सेक्स के संबंध में जानकारी


सेक्स के संबंध में जानकारी 


सेक्स के अंग और उसकी जानकारी :

संभोग क्रिया करने के लिए आसन-

             संभोग क्रिया के दौरान संभोग करने के आसनों के बारे में जानना बहुत जरूरी है क्योंकि बिना जानकारी के रोजाना एक ही तरह से सेक्स संबंध बनाना स्त्री और पुरुष दोनों के ही लिए नीरस सा हो जाता है। रोजाना सेक्स के आसनों को बदल-बदल कर करने से संभोग क्रिया में नवीनता आती है और रुचि भी बनी रहती है। संभोग क्रिया के दौरान अगर स्त्री-पुरुष के ऊपर रहे तो इससे पुरुष जल्दी स्खलित नहीं होता है। ऐसे ही अगर पुरुष ज्यादा थका हुआ हो तो एक-दूसरे के सामने लेटकर संभोग करने का आसन अच्छा रहता है। स्त्री की जांघों को पूरी तरह से फैलाकर उसके नितंबों के नीचे तकिया लगाकर संभोग करने से पुरुष का लिंग योनि में काफी गहराई तक पहुंच जाता है। लिंग के योनि में प्रवेश करने के बाद अगर स्त्री अपनी टांगों को सिकोड़ लेती है तो स्त्री-पुरुष दोनों की जननेंद्रियों को ज्यादा उत्तेजना ज्यादा प्राप्त होती है। ज्यादातर स्त्रियों को पुरुष के ऊपर लेटकर संभोग करने से ज्यादा यौनसुख मिलता है क्योंकि इस आसन में लिंग का स्त्री की योनि के साथ सीधा संपर्क रहता है। इस आसन में स्त्री को हिलने-डुलने की भी पूरी आजादी रहती है और उत्तेजना भी बहुत ज्यादा मिलती है। स्त्री को अगर गर्भधारण कराना हो तो उसके नितंबों के नीचे तकिया लगाकर घुटनों को वक्षस्थल स्थिति में रखना चाहिए ताकि वीर्य ज्यादा से ज्यादा से स्त्री के गर्भाशय में जा सके। अगर स्त्री गर्भवती हो तो अगल-बगल लेटकर या गुदामैथुन वाला या फिर पुरुष के ऊपर स्त्री के लेटने वाला आसन ज्यादा अच्छा रहता है।  

पहली बार सेक्स संबंध बनाते समय घबराहट होना- 

             बहुत से पुरुष ऐसे होते हैं जिनकी शादी होने वाली होती है लेकिन वह इस बात से चिंतित रहते हैं कि हमें सेक्स संबंध बनाने के बारे में जानकारी नहीं है, मैं कहीं पत्नी के सामने पहली रात में ही फेल न हो जाऊं। ऐसे लोगों को सबसे पहले स्त्री के शरीर की रचना के बारे में जानकारी होना जरूरी है। स्त्री की शारीरिक रचना के अनुसार उसके शरीर में तीन द्वार होते हैं- योनिद्वार, गुदाद्वार, मूत्रमार्ग। स्त्री का मूत्रमार्ग इतना तंग होता है कि उसके अंदर छोटी उंगली भी घुस नहीं सकती है। उसका गुदाद्वार पीछे की तरफ तथा नीचे होता है। इन दोनों के बीच में सिर्फ एक ही जगह बचती है और वह है योनिद्वार। जिन पुरुषों को सेक्स संबंधों का नाम सुनते ही घबराहट होने लगती है उन्हें सेक्स करते समय स्त्री की योनि को ढूंढने की कोशिश न करके अपना पूरा ध्यान संभोग करने से पहले होने वाली काम-क्रीड़ाओं पर लगाना चाहिए। लिंग के उत्तेजित होने पर बाकी का सारा काम पत्नी के ऊपर छोड़ देना चाहिए क्योंकि स्त्री जानती है कि लिंग को कहां पर प्रवेश कराना है।

हस्तमैथुन करने से लिंग का टेढ़ा-मेढ़ा होना- 

           बहुत से लोग सोचते हैं कि उनकी हस्तमैथुन करने की आदत से उनका लिंग टेढ़ा-मेढ़ा हो सकता है इसी कारण वह शादी करने से भी डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि शादी के बाद वह अपनी पत्नी के साथ संभोग करने में असफल साबित होंगे। लिंग जब उत्तेजित होता है तो उस समय वह बिल्कुल सीधा नहीं रहता है। शिश्न का दाईं या बाईं तरफ झुकना साधारण बात है। इस टेढ़ेपन के कारण संभोग करते समय लिंग के योनि में प्रवेश करने में कोई दिक्कत नहीं होती है।

