यौन रोग


यौन रोग


सेक्स से संबन्धित रोग :

परिचय-

            सेक्स की कमी से उत्पन्न होने वाले दुष्परिणाम का सीधा संबंध मुख्य रूप से कई तरह से होता है जैसे- लिंग (शिश्न) के अंदर उत्तेजना पैदा न होना, लिंग का योनि के अंदर प्रवेश न करना, सही तरीके से मिलन न होना, शीघ्रपतन के जैसे रोग के साथ जुड़ा होता है। इसलिए इसके बारे में यह जान लेना चाहिए क्योंकि इन्हीं क्रियाओं की गड़बड़ी के या इसके बिगड़ जाने की वजह से ही सेक्स के दुष्परिणाम निकलते हैं जैसेः-

शिश्न के अंदर तनाव न होनाः-

            अगर किसी पुरुष का लिंग हस्तमैथुन करते हुए या सुबह की अवस्था में उत्तेजना की अवस्था में आ जाता है परंतु संभोग करते समय लिंग के अंदर बिल्कुल भी तनाव पैदा नहीं होता है तो यह कठिनाई मूल रूप से मनोवैज्ञानिक हो सकती है लेकिन शारीरिक नहीं हो सकती है।

योनि के अंदर प्रवेश करनाः-

            यह पता लगाना अधिक आवश्यक है कि पुरुष अपने लिंग को स्त्री की योनि के अंदर डालने में कामयाब है या नहीं, उसे सेक्स क्रिया करने के बारे में पूर्ण ज्ञान है या नहीं है। अगर वह पुरुष लिंग को योनि में डालते समय अपने आप में तकलीफ महसूस करता है तो इसकी मुख्य वजह होती है योनि के आकार में कोई कमी होना। संभोग क्रिया करके समय अगर मन में किसी तरह की दिमागी परेशानी हो जाती है तो वह काम करने की शक्ति को शांत कर देती है क्योंकि उसी दिमागी परेशानी की वजह से उत्तेजना से भरपूर लिंग भी योनि के अंदर जाने के पहले ही सुस्त पड़ जाता है।

तालमेल न बैठनाः-

अगर पुरुष अपने लिंग को योनि में डालने के बाद अपने लिंग की उत्तेजना को खत्म कर देता है तो इसकी मुख्य दो वजह हो सकती हैं-

  • सेक्स क्रिया करते समय असफल होने पर पुरुष के हृदय के अंदर डर व दिमागी परेशानी।
  • लिंग व योनि का सही तरह से मेलजोल न बैठ पाना, क्योंकि योनि का बहुत अधिक ढीला हो जाना।

आर्गेज्मः-

            इसके अंदर शीघ्रपतन का होना एक प्रमुख यौन परेशानी है, क्योंकि यह परेशानी शीघ्रपतन तथा विलंबिल स्खलन से जुड़ी होती है। कई पुरुष इस अवस्था में होते हैं कि उनका लिंग योनि में जाते ही वीर्यपात हो जाता है तथा कई पुरुषों का वीर्य योनि में प्रवेश करने से पहले ही निकल जाता है और कुछ पुरुषों का वीर्य योनि के अंदर जाने के कुछ ही समय के अंदर निकल जाता है। यदि इस तरह से देखा जाए तो शीघ्रपतन का मतलब होता है कि पुरुष का समय से पहले ही वीर्यपात का हो जाना। शीघ्रपतन होने की वजह निम्नलिखित क्रिया की वजह से होती है।  

  • किसी वजह से परेशानी होने से आपसी रिश्तों में दिक्कतें आ जाती हैं।
  • सेक्स क्रिया करते समय उसके बारे में ज्ञान न होना क्योंकि काफी समय तक सेक्स से दूरी बनाए रखना  
  • वीर्यपात को निकलने को रोकने के लिए सफल न होना तथा अपने आप को शीघ्रपतन का मरीज समझना।

विलंबित वीर्यपातः-

            यह समस्या वीर्यपात के बिल्कुल विपरीप है। विश्वभर में 10 में से 5 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो संभोग क्रिया करते समय आगे-पीछे झटके लगाने की बजाय अगल-बगल में झटके लगाते हैं और कई लोग एक-दो बार ही आगे-पीछे झटके मार कर आराम करना पसंद करते हैं। इसलिए कहने का तात्पर्य यह है कि अगर आज के माहौल को देखते हुए यदि नवयुवकों को सेक्स के बारे में सही तरीके से जानकारी दे दी जाए तो इस प्रकार से सेक्स के प्रति होने वाले रोगों की समस्या भी कम होता जाएगी।

वीर्यपातः-

            पेशाबमार्ग की नली से होते हुए जोर के झटके के साथ फुहारे के रूप में जो वीर्य निकलता है वह वीर्यपात कहलाता है। अगर पुरुष वीर्यपात को पूर्ण रूप से रोकना चाहता है तो उसे अपना अधिकतर समय चरम सीमा पर लगाना चाहिए। इस तरह से करने से सेक्स करने की उत्तेजना आ जाती है जिसकी वजह से पुरुष उस अवस्था में जा पहुंचता है कि वह वीर्यपात करने के लिए मजबूर होने लगता है। इस तरह से करने के बाद पुरुष किसी भी तरह अपनी सारी उत्तेजना को रोक दें परन्तु कूल्हें की पेंशियां कुछ देर के लिए तो सिकुड़ जाती हैं लेकिन वीर्य पिचकारी की तरह निकलता है।

