से लोग बोलते हैं कि हम सादा और सात्विक भोजन ही क्यों करें? इसका कारण यह है कि हमारा खाने वाला भोजन आमाशय में पचने के बाद 3 भागों में बंट जाता है। स्थूल, निस्सार अंश, मल बनते हैं, सारअंश से मांस आदि बनते हैं और बारीक अंश से मन की पुष्टि होती है। जिस प्रकार दही को बिलोने पर उसका बारीक अंश ऊपर आकर घी बन जाता है, उसी तरह से अन्न के बारीक अंश से मन बनता है। मन अन्नमय ही है। आहार शुद्धि से- सत्वशुद्धि, सत्वशुद्धि से ध्रुवास्मति ओर स्मृति शुद्धि से संसार ग्रन्थियों का मोचन होता है। वैसे भी हम जैसा भोजन करते हैं, हमारी सोच भी वैसी ही हो जाती है। इसलिए अगर हमारा भोजन तामसिक होगा तो हमारा मन, बुद्धि और प्राण तथा शरीर भी तामसिक ही होगा, जिससे ब्रह्यचर्य धारण करने और साधना आदि अच्छे कर्म करना मुश्किल हो जाएगा। अगर हमारा भोजन राजसिक होगा तब भी मन और बुद्धि चंचल हुए बिना नहीं रह सकते। इसलिए समझदारी इसी में है कि हमेशा सादा और सात्विक भोजन ही खाया जाए।

            इस बारे में एक चिकित्सक का कहना है कि अगर सात्विक भोजन न भी मिले तो सिर्फ खजूर खाकर ही रह जाओ, लेकिन तामसिक भोजन की ओर बिल्कुल देखना भी पाप है। जब मन में चिन्ता और उदासी हो तो अन्न को छोड़कर सिर्फ दूध का सेवन करना चाहिए। इससे मन भी खुश हो जाएगा।

प्राकृतिक या सप्राण भोजन-

            जो प्राण से भरपूर होता है या सप्राण होता है, सिर्फ वही हमें जीवन जीने की ताकत दे सकता है। यह एक बहुत ही अटल प्राकृतिक सिद्धांत है, जो भोजन के सम्बंध में भी समान रूप से लागू होता है। काफी प्रयोगों द्वारा यह साबित हो चुका है कि सारे संसार के सारे लोग जो भोजन करते हैं वह 90 प्रतिशत से ज्यादा निष्प्राण और 10 प्रतिशत से ही कम सप्राण भोजन होता है और इसी कारण से इस आधुनिक युग में भी हमारे स्वास्थ्य का अभी तक विकास नही हुआ है और पूरी दुनिया में रोजाना रोग और रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है।

            प्रकृति मनुष्य से चाहती है कि वह खाने वाले पदार्थों को प्राकृतिक रूप में ही खाए और लाभ उठाए। प्रकृति से हमें फल, साग, सब्जी, अन्न आदि खाने वाली वस्तुएं जिस रूप में प्राप्त होती हैं, उनको उसी रूप में खाने से उनके प्राणतत्व, विटामिन, खनिज, लवण आदि हमारे शरीर को आसानी से प्राप्त हो सकते हैं। लेकिन मनुष्य प्रकृति की इस बात को न मानकर अपनी मर्जी से खाने वाली वस्तुओं को आग में पकाकर, तलकर, भूनकर या उबालकर उसमें तेल, मिर्च, मसाले, खटाई, मिठाई मिलाकर उसके गुणों को बिल्कुल ही समाप्त करके खाते हैं।

विशेष-

            भोजन को पकाकर जिस मात्रा में खाया जाना मुमकिन होता है, उसके सिर्फ आधे या इससे भी कम मात्रा में उसी भोजन को कच्चा खाकर जीवन की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं अर्थात आग पर पके हुए भोजन खाए तो जाते हैं ज्यादा मात्रा में लेकिन ऐसे पदार्थ शरीर को लाभ बहुत ही कम करते हैं। कच्चे भोजन को थोड़ी मात्रा में खाने से ही पेट भर जाता है जैसे- आधा किलो पालक का साग बनाकर कोई भी खा सकता है लेकिन उतना ही कच्चा पालक कोई नहीं खा सकता। जितना लाभ किसी व्यक्ति को आधा किलो पका हुआ साग खाने से हो सकता है, उससे कहीं ज्यादा लाभ सिर्फ 70-80 ग्राम कच्चा साग खाकर ही शरीर को पहुंचाया जा सकता है। प्रकृति की सबसे बड़ी खासियत तो यही है कि कम खाकर शरीर को ज्यादा लाभ पहुंचाया जाए।

             खाद्य-पदार्थों की दूसरी प्राकृतिक खासियत यह होती है कि वे निर्दोष होते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं ये खुद तो निर्दोष ही होते हैं, साथ-साथ जो व्यक्ति इनका सेवन करता है ये उसके शरीर को भी सुधारकर उसे निर्दोष बना देते हैं। ये खाने वाले पदार्थ आंतों में जाकर वहां सड़न पैदा नहीं करते, बल्कि वहां जाकर आंतों में रहने वाले घातक रोगाणुओं को समाप्त करके शरीर के लिए उपयोगी जीवाणुओं को पैदा करते हैं। इसके बाद प्राकृतिक खाद्य पूरी तरह क्षारधर्मी होने के कारण से उनका क्षार खून के अन्दर मौजूद अम्लतव को समाप्त करके शरीर को शुद्ध और निरोगी बनाता है। इसलिए रोगी होने पर सप्राण भोजन जरूर ही करना चाहिए ताकि रोग जितनी जल्दी हो सके दूर हो।