 किन्नरों (हिजड़ा) में सेक्स की इच्छा होना- 

             अक्सर किन्नरों को देखकर बहुत से लोगों के मन में सवाल पैदा होता है कि क्या उनके मन में कभी सेक्स करने की इच्छा नहीं होती है। ऐसे लोगों को इस सवाल का जवाब देना जरूरी है कि वह भी साधारण पुरुष या स्त्री की तरह ही साधारण जिंदगी व्यतीत करें। उनकी सेक्स क्रियाएं सामान्य पुरुष की ही तरह होती हैं लेकिन उनको स्त्री के रूप में अपनी पहचान बनाना ज्यादा स्वाभाविक लगता है। ज्यादातर किन्नरों का यौनांग बधिया किया हुआ होता है और वह समलिंगी होते हैं। जिन किन्नरों का बधिया नहीं किया होता वह द्विलिंगी भी होते हैं।

वीर्य क्या है-

             कोई भी पुरुष जब किसी स्त्री के साथ संभोग करता है तो उस समय उसके लिंग से एक एक द्रव सा निकलता है इसे ही वीर्य कहते हैं। शुक्राणु इस वीर्य का मुख्य तत्त्व होते हैं। बाकी द्रव पुरुष की अलग-अलग यौन ग्रंथियों का रस होता है। लिंग से बाहर निकलने के समय सारे द्रव एक साथ मिलकर वीर्य का रूप धारण कर लेते हैं।

मासिकधर्म के दौरान स्त्रियों का स्नान न करना-

             अक्सर देखा जाता है कि स्त्रियां मासिकधर्म आने के दौरान स्नान नहीं करती है इसका कोई उचित कारण नहीं होता है। असल में इस समय स्त्री के शरीर की सफाई खासकर योनि प्रदेश की जरूरी होती है। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि मासिकधर्म आने के दौरान स्त्रियों के शरीर में थकान ज्यादा रहती है, उनका पूरा शरीर पूरा दिन टूटा-टूटा सा रहता है और उनमें किसी भी काम को करने की इच्छा नहीं रहती है। इसी कारण से स्त्रियों में स्नान करने की इच्छा भी समाप्त हो जाती है। वैसे मासिकधर्म के दौरान योनि प्रदेश की सफाई जरूरी होती है और इसीलिए इस समय स्नान करना बहुत जरूरी है लेकिन ज्यादा ठंडे पानी से स्नान नहीं करना चाहिए।

कुमारीच्छद (योनि की झिल्ली)-

             स्त्री का योनि मुख भीतरी भगोष्ठों से निचले सिरे पर होता है। कुमारीच्छद इसी योनि मुख को ढके रहती है। जिन लड़कियों की शादी नहीं होती है उनका योनि मुख पूरी तरह से ढका नहीं रहता है। इस झिल्ली में इतना रास्ता होता है कि उसमें छोटी उंगली प्रवेश कर सकती है लेकिन कुछ स्त्रियों में यह छेद बहुत छोटा होता है। इसी छेद में से होकर मासिकधर्म के दिनों में रक्त निकलता है। बहुत से लोगों का मानना है कि यह झिल्ली योनि के अन्दर के पर्दे के तरह तनी रहती है। इस झिल्ली के अनुसार यह तय किया जाता है कि लड़की ने पहले किसी के साथ शारीरिक संबंध स्थापित नहीं किए है। काफी लोगों के अनुसार यह झिल्ली शादी के बाद पहली बार पुरुष के साथ संभोग करते लिंग प्रवेश के कारण टूट जाती है। जब यह झिल्ली टूटती है तो स्त्री को हल्के से दर्द के साथ खून निकलता है। बहुत सी स्त्रियों की यह झिल्ली काफी मोटी होती है जो काफी दर्द के साथ फटती है। काफी लोगों का यह मानना होता है कि जिन स्त्रियों के पहली बार संभोग करते समय रक्त नहीं निकलता है वह पहले किसी और के साथ शारीरिक संबंध बना चुकी होती हैं लेकिन यह बात पूरी तरह से सच नहीं हो सकती है क्योंकि कुमारीच्छद (योनि की झिल्ली) किसी दुर्घटना, खेलते-कूदते समय, साईकिल चलाने आदि से भी फट सकती है।

स्खलन (वीर्यपात) के बाद शुक्राणु का डिंब तक पंहुचना-

             स्त्रियों के गर्भाशय और फैलोपियन टयूब की लंबाई 3 और 5 इंच होती है। इस प्रकार कुल लंबाई 8 इंच होती है। शुक्राणु 1 इंच का फासला 8 मिनट में तय करता है। इस प्रकार से शुक्राणु को 8 इंच का फासला तय करने में लगभग 1 घंटा लग जाता है। इसे किसी प्रकार का नियम नहीं कहा जा सकता। यह सब शुक्राणुओं की गति पर निर्भर करता है इसलिए 1 घंटे से कम का समय भी लग सकता है और ज्यादा भी।

लिंग का छोटा होना-

             वहुत से पुरुष अपने लिंग के आकार को लेकर अक्सर दुविधा में रहते हैं वे सोचते हैं कि मेरा लिंग छोटा है इसलिए मैं शादी के बाद अपनी पत्नी को पूरी तरह से यौन संतुष्टि नहीं दे पाऊंगा। ऐसे लोगों को यह बात बताना जरूरी है कि संभोग करने के लिए लिंग के छोटे-बड़े आकार का कोई फर्क नहीं पड़ता है। स्त्री को संभोग करते समय संतुष्ट करने के लिए जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है वह है सेक्स के बारे में पूरी तरह की जानकारी होना।