            कई पुरुष ऐसे होते हैं जो वीर्यपात को रोकने के लिए नए-नए तरीके अपनाते हैं। वे वीर्यपात को रोकने के लिए क्रीम या मलहम का इस्तेमाल करते हैं तथा कई पुरुष तो शराब तक का सहारा ले लेते हैं।

            वीर्यपात को कंट्रोल में करने का सबसे सरल उपाय यह है कि हस्तमैथुन करने के लिए कुछ देर के लिए रुक जाएं और इसके बाद फिर हस्तमैथुन शुरू कर दें या फिर हस्तमैथुन करते समय अपने लिंग को हाथों से दबाने की कोशिश करें, क्योंकि सेक्स क्रिया का सुख पाने के लिए लिंग को दबाने का तरीका भी एक सरल उपाय है। इस तरह से करने को लिंग का व्यायाम भी कहा जा सकता है।

व्यायाम करने की पहली विधिः-

            हस्तमैथुन करने के लिए हाथ को आगे तथा पीछे करते रहें, जब आपको यह महसूस हो कि वीर्य निकलने वाला है तो उसी समय तुरंत ही रुक जाना चाहिए। उसके बाद कुछ समय रुककर इस कार्य को दुबारा से शुरू कर देना चाहिए। इस क्रिया को करते समय कम से कम पंद्रह मिनट का समय लगाना चाहिए तथा इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जब रुके और जब शुरू करें तो इन दोनों के बीच इतना अंतर होना चाहिए कि पुनः हस्तमैथुन करते समय वीर्यपात करना जरुरी न हो जाए। इस व्यायाम को करने का यह मतलब होता है कि पुरुष वीर्यपात के निकलने से पहले के कारण को जान लें और वीर्य के निकलने से पहले ही अपनी उत्तेजना को रोकने के बारे में प्रैक्टिस करना सीख लें।

दूसरी विधिः-

            इस व्यायाम को करने के लिए अपने लिंग को इस प्रकार से पकड़े कि आपके हाथ का ज्यादा से ज्यादा स्पर्श आपके लिंग के साथ हो, यानि की लिंग योनि के अंदर जाने की जगह बना लें। लिंग के ऊपर अगर जरा सी कोई क्रीम या कोई चिकना तरल पदार्थ लगा लिया जाए तो उत्तेजना बनी रहेगी। चिकनाई लगाने से पुरुष को यह महसूस होता है कि वह योनि के अंदर लिंग से कार्य कर रहा है। इस प्रकार इस क्रिया को करने से वीर्य काफी समय बाद बाहर निकलता है।

अपने साथी की सहायता से वीर्यपात पर काबू करने की प्रैक्टिसः-

पहली विधिः-

            इस विधि को करने के लिए सबसे पहले पति पीठ के बल चित लेट जाए। इसके पश्चात पत्नी पति की टांगों के बीच में इस प्रकार से बैठे कि पत्नी की टांगें पुरुष की टांगों के ठीक नीचे हो। इसके बाद पत्नी अपने पति के लिंग को अपने हाथों से हस्तमैथुन करें। जब पति को यह लगने लगे कि उसका वीर्य बाहर निकलने वाला है तो पति को शीघ्र ही अपनी पत्नी को रुकने के लिए कह दे तो उसी समय पत्नी उसके लिंग पर से अपना हाथ हटा ले। इसके कुछ समय के बाद आराम करने पर पुरुष दूबारा से अपनी स्त्री को इस कार्य को करने के लिए कहे तथा इसके बाद पुनः आराम करें। इस कार्य को करने के लिए पंद्रह मिनट से ज्यादा का समय नहीं लगना चाहिए। इस क्रिया को करते समय पुरुष को केवल अपनी कार्य पर ही ध्यान रखना चाहिए। सेक्स करते समय पुरुष को स्त्री के अंगों या सेक्स का बारे में ज्यादा नहीं सोचना चाहिए। इस व्यायाम को करने रहने के बाद पुरुष 10 या 15 मिनट के बाद ही वीर्यपात करता है।

दूसरी विधिः-

            दूसरी विधि को करने के लिए स्त्री को वीर्यपात तक पहुंचने की बजाय पुरुष के लिंग के अंदर तनाव आने तक उसको उत्तेजित करें, इस तरह से करने के बाद स्त्री को पुरुष के ऊपर आ जाना चाहिए। इसके पश्चात स्त्री धीरे-धीरे पुरुष के लिंग को अपने हाथों से पकड़कर योनि के अंदर डाल दें। इसके बाद जब लिंग योनि के अंदर चला जाए तो स्त्री को चाहिए कि वह इस तरह बिना किसी चिंता के बिल्कुल चुप होकर लेटी रहें कि पुरुष को लगे कि उसका लिंग स्त्री की योनि के अंदर ही है। ऐसा करने के बाद जब पुरुष को यह महसूस हो कि उसका वीर्य निकलने वाला है तो उसे स्त्री को अपने ऊपर से हटा देना चाहिए।  पुरुष का तनाव समाप्त हो जाने पर इस प्रकार का कार्य 15 मिनट तक करना चाहिए।