बहुत ज्यादा लाभकारी भोजन-

            यदि किसी व्यक्ति का सबसे लाभकारी भोजन कोई हो सकता है तो वह सप्राण और प्राकृतिक भोजन ही है। अर्थात वह भोजन जो ताजे फलों, कच्ची साग-सब्जियों, उसी समय निकाला हुआ दूध और शहद तथा मेवों के रूप में हमें सीधे प्रकृति से मिलता है। इसे ही निर्दोष भोजन कहा जाता है। सारे तरह के अन्न जो हरे ताजे और पानी में भिगोकर अंकुर निकाले हुए हो सप्राण भोजन कहलाते हैं जैसे खेतों से मिला ताजा हरा गेहूं, जौ, चना, मटर, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि अन्न तथा भिगोकर और अंकुरित किए हुए सभी तरह के अन्न-बीज और ताजा निकाला हुआ कच्चा दूध तो अमृत के समान ही है। दूध से हमें प्रोटीन मिलता है। इसी तरह से बादाम, अखरोट और मूंगफली आदि मेवों से भी हमें अच्छी किस्म की प्रोटीन मिल सकती है। अखरोट में प्रोटीन 16 प्रतिशत, बादाम में 21 प्रतिशत और मूंगफली में 27 प्रतिशत होती है। इन मेवों की प्रोटीन का मुकाबला मांस, मछली का प्रोटीन नहीं कर सकता। इसका कारण यह है कि मांस में रोगाणु, यूरिया और यूरिक एसिड आदि जहर काफी मात्रा में होते हैं।

            भोजन में मिठाईयों की जगह पके हुए मीठे फल और शहद तो बहुत ही आसानी से ले सकते हैं। शहद तो खुद पचा पचाया भोजन होता है जो हमारे आमाशय में जाते ही पच जाता है। इसमे 42 प्रतिशत ग्लूकोज होता है। पिंडखजूर और किशमिश आदि का मीठापन किसी चीनी से कम नही होता है। इसके अन्दर जो चीनी होती है वह सफेद चीनी से हजार गुना अच्छी और लाभकारी होती है। नारियल, दूध और मेवों से हमारे शरीर के लिए सही मात्रा में चर्बी भी मिल जाती है। विटामिन और खनिज लवणों के भण्डार ताजे फल ही होते हैं।

ज्यादा लाभकारी भोजन-

            बिना छने आटे की रोटी, कनादार चावल छिलकों के साथ, तथा मिर्च-मसाला रहित आग पर पकी हुई साग-सब्जियां साथ में कच्ची सब्जियों का थोड़ा सा सलाद, फल, धार वाला दूध तथा मेवों को सबसे अच्छा भोजन तो नहीं कहा जा सकता लेकिन ऐसे भोजन को खाकर भी कोई अपना स्वास्थ्य और जीवन सुखी बना सकता है।

थोड़ा लाभ देने वाला भोजन-

            छने हुए आटे की रोटी, पॉलिश किए हुए चावलों का भात, बिना छिलके की और मिर्च-मसालों के साथ दालें और दूसरे चटपटे भोजन तो लाभकारी तो कम होते हैं लेकिन हानिकारक ज्यादा होते हैं। ऐसे भोजन को जहां तक हो सके बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

जानकारी-

            खाने वाली चीजों का असली स्वाद तो उनकी प्राकृतिक अवस्था में ही आता है। चटपटे भोजनों में जो स्वाद महसूस होता है वह उस भोजन का खुद का नहीं होता। जबकि प्राकृतिक भोजनों का स्वाद अपना और असली होता है।

मौसम के अनुसार भोजन-

            जो खाने वाली वस्तु जिस मौसम में पैदा होती है उन्हीं को खाना मौसम के अनुसार भोजन कहलाता है जैसे-`आम´ गर्मियों और बारिश के मौसम में उगता है तथा पकने के बाद खाने के लायक हो जाता है। इसलिए उन्हीं दिनों में आम खाने से लाभ उठाया जा सकता है। काफी लोग आम को अलग-अलग उपायों द्वारा सुरक्षित रखकर अक्सर सर्दियों के मौसम में खाते हैं जिसका उन्हें पूरा लाभ नहीं मिल पाता है।

            खाने वाली चीजों का उनके मौसम से बड़ा ही गहरा नाता होता है। जिस मौसम में जिन रोगों के पैदा होने की संभावना होती है, उस मौसम में प्रकृति ज्यादा मात्रा में वही वस्तुएं पैदा करती है जिनसे उन रोगों को दूर करने में मदद मिलती है। अगर कोई व्यक्ति मौसम के अनुसार ही भोजन करने का नियम बना लें तो उसकी उम्र लंबी होती है और उसे कोई रोग भी नहीं होता है।