कामोत्तर क्रीड़ा-

             बहुत से लोग जब अपने सहभागी के साथ संभोग क्रिया करते हैं तो इस क्रिया के समाप्त होने के तुरंत बाद ही एक-दूसरे से अलग होकर लेट जाते है लेकिन कई लोग ऐसे भी होते हैं जो इस क्रिया की समाप्ति के बाद एक-दूसरे से चिपके ही रहते हैं, एक-दूसरे के जिस्मों को प्यार से गुदगुदाते रहते हैं यही होती है कामोत्तर क्रीड़ा। वात्स्यायन ऋषि के अनुसार कामोत्तर क्रीड़ा संभोग करने के पहले की गई क्रीड़ाओं की ही तरह महत्वपूर्ण होती है। बहुत सी स्त्रियां संभोग के दौरान आर्गेज्म की चिंता नहीं करती लेकिन वह कहती है कि संभोग क्रिया की समाप्ति के बाद अगर उनके पति उन्हें अपने शरीर से अलग नहीं करते तो उन्हें आर्गेज्म से भी अच्छा लगता है इसी लिए संभोग के दौरान संभोग से पहले की गई काम क्रीड़ा की तरह कामोत्तर क्रीड़ा भी जरूरी है।

 शादी के 2-3 साल तक संतान पैदा करना या न करना-

             कोई भी लड़की जब युवावस्था में प्रवेश करती है तभी से उसका मासिकधर्म शुरू हो जाता है जो इस बात का सूचक होता है कि लड़की गर्भधारण करने के लायक हो गई है लेकिन असल में गर्भधारण करने की क्षमता को विकसित होने में कुछ समय लग जाता है इसलिए 20-21 साल की उम्र से लेकर 30 साल की उम्र तक का समय स्त्री के गर्भधारण करने के लिए सही माना जाता है। साधारणतः स्त्रियों में 40 साल की उम्र तक संतान पैदा करने की क्षमता रहती है। हमारे देश में शादी की उम्र 18 साल तय की गई है इसलिए शादी करने के 3-4 साल बाद तक शादी करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए। इसके बाद दूसरे बच्चे के बारे में जब सोचना हो तो पहले बच्चे और दूसरे बच्चे के बीच में 4-5 साल का अंतर होना चाहिए। अगर किसी लड़की की शादी 30 साल की उम्र पार करने के बाद होती है तो उसे पहला बच्चा पैदा करने में देरी नहीं करना चाहिए।

संभोग क्रिया के दौरान लिंग में जलन होना-

             बहुत से पुरुषों को संभोग करते समय लिंग में जलन सी महसूस होती है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संभोग करते समय स्त्री की योनि खुश्क होती है। इस जलन से बचने के लिए लिंग को स्त्री की योनि में डालने से पहले कोई भी चिकना पदार्थ जैसे क्रीम, वैसलीन या तेल आदि लगा देना चाहिए।

स्त्री को चरम सुख पंहुचाना-

             संभोग क्रिया के समय स्त्री को चरम सुख प्राप्त होते समय उसके स्नायुओं में बहुत ज्यादा तनाव पैदा हो जाता है। इसके बाद यह तनाव एक विस्फोट के रूप में फट पड़ता है जिससे स्त्री बेहोशी जैसी अवस्था में भी पंहुच सकती है। चरमसुख निर्भर करता है स्वास्थ्य, क्लान्ति और रागात्मक सघनता पर। संभोग करते समय स्त्री को मिलने वाला चरमसुख जहां उसे एक अजीब सा आनंद देता है वहीं किसी-किसी को परेशानी भी पंहुचाता है। चरमसुख के समय जरूरी नहीं है कि स्त्री स्खलित हो ही लेकिन तनाव और उसकी आनन्दाभूति में परिणति जरूरी है।

व्यक्ति का कम या ज्यादा कामुक होना-

             हर इंसान के अंदर काम भावना लगभग एक ही जैसी रहती है फर्क सिर्फ इतना है कि कोई इसे सही तरह से भोगता है या नहीं। जो व्यक्ति सेक्स की तकनीक को ज्यादा से ज्यादा जान लेता है उसे ही अधिक कामुक व्यक्ति मान लिया जाता है और जो इसकी तकनीकों से वंचित रह जाता है उसे मान लिया जाता है कि उसके अंदर कामुकता नहीं है।

बच्चे के जन्म के बाद स्त्री के प्रजनन अंगों का अपनी सामान्य अवस्था में आना-

             अगर किसी स्त्री का बच्चा नार्मल तरीके से होता है तो साधारणतः 6 से 8 सप्ताह के बाद स्त्री के प्रजनन अंग अपनी सामान्य अवस्था में आ जाते हैं।