तीसरी विधिः-

            यह विधि दूसरी विधि की ही तरह होती है। इस विधि में स्त्री पुरुष के ऊपर होती है तथा इस विधि में स्त्री की भूमिका बहुत ही जरुरी होती है। इस विधि में पुरुष स्त्री के कूल्हों को पकड़कर आगे-पीछे करता है। जब पुरुष यह महसूस करने लगे कि उसका वीर्य बाहर निकलने ही वाला है तो उसे स्त्री को इस क्रिया को करने के लिए रोक देना चाहिए। कुछ समय आराम करने के बाद दुबारा से इस क्रिया को शुरू कर देना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही इस बात को भी जरुर ध्यान रखें कि पुरुष के अंदर तनाव शीघ्रता से न आए। लिंग के अंदर तनाव धीरे-धीरे से ही आना चाहिए। पुरुष को इस क्रिया को तब तक करना चाहिए जब तक वे दोनों इस कार्य से संतुष्ट नहीं हो जाते हैं। इन तीनों विधियों को सीखने के बाद पुरुष किसी भी व्यायाम के द्वारा से संभोग क्रिया कर सकता है।

कई और अन्य कारणों से भी व्यक्ति के अंदर यौन के दुष्परिणाम निकलते हैं जैसेः-

हार्मोंस की कमी-

            स्त्री-पुरुष के शरीर में पैदा होने वाले हार्मोंस पर सेक्स करने का सीधा संबंध होता है। ये हार्मोंस स्त्री-पुरुष के संभोग करने की ताकत को पूरी तरह से बनाए रखते हैं। अधिकतर यह हार्मोंस सेक्स ग्रंथियों से निकलकर सीधे रक्त से आ मिलते हैं। जब किसी वजह से शरीर के रक्त में हार्मोंस के अंदर कमी हो जाती है तो सेक्स करने की शक्ति कम हो जाती है। हार्मोंस के अंदर कमी आ जाने की कई वजहें होती हैं, जैसे- पीयूषिका ग्रंथि के अंदर कोई रोग का हो जाना या अंडकोष के अंदर किसी रोग का हो जाना।

थायराइड ग्रंथिः-

            थायराइड ग्रंथि का मनुष्य के शरीर में संभोग करने की ताकत को बनाने के लिए एक विशेष भाग होता है। 20 से 25 साल की उम्र तक थायराइड ग्रंथि पूर्ण रूप से शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बहुत ही विशेष भाग निभाती है। थायराइड ग्रंथि का रोग जिन बच्चों में हो जाता है, उन बच्चों का शारीरिक उत्थान सही तरह से नहीं हो पाता है। जिन पुरुषों की थायराइड ग्रंथि युवावस्था में रोगी हो जाती है, उन पुरुषों की संभोग करने की शक्ति भी कमजोर हो जाती है। सेक्स करने और प्रेम करने वाली सभी इच्छाओं का कारण थायराइड ग्रंथि ही होती है। थायराइड ग्रंथि के काम न करने की शक्ति पुरुषों को कमजोर बनाकर उन्हें सुस्त कर देती है। ऐसे पुरुषों का दिमाग कमजोर व सुस्त होकर कोई कार्य न करने के बारे में सोचने लगता है। इससे उनके अंदर चुस्ती व तेजी से काम करने का जोश खत्म हो जाता है। इस प्रकार से ऐसे स्त्री-पुरुष जिनका संभोग करने का मन न करना तथा उनके अंदर किसी प्रकार की कोई कमजोरी पैदा हो गई हो तो उन स्त्री-पुरुषों को किसी अच्छे डाँक्टर से परामर्श लेकर अपनी जांच करा लें ताकि इससे यह पता चल सके कि उन लोगों की संभोग क्रिया करने के प्रति उनकी इच्छा न होने की वजह थायराइड ग्रंथि से निकलने वाले किसी प्रकार की हार्मोंस की कमी तो नहीं है।

डायबिटीज (मधुमेह)-

            शुगर या मधुमेह रोग स्त्री-पुरुष दोनों के ही सेक्स जीवन पर बहुत ही बुरा प्रभाव डालता है। मधुमेह के रोगियों का रोग जैसे-जैसे पुराना होता जाता है उसी तरह से उनके अंदर सेक्स करने की इच्छा व संभोग करने की ताकत कम होती जाती है। मधुमेह रोग के हो जाने की वजह से पुरुषों के अंदर तनाव की कमी, बच्चे उत्पन्न न कर पाने की क्षमता तथा शीघ्रपतन जैसे रोगों की समस्या पैदा हो जाती है। स्त्रियों के अंदर सेक्स न कर पाने की वजह से उनका किसी काम में मन न लगना तथा संभोग क्रिया करते समय तेज पीड़ा होने लगती है। अधिकतर मधुमेह के रोगियों में स्त्री-पुरुष के शरीर की स्नायु की नसों में कई तरह के रोग पैदा हो जाते हैं जिसकी वजह से उनके दिमाग तथा उनके यौन अंगों के बीच संवेदनशील सूचनाओं तथा उन सूचनाओं से सेक्स के प्रति होने वाली क्रियाओं का आपस में मेलजोल बिगड़ जाता है तथा यौन अंगों से संबंध रखने वाली मांसपेशियों पर सेक्स तंत्रिका का काबू करना खत्म हो जाता है।

            इसी वजह से मधुमेह के रोगी की सेक्स करने के बारे में सोचने पर भी उनके अंदर तनाव पैदा नहीं होता है। मधुमेह के रोगी को अधिकतर शरीर की कमजोरी, शरीर के अंदर आलस्य महसूस होना, मन सदा उदासी से भरा रहना तथा जोश की कमी बनी रहती है। ऐसा होने पर अगर मधुमेह के रोगी की संभोग क्रिया करने की इच्छा होती हो तो उसके यौन अंगों में उत्तेजना उत्पन्न नहीं होती है। शूगर से पीड़ित स्त्रियों में भी सेक्स के प्रति लगाव कम होने के साथ-साथ उनके यौन अंगों के अंदर रोग भी हो जाते हैं। इस रोग के होने की वजह से उनके यौन अंगों के अंदर से एक झाग की तरह पीला वीर्य बाहर आने लगता है तथा योनि के अंदर और मूत्रनली के अंदर खुजली व दर्द होने लगता है जिससे संभोग क्रिया करना बहुत ही कठिन कार्य हो जाता है।

दिमागी हालत ठीक न होनाः-

            संभोग क्रिया करने का संबंध पुरुष की मानसिक भावना तथा उसकी काम करने की इच्छा से होता है। अगर किसी पुरुष के दिल में किसी वजह से संभोग के लिए इच्छा न हो तो उस पुरुष की सेक्स ताकत पर बहुत ही गलत प्रभाव हो सकता है। कई बार बचपन में कठोर धार्मिक शिक्षा पढ़ते समय सेक्स को गलत (बुरा) व अनुचित बताया गया, माता-पिता के द्वारा अधिक सख्ती बरतना, आत्मविश्वास की कमी तथा सेक्स के दुष्परिणाम की वजह से संभोग क्रिया करते समय हंसी का पात्र बन जाने के डर की वजह आदि से पुरुष के अंदर सेक्स का मन न करना व सेक्स की कमजोरी पैदा कर देती है। अगर पुरुष अपने दिमाग के अंदर से बैठे हुए डर को बाहर कर दे तो वह सही तरीके से संभोग क्रिया का आनंद पा सकता है।

उच्चरक्तचापः-

            जिन पुरुषों के अंदर उच्च रक्तचाप का रोग होता है उनकी भी संभोग शक्ति कमजोर हो जाती है क्योंकि जिन औषधियों का प्रयोग उच्च रक्तचाप को काबू में करने के लिए किया जाता है उन औषधियों से अधिकतर स्नायु तंत्रिकाएं प्रभाव में आती हैं जिसकी वजह से यौन अंगों के अंदर तनाव की समस्या पैदा हो जाती है।

मोटा होनाः-

            मोटापन की शिकायतें आम बात हो गई है। ज्यादा मोटापा शरीर की चुस्ती को खत्म करके पुरुष के अंदर सुस्ती उत्पन्न कर देता है, जिसकी वजह से शरीर के अंदर अधिक मात्रा में चर्बी जमा हो जाती है, जो उसकी स्नायु नलिकाओं, रक्तवाहिनी तंत्रिकाओं व अन्तःस्त्रावी ग्रंथियों के ऊपर इसके विपरीत प्रभाव डालकर पुरुष की सेक्स करने की क्षमता में कमी पैदा हो जाती है। जिसके कारण वह व्यक्ति संभोग क्रिया करने में कमजोर पड़ जाता है। उन स्त्री-पुरुषों को कोई भी कार्य करते समय जल्दी ही थकान महसूस होने लगती है जिनके शरीर पर मोटापा आ जाता है। मोटापा के होने वाले स्त्री व पुरुष के फेफड़े काफी कमजोर हो जाते हैं जिसके कारण उन्हें श्वांस लेने में बहुत ही अधिक रुकावट पैदा होने लगती है। मोटापा होने की वजह से उनके पैरों की एड़ियां व पैरों के तलुओं के अंदर भी दर्द होने लगता है तथा उन्हें हृदय का रोग हो जाता है। इसलिए जो स्त्री-पुरुष ज्यादा खाने-पीने के आदी हैं या रोज के कार्य न करने की बजाय आराम करना पसंद करते हैं और इस तरह से उनका मोटापा बढ़ रहा हो तो उनको इसके बारे में गहराई के साथ कोई उपाय करके तथा मोटापा को कम करने के आसनों को अपनाकर अपने मोटापे को काबू में कर लें ताकि वह एक सामान्य व्यक्ति की तरह अपने संभोग करने की क्रिया का सही आनंद ले सकें।