वीर्य में शुक्राणुओं की कमी होना-

             अगर किसी पुरुष के वीर्य में शुक्राणुओं की कमी हो जाती है तो सबसे पहले उसकी कमी होने के कारणों का पता करना चाहिए। यदि भोजन में पोषक तत्वों की कमी, ग्रंथियों में किसी तरह का विकार या किसी प्रकार के इंफैक्शन के कारण वीर्य में शुक्राणुओं की कमी हो जाती है तो उसे विटामिन, हार्मोन्स या दूसरी ताकतवर औषधियों के द्वारा दूर किया जा सकता है लेकिन अंडकोषों को किसी कारण से ज्यादा नुकसान हुआ हो तो उसका इलाज असंभव है।

बच्चे के जन्म के बाद कितने समय के बाद बच्चा होना-

             कोई भी स्त्री जैसे ही गर्भधारण करती है तभी उसका मासिकस्राव रुक जाता है और गर्भ से अंडे का बाहर निकलना बंद हो जाता है। बच्चे को जन्म देने के बाद जब ये क्रियाएं दुबारा शुरू हो जाती है तो उसके बाद स्त्री को दुबारा गर्भ ठहर सकता है। साधारणतः बच्चे के जन्म के लगभग 6 महीने के बाद स्त्री का मासिकधर्म दुबारा शुरू हो जाता है लेकिन इसके कभी-कभी देर से या जल्दी होने की संभावना भी रहती है। यह बात भी जरूरी नहीं है कि मासिकधर्म के जारी होते ही गर्भाशय से अंडा पककर अलग होने लगेगा इसलिए ऐसे समय खासतौर पर सावधानी रखने की जरूरत होती है। कुछ लोग इसे संभोग करने के लिए सुरक्षित समय मानते हैं और गर्भ को रोकने वाले साधनों का उपयोग नहीं करते हैं। ऐसा करना कभी-कभी गलत भी हो सकता है और न चाहते हुए भी स्त्री गर्भवती हो जाती है। उस समय स्त्री और पुरुष दोनों के सामने दो ही स्थितियां बाकी रह जाती है या तो बच्चे को जन्म दे दिया जाए या फिर स्त्री का गर्भपात करा दिया जाए। यह दोनों स्थितियां स्त्री के लिए हानिकारक साबित हो सकती हैं। इनसे बचने के लिए इस समय को संभोग करने के लिए सुरक्षित समय मानने की बजाय गर्भ निरोधकों का इस्तेमाल किया जाए तो ही अच्छा है।

मासिकस्राव का दुबारा आना-

             हर स्त्री का मासिकस्राव लगभग 28 दिन के बाद आता है लेकिन इसके आने की तारीख ऊपर-नीचे होती रहती है। कभी स्त्री का मासिकस्राव 26 दिन में आ जाता है और किसी का 30 दिन में आता है। किसी-किसी स्त्री का मासिकस्राव तो 32 दिन में भी आता है। इसलिए कहा जा सकता है कि मासिकस्राव आने का चक्र 26 से 32 दिन का होता है।

पुरुष के लिए गर्भ रोकने के साधन-

             अगर कोई पुरुष चाहता है कि वह स्त्री के साथ संभोग करे और स्त्री को गर्भ न ठहरे तो इसके लिए पहला उपाय उसके सामने यह है कि वह जिस समय स्त्री के साथ संभोग करे उस समय उसका वीर्य स्खलन होने को हो अर्थात जब वह संभोग की चरम सीमा पर पंहुचने वाला हो तो उससे कुछ क्षण पहले ही उसको अपने लिंग को स्त्री की योनि से बाहर निकाल देना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि संभोग के समय पुरुष को अपने वीर्य को स्त्री की योनि में नहीं जाने देना चाहिए। गर्भ को रोकने के लिए जो दूसरा उपाय सामने आता है और उसे ज्यादातर हर व्यक्ति जानता है वह है कंडोम का उपयोग करना। संभोग करते समय कंडोम का उपयोग करने से स्त्री को गर्भ ठहरने का डर नहीं रहता है।

स्त्रियों के लिए गर्भ रोकने के साधन-

             जो स्त्रियां जल्दी मां नहीं बनना चाहती उनके लिए आज के समय में काफी साधन बाजार में आ गए हैं जैसे गर्भनिरोधक गोलियां, कापर टी, जेली और डूश आदि।

पुरुषों में यौन दुर्बलता-

             पुरुषों में यौन दुर्बलता 2 प्रकार की पाई जाती है पहली शारीरिक और दूसरी मानसिक। कभी-कभी यह दुर्बलता वंशानुगत भी मानी जाती है। अगर किसी व्यक्ति को कोई दिमागी परेशानी होती है या उसे किसी प्रकार का तनाव होता है तो उसके कारण उसकी संभोग में रुचि समाप्त हो जाती है इसे ही मानसिक यौन दुर्बलता कहा जाता है। शारीरिक यौन दुर्बलता हार्मोंस की कमी, यौनांगों की बनावट में विकार और शरीर में कमजोरी आदि कारणों से हो जाती है। कई व्यक्तियों को लंबे समय से चले आ रहे किसी रोग के कारण भी यौन दु्र्बलता आ जाती है। आज के समय में मधुमेह रोग (डायबिटीज) यौन दुर्बलता का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। मधुमेह रोग (डायबिटीज) के ज्यादा बढ़ जाने के कारण व्यक्ति में नपुंसकता भी आ सकती है। इनके अलावा जिन व्यक्तियों का वजन ज्यादा होता है या बहुत कम होता है उन्हें भी यौन दुर्बलता हो सकती है।

समलैंगिकता-

             दूसरे लिंग की और आकर्षित होना तो मानव का स्वभाव माना जाता है जैसे स्त्री पुरुष की ओर आकर्षित होती है और पुरुष स्त्री की और आकर्षित होती है और एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बना लेते हैं। लेकिन कई लोग समलैंगिक होते हैं अर्थात वह अपने जैसे सेक्स वाले लोगों के साथ ही शारीरिक संबंध बनाना पसंद करते हैं जैसे स्त्री, स्त्री के साथ संबंध बनाना पसंद करती है और पुरुष, पुरुष के साथ संबंध बनाना पसंद करता है। इस प्रकार की संभोग क्रिया को अप्राकृतिक मैथुन के रूप में देखा जाता है। यह स्थिति किशोरावस्था से शुरू होकर युवावस्था तक बनी रहती है। अक्सर स्कूल-कालेज में या दूसरे किसी मौके पर एक ही जगह पर बहुत से पुरुष ही पुरुष या बहुत सी स्त्रियां ही स्त्रियां इकट्ठी होती हैं तो ऐसे समय में आपसी छेड़छाड़ जब शारीरिक छेड़छाड़ की तरफ बढ़ती है और धीरे-धीरे उनमें समलैंगिकता का दौर शुरु हो जाता है। वैसे तो समलैंगिकता पुरुषों और स्त्रियों दोनों में ही पाई जाती है लेकिन फिर भी पुरुषों में यह समलैंगिकता ज्यादा पाई जाती है।

 लंबे समय तक संभोग न करने से होने वाली हानियां-

             बहुत से लोगों का कहना है कि कोई व्यक्ति अगर कुछ समय तक सेक्स क्रिया से दूर रहे तो उसके वीर्य से निकलने वाले शुक्राणु ज्यादा शक्तिशाली होते हैं लेकिन अगर किसी व्यक्ति ने बहुत ही लंबे समय तक सेक्स क्रिया न की हो तो ऐसे व्यक्तियों के शुक्राणु उन व्यक्तियों की तुलना में काफी कमजोर होते हैं जो कुछ-कुछ समय के बाद सेक्स क्रिया करते रहते हैं।

स्त्री को गर्भवती होने का पता लगना-

             किसी भी स्त्री को जैसे ही गर्भ ठहरता है इसका पता उसे गर्भ ठहरने के तुरंत बाद ही पता न चलकर कुछ समय के बाद प्रकट होने वाले लक्षणों के आधार पर चलता है जिसमें पहला लक्षण आता है स्त्री का मासिकधर्म बंद हो जाना लेकिन इसे स्त्री को गर्भ ठहरने का पक्का कारण नहीं माना जा सकता क्योंकि मासिकधर्म रुकने के और भी कई कारण हो सकते हैं। इसके अलावा मासिकधर्म के रुकने के लगभग 3 हफ्ते के बाद अगर स्त्री को उल्टियां होने लगे, चक्कर आने लगे, जी मिचलाने लगे तो हो सकता है कि स्त्री गर्भवती है। स्त्री के गर्भवती होने पर उसको बार-बार पेशाब आने लगता है, 3 महीने के बाद स्त्री का पेट बढ़ने लगता है और पांचवें महीने के बाद तो गर्भ में बच्चा हलचल सी करने लगता है।

स्त्री में बच्चा पैदा करने की क्षमता होना-

             कोई भी स्त्री अपने मासिकधर्म के शुरु होने से लेकर (12 से 15 साल) रजोनिवृति अर्थात मासिकधर्म के बंद होने तक (45 से 50 साल) बच्चे को जन्म देने की क्षमता रखती है।

 पुरुषों में बच्चा पैदा करने की क्षमता होना-

             पुरुषों के अंदर वीर्य में शुक्राणुओं के पैदा होते है स्त्री में गर्भ ठहराने की क्षमता आ जाती है और जब तक उसका वीर्य स्खलन होता रहता है तब तक यह क्षमता भी बनी रहती है। पुरुषों में आमतौर पर 13 से 16 साल की उम्र में वीर्य स्खलन शुरु हो जाता है। पुरुषों में स्त्री से ज्यादा उम्र तक बच्चे को जन्म देने की क्षमता बनी रहती है। लगभग 50 साल के बाद पुरुष की यह क्षमता कम होने लगती है।