संभोग शक्ति को बनाए रखने के लिए तथा मोटापे को दूर करने के लिए कुछ उपचारः-

  • भोजन के अंदर चर्बी बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन- जैसे दूध की निकली हुई मलाई, घी, कचौड़ी, रबड़ी, पूरी, मिठाई तथा अधिक चिकने, तले-भूने पदार्थ व तली-भुनी हुई नमकीन आदि चीजों का सेवन कदापि नहीं करना चाहिए, बल्कि सादा, पचने वाला तथा कम चिकनाई और कम तले-भूने पदार्थो का सेवन भोजन के अंदर करना चाहिए।
  • मोटापे के व्यक्ति को रोजाना ही हल्के आसन करने चाहिए। मोटापे को कम करने के लिए रोजाना प्रातः और सायं के समय में 2-3 किलोमीटर तक घूमना भी एक बहुत ही अच्छा उपचार है। मोटी स्त्रियों व मोटी लड़कियों के लिए रस्सी कूदना एक बहुत ही अच्छा आसन है।
  • मोटापे से ग्रस्त व्यक्तियों को सप्ताह के अंदर एक या दो बार भाप का स्नान करना चाहिए, क्योंकि भाप स्नान को करने से शरीर की चर्बी कम हो जाती है। सप्ताह के अंदर एक बार व्रत करना बहुत ही जरूरी है। व्रत के दिन सिर्फ भोजन के अंदर फलों का सेवन करें तथा हो सके तो नींबू का पानी भी पीएं।
  • मोटे व्यक्ति को दिन के समय सोना नहीं चाहिए तथा कभी भी मेहनत करने से जी नहीं चुराना चाहिए। मोटे व्यक्ति को कभी भी भोजन करने के बाद शीघ्र ही सोना नहीं चाहिए। भोजन करने के बाद सोने से शरीर के अंदर मोटापा बढ़ने लग जाता है।
  • अधिकतर लोगों को संभोग करने के बाद मोटापा बढ़ाने वाले मीठे पदार्थों को खाने की आदत पड़ जाती है, इसलिए इन पदार्थों से दूर ही रहना चाहिए। अगर संभोग करते समय किसी को मीठा खाने की आदत हो तो उसे एक गिलास पानी के अंदर दो चम्मच शहद को मिलाकर पी लेना चाहिए। इस तरह से करने से शरीर के अंदर चर्बी नहीं बढ़ेगी और शरीर के अंदर भी काफी चुस्ती-फूर्ति बनी रहेगी।

हृदय से संबंधित रोगः-

            शरीर के अंदर हृदय एक बहुत ही अहम भाग होता है। अगर किसी पुरुष के पास हृदय नहीं है तो उस पुरुष के कुछ भी नहीं है, क्योंकि हृदय एक ऐसी चीज होती है जिसके अंदर मोम की तरह पिघलने की ताकत होती है तथा पत्थर की ही तरह मजबूत होने की ताकत होती है अर्थात हृदय के अंदर किसी के लिए प्यार व ममता पैदा हो जाती है तो किसी के लिए नफरत भी पैदा हो जाती है। पुरुष के शरीर के अंदर कई तरह के छोटे व बड़े कई अंग होते हैं जो अपना-अपना कार्य सही तरीके से करते है परंतु हृदय एक ऐसा अंग है जो शरीर को रक्तरूपी जीवनी शक्ति प्रदान करता है जिसकी वजह से शरीर के सभी अंग क्रियाशील रहकर पूरे शरीर को चलाते रहते हैं।

            मनुष्य के शरीर के अंदर हृदय की गति व सांस लेने वाली धड़कन बहुत ही नाजुक होती है। जब पुरुष संयमित रहन-सहन, भोजन या अपनी आवश्यकता से अधिक काम कर लेता है तो उस पुरुष के हृदय के अंदर रुकावट पैदा हो जाती है। ऐसा अधिकतर 50 से 55 साल की उम्र के बाद ही होता है लेकिन यह कोई जरुरी नहीं है कि इसी उम्र में ही हो, इस तरह के स्थिति कभी-कभी इस उम्र से पहले या बाद में भी आ सकती है। हृदय के कमजोर हो जाने की वजह से कभी-कभी सेक्स जीवन के अंदर भी कमी आ जाती है क्योंकि हृदय का सेक्स से बहुत ही ज्यादा गहरा रिश्ता है। अगर हृदय के कमजोर होने के बाद भी पुरुष संभोग करने की कोशिश करता है तो उस पुरुष के शरीर के अंदर खून का उतार-चढ़ाव बहुत ही अधिक मात्रा में बढ़ जाता है।

           पुरुष के अंदर जब तक खून का उतार-चढाव नहीं बढ़ेगा तब तक पुरुष के यौन अंगों के अंदर तनाव पैदा नहीं होगा। इसलिए हृदय के रोग से पीड़ित रोगी की संभोग करने की क्रिया इस बात पर निर्भर है कि उस पुरुष का हृदय शरीर के अंदर बढ़ने वाले खून के उतार-चढाव के साथ किस तरह से तालमेल बैठा पाता है। अगर पुरुष का हृदय बहुत ही ज्यादा कमजोर है तो हृदय बढ़े हुए खून के उतार-चढाव को बहुत अधिक सहन नहीं कर पाता है और वह पुरुष संभोग क्रिया करते समय बहुत ही मात्रा में अपने आपको कमजोर महसूस करने लगता है लेकिन इस तरह होने पर मन के अंदर किसी भी तरह की कोई उत्तेजना नहीं लानी चाहिए क्योंकि इस तरह की स्थिति एक स्वस्थ पुरुष के साथ भी हो सकती है। अतः हृदय के रोगी पुरुष को संभोग क्रिया करते समय इन बातों का ध्यान रखना जरुरी हैः-

  • हृदय रोग से पीड़ित रोगी को अपनी स्त्री के साथ संभोग क्रिया करते समय ज्यादा समय नहीं गंवाना चाहिए। जैसे- ज्यादा तेजी से स्त्री के साथ आलिंगन तथा बहुत तेजी के साथ चुम्बन आदि कार्य से बचना चाहिए तथा इसकी जगह पर स्त्री के शरीर को हल्के-हल्के हाथों से स्पर्श करके उसके साथ हंसी-मजाक करके उसको संभोग क्रिया करने के लिए तैयार करें।
  • पुरुष को संभोग क्रिया के समय जल्दबाजी न करते हुए अपने आपको काबू में करके आराम से योनि के अंदर अपने लिंग को डालने के कार्य को पूर्ण करना चाहिए। इस तरह से करने से पुरुष के शरीर की ताकत भी अधिक खराब नहीं होगी और न ही उसकी श्वांस रुकने लगेगी जबकि जल्दी-जल्दी करने से श्वांस भी फूल जाती है और शरीर की ताकत भी बहुत अधिक लगानी पड़ जाती है। संभोग क्रिया करते समय स्ट्रोक भी बहुत ही धीरे-धीरे से लगाने चाहिए तथा वीर्यपात हो जाने के बाद शीघ्र ही स्त्री के शरीर से अलग नहीं होना चाहिए परंतु कुछ समय तक उसी प्रकार से चुपचाप होकर लेटे रहें ताकि शरीर के ऊपर श्वांस न चढ़े और खून का उतार-चढाव भी सही तरीके से हो सके।

यौन से संबंधित रोगः-

            यौन अंगों के अंदर कई बार ऐसे संक्रामक रोग हो जाते हैं जो संभोग क्रिया करते समय स्त्री से पुरुष तथा पुरुष से स्त्री के अंदर आ जाते हैं। इस तरह के रोगों से ग्रस्त व्यक्ति अपने साथ सेक्स संबंध बनाने वाले अन्य व्यक्तियों के अंदर भी यह रोग लगा देते हैं। इन रोगों की कोई मानसिक व शारीरिक वजह नहीं होती है बल्कि इस प्रकार के रोगों के लिए कई तरह के जीवाणु, वायरस या फंगस आदि ही जिम्म्दार होते हैं जो यौन अंगों के अंदर की श्लैष्मिक झिल्ली के अंदर जा करके बढ़ने लग जाते हैं और अपनी क्रियाशीलता से श्लैष्मिक झिल्ली को खत्म करके उन्हें रोगों से ग्रस्त कर देते हैं। इसके कारण सेक्स संबंध करते समय बहुत ही ज्यादा दर्द होता है तथा सेक्स जीवन पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है। ये रोग अधिकतर गोनोरिया, शैनक्रोयड फंफूद या केन्डिडायसिस तथा सिफलिस के रूप में पैदा हो जाते हैं।

गुर्दे का रोगः-

            गुर्दे के किसी रोग में शारीरिक परेशानी हो जाने की वजह से अधिकतर रोगी की संभोग करने की इच्छा शक्ति कम हो जाती है तथा उसके शिश्न (लिंग) के अंदर होने वाले तनाव के अंदर उत्तेजना पैदा नहीं हो पाती है क्योंकि गुर्दों के रोग के अंदर टेस्टोस्टेरान नामक हार्मोंस के विकास में कमी हो जाती है। जिसके कारण सेक्स क्रिया की उत्तेजना को बढ़ाने वाले चिकित्सा की जरुरत पड़ती है।

पेरोनीः-

            अधिकतर 50 व इससे ज्यादा उम्र के लोगों को यह रोग हो जाता है जिसके कारण उनके लिंग पर एक नस सी उभर जाती है। जब लिंग के अंदर तनाव पैदा हो जाता है तो इस रोग के हो जाने की वजह से लिंग के अंदर टेढापन आ जाता है जिसकी वजह से संभोग क्रिया करते समय लिंग के अंदर काफी दर्द महसूस किया जाता है। यह रोग अधिकतर अपने आप ही समाप्त हो जाता है और इसका किसी तरह का कोई इलाज करवाने की आवश्यकता नहीं होती है। परंतु कई बार कुछ कठिन अवस्था में इलाज करवाने की आवश्यकता आ जाती है।

वीर्य के अंदर से खून का निकलनाः-

            कई बार किसी पुरुष के वीर्य के अंदर खून आ जाता है जिसका आधार आमतौर पर ग्रंथियां ही होती हैं। दूसरी वजह इसकी यह होती है कि शुक्राशय के अंदर सूजन तथा पथरी का पैदा होना होता है। इसके विपरीत कभी-कभी ग्रंथि या शुक्राशय के अंदर किसी खून की नली के फटने के कारण भी यह रोग हो जाता है। इसलिए किसी भी समस्या की वजह से ग्रंथि तथा मूत्राशय के अंदर सिकुड़न व फैलाव बढ़ जाता है तो वह वीर्य के अंदर खून के आने की वजह बन जाती है।

पीलिया-

            पीलिया रोग के होने पर व्यक्ति को किसी भी पदार्थ को खाने का मन नहीं करता है। इस रोग के होने पर सेक्स करने की इच्छा शक्ति भी कम हो जाती है। पीलिया रोग के होने पर इसके रोगी को सेक्स संबंध बनाते समय कुछ आवश्यक बातों की तरफ भी खास ध्यान देना चाहिए। यदि रोग छूने से न फैलता है तो संभोग क्रिया करने में कोई दिक्कत नहीं होती है और इस रोग के अंदर विषाणु है तो इस अवस्था में संभोग क्रिया करने पर यह रोग सहवास करने वाले साथी को भी हो सकता है।

            इन बातों के अलावा और भी कई बातों का ध्यान रखना बहुत ही जरुरी हो जाता है, जैसे- मुखमैथुन का प्रयोग न करें। पीलिया के रोगी के थूक, मुंह से टपकने वाली लार, वीर्य व उसके रक्त के अंदर जीवाणु होते हैं- इस बात का जरूर ही ध्यान रखें तथा यौन अंगों व मल के भाग की भी सफाई करना बहुत ही जरूरी होता है। जीवाणुओं से युक्त जिगर के रोग से ही पीलिया रोग बनता है, यह रोग दो तरह का होता है।  