नसबंदी के बाद कमजोरी होना-

             बहुत से लोगों का यह मानना होता है कि नसबंदी के बाद नसबंदी करवाने वाले के अंदर शारीरिक, मानसिक और यौन कमजोरी आ जाती है लेकिन यह सिर्फ लोगों का एक वहम है। नसबंदी एक छोटा-सा आपरेशन है जो उन लोगों का किया जाता है जो लोग 1 या 2 बच्चों के बाद बच्चा नहीं चाहते हैं और इसका नसबंदी करवाने वाले के ऊपर किसी तरह का बुरा असर नहीं पड़ता है। नसबंदी करवाने से संभोग क्रिया के समय किसी भी प्रकार के गर्भ को रोकने वाले साधनों का इस्तेमाल की जरुरत नहीं पड़ती है और स्त्री बिना किसी डर के संभोग कर सकती है। 

बुढ़ापे में कम उम्र की लड़की से संबंध बनाना-

             कहते हैं कि सेक्स करने के लिए शरीर का जवान होना जरूरी नहीं है बल्कि मन का जवान होना जरूरी है। बहुत से बूढ़े लोगों का यह कहना होता है कि बुढ़ापे में कम उम्र की लड़की के साथ सेक्स करने से सेक्स पावर बढ़ता है लेकिन यह सिर्फ एक तरह का वहम है। बूढ़े लोगों का कम उम्र की लड़की की तरफ ज्यादा आकर्षित होने का कारण यह होता है कि इस उम्र में उनकी पत्नी का शारीरिक आकर्षण समाप्त हो जाता है जिसके कारण अपनी पत्नी को देखकर उनमें कामोत्तेजना नहीं होती है। इसके विपरीत कम उम्र की लड़की में शारीरिक आकर्षण ज्यादा होता है और उसकी कोमल त्वचा और शरीर की महक सेक्स पावर को बढा़ती है जिससे पुरुष स्वयं को ज्यादा पावरफुल महसूस करता है लेकिन ऐसी लड़कियों के साथ संबंध बनाने का सेक्स पावर बढ़ने पर कोई असर नहीं पड़ता।

शादी से पहले किसी और स्त्री से सेक्स संबंधों की जानकारी लेना-

             बहुत से युवक जिनकी शादी होने वाली होती है, के मन में यह बात घूमती रहती है कि मुझे सेक्स के बारे में किसी प्रकार की जानकारी नहीं है तो मैं पहली रात को अपनी पत्नी के साथ संबंध कैसे बनाऊंगा। इसके लिए वह सोचते हैं कि मुझे पहले किसी और स्त्री के साथ संबंध बनाकर सेक्स के बारे में जानकारी ले लेनी चाहिए। लेकिन यह सोच गलत है क्योंकि इन संबंधों से सेक्स के बारे में जानकारी होने की बजाय नुकसान ज्यादा होता है। कोई भी पुरुष जब पहली बार किसी दूसरी स्त्री के साथ संबंध बनाता है तो उस समय वह काफी डरा रहता है जिसके कारण वह सही तरह से सेक्स क्रिया नहीं कर पाता है और किसी प्रकार का आनंद भी प्राप्त नहीं कर पाता है। कभी-कभी तो इस जल्दबाजी में वह शीघ्रपतन का शिकार हो जाता है और यहीं से उसके मन में यह बात घर कर जाती है कि वह सेक्स करने के लिए पूरी तरह लायक नहीं है।

जितना अधिक सेक्स उतना ही अधिक आनंद-

             किसी भी पत्नी और पति के बीच में अगर बहुत लंबे समय तक सेक्स संबंध न बने तो वह दोनों ही कई तरह के खतरनाक रोगों की चपेट में आ सकते हैं लेकिन इनसे बचने के लिए यह भी नहीं किया जा सकता कि हर समय सेक्स में ही लगा रहा जाए क्योंकि यह भी एक तरह से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है। ज्यादा सेक्स करने से सेक्स में मिलने वाले आनंद में निरंतर कमी आती रहती है और यह एक काम पूरा करने वाली क्रिया बनकर रह जाती है। इसलिए सेक्स करने के बारे में जो सही बात सामने आती है वे यह है कि पहले तो कुछ दिन तक लगातार सेक्स कर लिया जाए उसके बाद अगले कुछ दिनों तक सेक्स न किया जाए क्योंकि कुछ दिनों तक रुककर अगर सेक्स किया जाता है तो उसमें मिलने वाला आनंद बढ़ जाता है।

शिश्नोत्थान (लिंग का उत्तेजित होना) के बिना सेक्स क्रिया का आनंद उठाना-

             जिन लोगों को सेक्स के बारे में किसी तरह की जानकारी नहीं होती उनके अनुसार सेक्स सिर्फ यह होता है कि पुरुष अपने लिंग को स्त्री की योनि में डालकर घर्षण करें और स्खलन होते ही लिंग को बाहर निकाल लें। सेक्स का संबंध स्त्री और पुरुष दोनों के ही शरीर और दिमाग से होता है। अगर पुरुष लिंग के उत्तेजित हुए बिना ही सेक्स का आनंद लेना चाहता है तो उसे प्रेमालाप करना चाहिए।

संभोग और मोटापे में संबंध-

             वैसे तो साधारण तौर पर सैक्स और मोटापे का कोई संबंध नहीं कहा जा सकता है लेकिन एक शब्द है भूख जो दोनों ही के लिए प्रयोग किया जा सकता है। ज्यादा खाना या मांसाहारी खाना मोटापा पैदा करता है, हार्मोंसों में गड़बड़ी आ जाने के कारण भी मोटापा बढ़ जाता है। मोटापे के बढ़ने से रोजमर्रा के कामों में भी रुकावट आ सकती है क्योंकि इसके काऱण सुस्ती, आलसपन या चलने-फिरने में परेशानी पैदा हो सकती है। जिससे शरीर की मांसपेशियां ढीली पड़ जाती है सेक्स करने का आनंद कम हो जाता है।

काम उत्तेजना का अधिक होना-

             किसी भी पुरुष के अंदर जब काम उत्तेजना तेज होती है तो उसे आमतौर पर मर्दानगी का नाम दिया जाता है। लेकिन अगर यही स्थिति अगर स्त्री में हो तो उसे गलत स्त्री कहा जाने लगता है। दिमागी तौर पर बीमार व्यक्ति (अर्धविक्षिप्त) जैसे किसी काम के पीछे पड़ जाता है उसी प्रकार से वह सेक्स के प्रति भी पागल हो जाता है। बहुत के मामलों में दिमाग में सूजन, मिर्गी का दौरा पड़ने आदि के कारण भी काम उत्तेजना तेज हो सकती है।

संभोग क्रिया में लगने वाला समय-

            सेक्स के बारे में पूरी तरह से जानकारी न होने के कारण लोगों के मन में सेक्स से संबंधित कोई न कोई सवाल घूमता रहता है इसमें से एक सवाल जो सामने आता है वह यह है कि संभोग क्रिया करने में कितना समय लगना चाहिए। किसी भी साधारण पुरुष का लिंग लगभग 2 से 10  मिनट तक उत्तेजित रह सकता है। अगर स्त्री और पुरुष दोनों ही सेक्स करने के सही तरीकों को जानते हैं तो पुरुष 8 से 10 मिनट तक अपने लिंग को उत्तजित अवस्था में रख सकता है लेकिन काम-क्रीड़ा के बाद अगर लिंग का योनि के अंदर पहुंचकर घर्षण करना शुरू हो जाए तो पुरुष को स्खलित होने में 1 से 2 मिनट का समय लगता है लेकिन अगर घर्षण का सिलसिला रुक-रुककर चले तो ऐसी स्थिति में इस अवधि को 10 से 15 मिनट तक बढ़ाया जा सकता है।

संभोग क्रिया के लिए जरूरी चिकनाई-

             स्त्री की योनि में से साधारण तौर पर हर समय थोड़ा-थोड़ा स्राव होता रहता है जिसके कारण उसकी योनि हर समय गीली सी रहती है। लेकिन यह स्राव जब ज्यादा मात्रा में बहने लगता है तो यह योनिद्वार में से बाहर निकलने लगता है उस समय इसे ल्यूकोरिया (प्रदर) कहा जाता है। इसके विपरीत बहुत सी स्त्रियां ऐसी होती है जिनकी योनि में से यह स्राव बहुत कम मात्रा में निकलता है इसलिए उनके साथ संभोग करते समय शुद्ध बी-पी क्वालिटी के वैसलीन को लिंग की त्वचा, लिंग के आगे के मुख और योनिमार्ग की दीवारों पर मलने से इस परेशानी को दूर किया जा सकता है।

गर्भवती स्त्री के साथ संभोग करना-

         गर्भवती स्त्री के साथ संभोग करने से कई प्रकार के रोग होने की संभावना रहती है खासकर जिन स्त्रियों को गर्भाशय के रोग होते हैं या जिस स्त्री को पहले 1-2 बार गर्भपात हो चुका हो उनके साथ गर्भावस्था में संभोग करने से दुबारा गर्भ गिर जाने का डर रहता है। गर्भपात होने की यह संभावना गर्भ ठहरने के बाद शुरुआती 6-7 सप्ताह में और फिर गर्भावस्था के आखिरी 8 सप्ताहों में बहुत ज्यादा होती है इसलिए इस समय संभोग विल्कुल नहीं करना चाहिए। समझदार पुरुष भी वहीं होते हैं जो गर्भावस्था के इन दिनों में पत्नी के साथ संभोग न करें। ज्यादातर स्त्रियों में गर्भावस्था के इन दिनों में काम उत्तेजना बहुत कम हो जाती है और उनमें संभोग करने की इच्छा नहीं रहती है इसलिए पुरुष को भी पत्नी की इस इच्छा के विरुद्ध उसके साथ संभोग नहीं करना चाहिए।

संभोग के बाद थकान होना-

             बहुत से लोगों की शिकायत होती है कि संभोग क्रिया करने के बाद अक्सर उनके शरीर में थकान आ जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संभोग क्रिया के समय व्यक्ति अपनी सारी शक्ति और मानसिक क्रियाएं एक ही तरफ केंद्रित कर लेता है। इसी कारण संभोग क्रिया के समय जब स्खलन होता है तो पुरुष के शरीर के सारे अंग आराम मांगते हैं लेकिन यह थकान ज्यादा देर तक न होकर कुछ ही समय तक रहती है।