1.   हेपेटाइटिस-ए।

2.   हेपेटाइटिस-बी।

            हेपेटाइटिस-बी के रोग से ग्रस्त रोगी के जब तक कीटाणु नष्ट नहीं हो जाते हैं, तब तक उन लोगों को संभोग क्रिया से दूर ही रहना चाहिए। पीलिया से पीड़ित स्त्री को भी हेपेटाइटिस-बी का टीका लगवाना चाहिए।

गठिया रोगः-

            जोड़ों की सूजन या गठिया को अंग्रेजी के अंदर आर्थराइटिस भी कहते हैं। इस रोग के होने पर पैर के जोड़ों में बड़ी ही तेजी से दर्द होता है, जिसकी वजह से सेक्स क्रिया पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है। उस रोग के रोगी कुछ सरल व्यायामों को अपनाकर संभोग क्रिया का आनंद प्राप्त कर सकते हैं। इस रोग के हो जाने पर रोगी अपने साथी से इस बारे में विचार कर सकता है कि उसके किस अंग को छूने से तनाव व सेक्स करने की इच्छा जागृत होती है तथा किस अंग को हाथ लगाने से या उस अंग को छूने से कष्ट अधिक होता है। इस कार्य को करने के लिए दर्द को कम करने वाली दवा को संभोग करने से पहले व संभोग क्रिया करने का समय दवा लेने के समय के बाद को ही चुन लें।

            इस प्रकार का रोग अधिकतर शाम के समय ही ज्यादा दर्द करता है तथा सुबह के समय कम दर्द होता है जबकि हड्डियों के प्लीहा रोग के अंदर इसका कार्य इसके विपरीत होता है। इसलिए इस समय को ध्यान में रखते हुए संभोग क्रिया करने का वक्त चुन लें। संभोग क्रिया करने से पहले हल्के गर्म पानी से अगर नहा लिया जाए तो सेक्स क्रिया करने में अलग ही आनंद आता है। कई पुरुषों को इस बात की शिकायत रहती है कि सेक्स क्रिया करते समय किस व्यायाम का प्रयोग किया जाए कि संभोग करने के अंदर बहुत ही आनंद प्राप्त हो। पीठ के नीचे के भाग पर दर्द होने की वजह अधिकतर कटिवात या डिस्क लीजन हो सकता है। स्त्री या पुरुष दोनों में से अगर कोई भी प्लीहा का रोगी हो तो, उन्हें पीठ के बल कूल्हों को मोड़कर लेट जाना चाहिए। इस अवस्था में कमर की हड्ड़ियों को बहुत अधिक आराम मिलता है।

ग्रंथिः-

            कई पुरुषों को ग्रंथि का ऑपरेशन कराने की आवश्यकता होती है। इस तरह के ऑपरेशन मूत्राशय के मार्ग के द्वारा किए जाते हैं जिसके द्वारा लिंग (शिश्न) के तनाव की शक्ति के अंदर किसी भी तरह की कोई कमजोरी नहीं होती है अतः पुरुष अपनी ग्रंथि के ऑपरेशन कराने के बाद भी सेक्स क्रिया का आनंद ले सकता है तथा संभोग के अंत समय पर पहुंचने पर भी वह पहले की तरह ही सुख की प्राप्ति कर सकता है। फर्क सिर्फ इतना ही होता है कि उसका वीर्य बाहर नहीं निकलता है बल्कि अंदर ही रह जाता है।

स्त्रियों के अंदर होने वाले स्तन कैंसरः-

            जिन स्त्रियों को स्तन का कैंसर होता है उनका सिर्फ एक ही इलाज है वह है ऑपरेशन, लेकिन अधिकतर स्त्रियों में ऑपरेशन करने के बाद आत्मशक्ति कमजोर पड़ जाती है। ऑपरेशन कराने के बाद कई स्त्रियों के अंदर यह बात समा जाती है कि वे अब पहले कि तरह उतनी सुंदर नहीं दिखाई देंगी है जितनी कि वे ऑपरेशन से पहले थी। इस कारण से वे गहरी उदासी में डूब जाती हैं। उनकी इसी उदासी की वजह से उनके अंदर संभोग करने की क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है।

            ऑपरेशन करने वाले डाँक्टरों को चाहिए कि वह इस रोग के रोगी का ऑपरेशन करने से पहले उनसे होने वाले नतीजों व जोखिम को अच्छी प्रकार से बताकर स्त्री के दिल में इस बात का भरोसा उत्पन्न कर दें कि उसकी सुंदरता में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आएगी। स्तन का ऑपरेशन करके उस स्त्री के स्तनों को दुबारा से सुंदर बनाया जा सकता है। अगर ऑपरेशन करने वाले डाक्टर को लगे कि ऑपरेशन करने के बाद शारीरिक बदलाव होना जरूरी है तो वह स्त्री को प्लास्टिक सर्जरी करने के बारे में परामर्श दे सकता है ताकि स्त्री के मन में स्तनों को लेकर किसी प्रकार का मानसिक कष्ट न हो।

            कई स्त्रियों के गर्भाशय के अंदर किसी वजह से कोई दोष पैदा हो जाते हैं। ऐसी अवस्था के अंदर ऑपरेशन करके गर्भाशय को निकालकर बाहर कर दिया जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि गर्भाशय के बाहर निकल जाने के बाद स्त्रियों के सेक्स जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है। लेकिन हमारा यह मानना है कि सिर्फ गर्भाशय के बाहर निकाल देने से स्त्री के सेक्स जीवन पर इस बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। ऑपरेशन कर देने के बाद भी स्त्रियां पहले की तरह ही संभोग क्रिया का पूरी तरह से लुत्फ उठा सकती हैं। अगर गर्भाशय के साथ-साथ किसी वजह से अंडाशयों को भी बाहर निकालना पड़ जाता है तो इससे सेक्स क्रिया पर जरूर ही प्रभाव पड़ जाता है लेकिन इस अवस्था में स्त्री को आगे जीवन में कभी भी एस्ट्रोजन हार्मोंस देने की आवश्यकता पड़ सकती है।

उपदंशः-

            उपदंश एक छुआ-छूत का रोग है तथा इसे कई तरह के नामों से भी जाना जाता है- सिफलिश, आतशक, फिरंग और गर्मी। इस तरह का रोग अधिकतर सभी देशों मे पाया जाता है। अधिकतर यह रोग उन पुरुषों को ज्यादा होता है जो इस रोग की रोगी स्त्री के साथ सेक्स क्रिया करता है। उपदंश रोग स्त्री तथा पुरुष दोनों को भी हो सकता है। उपदंश रोग रोगी को तो बहुत अधिक दिक्कत करता ही है तथा इसके साथ-साथ ही यह रोग दूसरे खतरनाक रोगों को पैदा करने की वजह भी बन जाता है।

            कई तरह के पागलपन, दिमागी परेशानी, गर्भ का गिरना तथा हृदय और स्नायुविक विकारों के अधिकतर रोगों की असली वजह यही रोग ही है।

            उपदंश एक तरह से छूत का ही रोग होता है परंतु यह अन्य छूत से संबंधित रोगों की ही तरह न तो एकदम तेजी से फैलकर लोगों को मारता है और न ही इसके इतनी जल्द ही लक्षण ही प्रकट होते हैं। उपदंश रोग शरीर के अंदर साफ तथा अस्पष्ट से रहता है और इसके अंदर ही नर्वस सिस्टम को कमजोर करता रहता है। शर्म की वजह से अधिकतर पुरुष इस रोग के बारे में किसी से भी कोई बात नहीं करते हैं और न ही इसका कोई इलाज ही करवाते हैं। यह रोग अंदर ही अंदर फैलकर एक भयानक रूप बना लेता है और शरीर के अंदर से बाहर निकल जाता है।

            उपदंश रोग के अंदर बहुत ही बारीक से कीटाणु छिपे होते हैं, जिनको स्पाइरोकीट ट्रैपोनिमा के नाम से जाना जाता है। ये जीवाणु बहुत ही पतले तथा घुमावदार किस्म के होते हैं परंतु ये इतने छोटे होते हैं कि इन्हें किसी बहुत ही शक्तिशाली माइक्रोस्कोप के द्वारा ही देखा जा सकता है। ये कीटाणु इतने बारीक होते हैं कि अगर ऐसे एक हजार कीटाणुओं को लंबाई में मिलाकर जोड़ दिया जाए तो इन कीटाणुओं की लंबाई एक सेंटीमीटर से भी कम होगी। इन कीटाणुओं को देखने पर पता चलता है कि इनके दोनों तरफ के सिरे नुकीले होते हैं और इनके शरीर पर बहुत ही छोटे-छोटे बाल होते हैं। ये कीटाणु इतने नाजुक होते हैं कि अगर इन्हें 51 सेंटीग्रेट की गर्मी के अंदर रखा जाए तो ये उस गर्मी के ताप से मर जाएंगे। साबुन और पानी या डेटोल जैसे एंटीसेप्टिक का इस्तेमाल करने से ये कीटाणु शीघ्र ही मर जाते हैं।

            मूत्र, मल एवं थूक तथा गीले कपड़े जैसे तौलिया या अंडरवियर आदि गीले पदार्थों के अंदर कीटाणु होने पर केवल 12 घंटों तक ही जिंदा रह सकते हैं तथा कोई पुरुष इन कपड़ों का इस्तेमाल कर ले तो उस पुरुष को भी यह रोग हो जाता है। कई बार झूठे बर्तनों की वजह से भी यह रोग फैल जाता है।

            अधिकतर इस प्रकार का रोग उपदंश के रोग से पीड़ित रोगी के साथ सेक्स क्रिया करने से होता है। यह रोग किसी अन्य रोग के होने की वजह से भी हो जाता है। सेक्स क्रिया करते समय स्त्री तथा पुरुष एक दूसरे के काफी नजदीक होते हैं तथा होठों का स्पर्श, आलिंगन तथा स्पर्श करते हैं तो इस तरह के करने से उन्हें छूत का रोग लग  जाता है। यह छुआ-छूत का रोग उन पुरुषों को हो जाता है जो पुरुष वेश्यावृत्ति करने तथा गलत कार्य करने के आदि होते हैं। उपदंश के कीटाणुओं को एक दूसरे के सम्पर्क में आने के लिए एक जरा सा बारीक जख्म ही काफी होता है। ये जीवाणु इतने अधिक बारीक होते हैं कि जब ये घावों के अंदर जाते हैं तो ये जीवाणु बिल्कुल भी दिखाई नहीं देते हैं। इसी वजह से अगर कोई स्वस्थ व्यक्ति उपदंश के रोग से पीड़ित रोगी के अंदर के कपड़ों को पहन लेता है तो उस व्यक्ति को भी यह रोग हो जाता है।

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