चुंबन से हानि-

             संभोग क्रिया के कारण स्त्री और पुरुष का व्यक्तित्व, मानसिक तृप्ति और शारीरिक स्वास्थ्य ठीक रहने के साथ किसी प्रकार का तनाव भी नहीं रहता है। यह सब सिर्फ संभोग क्रिया से ही संभव नहीं होता। इसको और ज्यादा उत्तेजक और आनंददायक बनाने के लिए प्राककीड़ा का बहुत ज्यादा महत्व होता है। इसमें अलिंगन, चुंबन, स्पर्श आदि की आवश्यकता होती है। इससे यौन भावना काफी तेज होकर संभोग क्रिया को असरकारक बनाते हैं। इससे किसी प्रकार की बीमारी होना संभव नहीं है लेकिन ऐसे में स्त्री और पुरुष दोनों का स्वस्थ रहना जरूरी है। इनमें से अगर किसी एक को भी जुकाम, मुंह के छाले, टीबी, दांतों की बीमारी, पायरिया आदि हो तो चुंबन आदि से दूर होना चाहिए क्योंकि इस दौरान चुंबन आदि करने से दूसरे को भी बीमारियां होने का डर रहता है।

संभोग क्रिया के समय स्त्री के दर्द होना-

             संभोग करते समय बहुत सी स्त्रियों को बहुत तेज दर्द होता है जिसका कारण शतीच्छेद (कुमारीच्छद) की कठोरता है। शतीच्छेद एक प्रकार की झिल्ली होती है जो योनि के ऊपर रहती है। पहली बार संभोग करते समय लिंग के योनि में प्रवेश करने से यह झिल्ली फट जाती है जिस कारण हल्का-हल्का सा दर्द होता रहता है। बहुत सी स्त्रियों में यह झिल्ली काफी मोटी होती है जिसके कारण लिंग के प्रवेश करने से घर्षण से फटती नहीं है और स्त्री को दर्द ज्यादा होता है। अगर ऐसा होता है तो किसी अच्छे चिकित्सक से सर्जरी करवा लेनी चाहिए। इसके अलावा अगर योनि में से निकलने वाले स्राव की कमी के कारण योनि खुश्क हो तो भी यह पीड़ा का सबब बन सकती है।

गर्भनिरोधकों का स्त्री की प्रजनन क्षमता पर प्रभाव-

             अक्सर बहुत से लोग कहते हैं कि गर्भ को रोकने वाले साधनों का निरंतर इस्तेमाल करने से स्त्री की प्रजनन क्षमता कमजोर हो जाती है लेकिन इसे सिर्फ लोगों का वहम कहा जा सकता है। बच्चा पैदा करने की प्रक्रिया डिंब और शुक्राणुओं के आपस में मिलने से होती है और गर्भ निरोधक इन दोनों के मिलने के बीच में रुकावट डालते हैं। इनका इस्तेमाल बंद कर देने से डिंब और शुक्राणुओं के आपस में मिलने की प्रक्रिया दुबारा शुरू हो जाती है और स्त्री फिर से गर्भवती हो सकती है। इसलिए कहा जा सकता है कि इनका इस्तेमाल करने से स्त्री को किसी प्रकार की कोई हानि नहीं होती है।

स्खलन होते समय वीर्य को रोक देना-

             बहुत से युवकों के मन में यह बात घर कर जाती है कि अगर संभोग क्रिया के समय स्खलन होने से पहले वीर्य को रोक लेने से वीर्य का नाश होने से रोका जा सकता है और इस क्रिया का पूरी तरह से आनंद भी लिया जा सकता है। इस बात को उनके मन का वहम ही कहा जा सकता है क्योंकि एक बार वीर्य जब अपनी जगह से हट जाता है तो उसी रूप में स्थिर नहीं रहता बल्कि मूत्राशय में जाकर रुक जाता है। इसके कारण पुरुष के पथरी, सूजन और गुदा के भाग में मस्से आदि हो जाते हैं। इसलिए वीर्य स्खलन के समय वीर्य को स्खलित होने देना चाहिए।

संभोग क्रिया के समय आनंद न मिलना-

             बहुत से लोगों की शिकायत होती है कि संभोग क्रिया के समय पति-पत्नी दोनों को पूर्ण आनंद प्राप्त नहीं होता है। इस समस्या के कई कारण होते हैं। इस समस्या को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि पति और पत्नी को इस समस्या के बारे में आपस में खुलकर बात करनी चाहिए क्योंकि यही बातचीत काम-क्रीड़ा का दूसरा रूप होती है। हनीमून पर बाहर जाना, संभोग क्रिया में नए-नए आसनों का प्रयोग करना, साथ-साथ स्नान करना, कामोत्तेजक किताबें पढ़ना आदि पति-पत्नी के बीच संभोग क्रिया के बीच के आनंद को बढ़ाते हैं।

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